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Thursday, August 16, 2018

दलित

आज़ादी के 71 साल हो गए लेकिन देश की माटी से पैदा होने वाला हर नेता, दलित-दलित ही खेलता है आज भी।

कायर है वो

कायर है वो!
न सीने में आग है,
न रक्त में उबाल है।
अन्याय सहता है
चुप रहता है
आवाज़ नहीं उठाता
वक़्त से पहले बूढ़ा हो गया।
जो लड़ते हैं ज़माने से,
रखते हैं सरोकार समाज से
फिक्र करते हैं आने वाली पीढ़ियों की
उन पर ग्रहण बनकर बैठ जाते हैं,
कायर हैं ये
नपुंसक हैं ये
नासूर हैं इस धरती का,
बोझ हैं ये इस समाज पर,
कायर हैं ये,
बेमतलब हैं ये।

Thursday, August 20, 2015

हृदयविहीन , पाषाणहृदया ...

आरोप लगते रहते हैं मुझ पर 
की मैं पाषाणहृदय हूँ 
प्रेम से परे, ह्रदय विहीन 
रुक्ष, शुष्क और नमी के 
अभाव से ग्रस्त ...
.
सोचने पर मजबूर हो गयी
कि सत्य क्या है
मानने पर विवश हो गयी
कि सत्य यही है
लेकिन मस्तिष्क इस सत्य को
स्वीकार करने को तैयार नहीं था ...
.
बच्चों ने कहा -बेस्ट ममा
पति ने कहा -वंडरफुल वाईफ
भाई ने कहा- नटखट बहना
पिता ने कहा- गर्व है तुम पर
सास ने कहा - घर कि लक्ष्मी
मित्रों ने कहा -मेरी हो तुम...
.
सोचने पर मजबूर हो गए
थोड़ा सा कन्फ्यूज़ हो गए
जो राष्ट्र का सतत चिंतन करता हो
समाज कि अवहेलना से व्यथित होता हो
लोकतंत्र का एक स्तम्भ बनकर खड़ा हो
निष्ठां से सारे दायित्व निभा रहा हो ...
.
क्या वो प्रेम और समर्पण से दूर है?
हृदयविहीन , रुक्ष और शुष्क है?

Tuesday, February 19, 2013

मैं और मेरी फेसबुक ..

मैं और मेरी फेसबुक , अकसर ये बातें करते हैं
तुम हो तो क्या बात है, तुम न होतीं तो कैसा होता ?

हज़ारों के दिल में रंज है और लाखों की रात स्याह है
तुम हो तो सब कह-सुन लिया, तुम ना होतीं तो कैसा होता?

भारत की नींव और लोकतंत्र का चारों  स्तम्भ ,
तुम हो तो थमा हुआ है, तुम ना होतीं तो कैसा होता?

बढ़ते आतंकवाद और गुनाहों के इस शहर में,
तुम हो तो आईना दिखा भी लिया, तुम ना होतीं तो कैसा होता?

जनता का खौफ सरकार के दिल से जा रहा है,
तुम हो तो थोडा डरती भी है, तुम न होतीं तो क्या होता ?

कितनों के दिल का हाल हो तुम, कितनों के मन का मलाल हो तुम,
तुम हो सबने बरस लिया, तुम ना होतीं तो कैसा होता?

देशप्रेमियों के दिल में जो दर्द है, जो आवेश है, जो आग है ,
तुम हो तो थोड़ा गरज लिया , तुम ना होतीं तो कैसा होता?

 मैं और मेरी फेसबुक , अकसर ये बातें करते हैं
तुम हो तो क्या बात है, तुम न होतीं तो कैसा होता ?


 Zeal

Monday, November 12, 2012

हर रात दिवाली भारत में..


हर दिन होगी होली और हर रात दिवाली भारत में
हर घर में घंटे गूंजेंगे , हर मंदिर रौशन भारत में !
स्वस्तिक से चिन्हित होकर, ॐ ॐ अब गूंजेगा
घंटो की टंकारों से , हर मंदिर गूंजे भारत में !
बजे नगाड़े सड़कों पर और शंखनाद अब घर-घर में
हर दिन होगी होली
और हर रात दिवाली भारत में !

जय माँ लक्ष्मी , श्री गणेशाय नमः
वन्दे मातरम् !

सभी मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !
दिव्या 
Zeal  

Sunday, February 5, 2012

मुसलमान डरते क्यों हैं ?

मुसलामानों की बढती आबादी सारे विश्व के लिए खतरा बनी हुयी है , लेकिन ये बेचारे खौफ खा रहे हैं एक अकेली 'दिव्या' से। फेसबुक पर मेरी हर पोस्ट पर ये 'मधुमक्खी' की तरह जमा हो जाते है मुझे हलाल करने के लिए और 'ब्लॉगजगत' में मेरी पोस्ट आने के तुरंत बाद ही डरपोक अनवर जमाल और अयाज़ अहमद मेरी पोस्ट के विरोध में एक पोस्ट लिख कर ड़ाल देते हैं। मेरी ही पोस्टों से इनकी दूकान चल रही है। अरे विपक्ष में बैठे बदमाशों , आईडिया चुराने की रोयल्टी तो दिया करो ...smiles...smiles...smiles........वैसे मुझसे डरा मत करो हे भारत भूमि के 'मुसलामानों' मेरी शरण में जाओ , तुम्हें अभयदान देती हूँ। ----जय हिंद---वन्देमातरम !

Friday, April 1, 2011

आज 'सुधार दिवस' है --आप सभी को बधाई एवं शुभकामनायें .

प्रतिदिन कोई न कोई दिवस होता है जिसकी हमें जानकारी नहीं होती। आज सुधार दिवस है। इस दिन हर व्यक्ति को स्वयं में सुधार लाने का पयत्न करना चाहिए। मैं स्वयं को सुधारना चाहती हूँ , इसके लिए पिछले एक दशक से प्रयासरत हूँ। मुझे लगता है आप लोग भी मेरी मदद कर सकते हैं मुझे सुधारने में। इसलिए आपको जो भी कमी मुझमें दिखती हो , उसे निसंकोच टिपण्णी के माध्यम से मुझ तक पहुंचाइए। इस तरह से आप मुझ पर एक उपकार करेंगे।

आपको संकोच न हो इसलिए अपनी कुछ खामियां स्वयं ही लिख रही हूँ , आगे की कड़ी आप बनायेंगे।

  • बहुत अंतर्मुखी हूँ
  • संवेदनशील हूँ
  • अति गंभीर हूँ
  • बचपन में रोती बहुत थी ( इस मामले में सुधर चुकी हूँ , रोती नहीं हूँ अब)
  • जिससे स्नेह करती हूँ , उसपर स्नेह बहुत ज्यादा लुटाती हूँ , जिससे उसका दम घुटने लगता है ( सुधार जारी है , ज्ञान होते ही दूरी बना लेती हूँ ताकि लोगों को oxygen मिल सके )
  • अक्सर सच बोलती हूँ , जो मित्रों को आहत कर देता है ( सुधार जारी है ..)
  • संवेदनशील होने के कारण , कभी व्यक्तिगत दुःख तो कभी समाज में फैली अनियमितताओं से दुखी हो जाती थी जिसके फलस्वरूप मेरा उत्साह शून्य पर पहुँच जाता था , इसलिए अपना नाम 'ZEAL' रख लियाजिसका अर्थ है - उमंग, उत्साह , जोशआज बहुत से मित्र 'ज़ील' या 'ZEAL' पुकारने लगे हैं , जिससे उत्साह की निरंतरता बनी रहती है
  • भावुक होने के कारण , समाज के भ्रष्टाचार से ह्रदय जल्दी व्यथित होता था और मित्रों का आरोप था की भावुक लोग कमज़ोर होते हैं , इसलिए खुद को लोहे के समान कठोर बनाना चाहती हूँ । ( प्रयास जारी है )
  • कुछ मित्रों का ये भी कहना है की मैं बहुत कठोर हूँ और मुझे स्नेह करना ही नहीं आताबिलकुल blunt हूँवैसे मुझे ये बात सच नहीं लगतीफिर भी लोगों के बार-बार ऐसा कहने से यही सच लगने लगा है (सुधार जारी है)

ज्यादातर लोग शिष्टाचारवश मेरी कमियाँ मुझे नहीं बताते । लेकिन आज सुधार दिवास है , इसलिए निसंकोच और बेझिझक होकर मेरे दोषों को इंगित कीजिये। मुझ पर उपकार होगा। सबसे ज्यादा कमियां बताने वाला मेरा सबसे बड़ा शुभ-चिन्तक होगा ।

आपके विचार जानने के बाद स्वयं में सुधार-प्रयासों की गति और भी तेज़ कर दी जायेगी ।

आपके स्वागत में ....

Monday, March 21, 2011

कहीं शनि की वक्र-दृष्टि तो कहीं लक्ष्मी की अति-वृष्टि .

सरस्वती की जिन पर कृपा होती है , अक्सर लक्ष्मी उनसे दूर ही रहती हैं। बड़े-बड़े साहित्यकार जो सचमुच कलम के धनी हैं और निरंतर साहित्य की सेवा कर रहे हैं , उनसे लक्ष्मी रूठी रहती हैं , आखिर ऐसा क्यूँ होता है ?

किसी भी साहित्यकार , लेखक , विश्लेषक को धन का स्वाद चखने को कम ही मिलता है किसी संस्थान अथवा विज्ञान अथवा कार्य स्थल पर भी , असली दिमाग रखने वाले को धन तो दूर , श्रेय तक नहीं मिलता बस राजनीति करने वालों पर लक्ष्मी की असीम कृपा बरसती है ऐसे में सरस्वती को भी कोई सौलिड स्टैंड लेना चाहिए अपने उपासकों पर कृपा दृष्टि रखनी चाहिए।

कितने भाग्यशाली हैं वे , जिन पर सरस्वती और लक्ष्मी दोनों की संयुक्त कृपा होती है।

Wednesday, March 16, 2011

दिव्या तुम्हारी उम्र कितनी है ? और तस्वीर क्या बचपन कि लगा रखी है ?


कल राधिका ने पूछा दिव्या तुम्हारी उम्र कितनी है और तस्वीर क्या बचपन कि लगा रखी है ?

इसी बात पर एक दो वर्ष पुराना वाकया याद गया एक बार पति की कंपनी की मैगजीन में मेरा एक लेख
"Health and environment" छपा लेख छपने के साथ ही परिचितों के फोन आने शुरू हो गए मैंने , सोचा कोई तो तारीफ करेगा लेख की , लेकिन नहीं फोन पर सभी तस्वीर की प्रशंसा कर रहे थे , लेकिन मेहनत से लिखे हुए लेख की प्रशंसा में दो शब्द भी नहीं कहे किसी ने मन उदास था

शाम को ऑफिस के एक परिचित आये बातों के दौरान उन्होंने लेख के लिए बधाई दी , और विषय सम्बन्धी एक दो प्रश्न भी पूछे मुझे बहुत अच्छा लगा की किसी ने तो लेख को पढ़ा है मन की शिकायत उनसे ही कह दी मैंने..." आपके आफिस में एक भी बंदा नहीं जिसे तस्वीर से ज्यादा लेख में रूचि हो ? उन्होंने कहा "सच कहूँ मुझे आपका लेख बहुत पसंद आया , मैंने सहेज कर भी रख लिया है , एक दो जगह कोट
भी कर चूका हूँ"

तो राधिका की बात सुनकर यह प्रकरण ध्यान गया -- सोचा आज अन्य राधिकाओं की भी जिज्ञासाओं का समाधान कर दूँ।

  • मेरी उम्र मेरी प्रोफाइल में भी लिखी है --11 जुलाई 1979 ( ३२ वर्ष )
  • मेडिकल graduation के 4th year में विवाह हुआ। शेष पढाई विवाह के बाद पूरी की है
  • विवाहित जीवन के दस वर्ष पूरे कर चुकी हूँ।
  • आठ और नौ वर्ष के दो प्यारे बच्चे हैं।
  • जो तस्वीर यहाँ लगी है , वो तो ब्लौग पर लगे हुए ही एक वर्ष पुरानी हो गयी , और जाहिर सी बात है की पुरानी ही है तसवीरें तो हर छः माह में पुरानी हो जाती हैं बार-बार अपडेट करना अजीब सा लगता है और संभव भी नहीं है तस्वीर तो महज एक औपचारिकता है ब्लॉग पर
  • Myopia भी है मुझे , इसलिए १२ वर्ष की उम्र से ही चश्मा भी लग गया था मुझे। इस तस्वीर में भी , नेत्रों में Contact lenses लगे हुए हैं
  • यदि आप लोग हर वर्ष , मेरी बढती उम्र की एक काल्पनिक तस्वीर स्वयं ही बना लें तो बहुत मदद होगी।
  • तस्वीर बनाने के लिए आवश्यक बिंदु नीचे लिख रही हूँ.....
मैं मोटी हूँ , भद्दी हूँ , काली हूँ, और हर बीतते वर्ष के साथ के बुढ़ापा ही घेरेगा मुझे। कृपया प्रोफाइल तस्वीर पर जायें

आभार
.

Sunday, March 13, 2011

भारत देश के अनमोल रतन - सचिन तुझे सलाम


स्वभाव से संकोची सचिन तेंदुलकर जी एक बेहतरीन व्यक्तित्व के धनी हैं गर्व है की हम उस देश के नागरिक हैं जहाँ सचिन जैसे हर दिल अज़ीज़ खिलाड़ी हैं। १५ वर्ष की आयु से क्रिकेट में अपने कैरियर की शुरुवात करते हुए निरंतर कामयाबी की बुलंदियों को छूते चले गए।

आखिर इस कामयाबी का राज़ क्या है विनम्रता , गंभीरता , दायित्वों का पूर्ण एहसास , खेल के प्रति समर्पण, देशभक्ति और देशवासियों के लिए प्यार ही सचिन की कामयाबी और शोहरत का कारण है

कल साउथ अफ्रीका के खिलाफ मैच में सचिन ने अपना पसीना बहाकर भारत को एक मज़बूत मकाम पर खड़ा किया लेकिन अन्यों की लापरवाही ने जीता हुआ मैच हरवा दिया कल उनकी फील्डिंग भी देखने लायक थी इतना बेहतरीन प्रदर्शन की तारीफ़ के लिए शब्द कम पड़ें सचिन खेल में अपनी जी-जान लगा देते हैं। खेल के प्रति सचिन का समर्पण लाखों खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है।

विनम्रता तो सचिन में जैसे कूट-कूट कर भरी है जब मांजरेकर ने कहा की "सचिन को खेल से संन्यास ले लेना चाहिए" तब भी उन्होंने विनम्रता पूर्वक मौन रखा भावुक सचिन अनाथ बच्चों के लिए समाज सेवा से भी जुड़े हुए हैं

सन २०१० में ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध बेहतरीन दोहरी शतकीय पारी खेल कर तकरीबन जिता दिया था भारत को , लेकिन अंत में मात्र दो रनों से भारत की हार होने पर सचिन की आखों से आँसू निकल पड़े थे इस तरह से समर्पित होकर विरले ही खिलाड़ी खेलते हैं

कुछ लोगों का मानना है की सचिन जब शतक लगाते हैं तो भारत की हार निश्चित हो जाती है अब ऐसे अंधविश्वासों का क्या मतलब है क्या सचिन शतक लगाना छोड़ दें ?

सचिन का अपने देश के लिए जज्बा अनुकरणीय है जब मुंबई में मराठी भाषा का मुद्दा गरमाया हुआ था तो सचिन का वक्तव्य था - "मुझे महाराष्ट्रीयन होने पर गर्व है , लेकिन मैं सबसे पहले भारतीय हूँ " देश का नाम ऊँचा करने वाले ऐसे खिलाडी को 'भारत-रत्न' से पुरस्कृत होना चाहिए।

सुना है सचिन को सी-फ़ूड बहुत पसंद है , खासकर झींगा (Shrimp) सचिन का थाईलैंड में स्वागत है यहाँ झींगा का बोलबाला है।

सचिन तुम खेलो हज़ारों साल ,
खेल के रन हों पचास हज़ार

आभार ।

Saturday, March 12, 2011

विमर्श में प्रति-टिप्पणियों की उपादेयता .

कुछ विषय ऐसे होते हैं , जिन पर विमर्श आमंत्रित होता है विमर्श के दौरान लोग अपने विचार रखते हैं , उनके विचारों पर अन्य पाठक अथवा लेखक अपने विचारों को पुनः रखते हैं इस प्रकार विचारों के आदान-प्रदान से व्यक्ति के विचारों को आयाम मिलता है , ज्ञानवृद्धि होती है तथा एक दुसरे को बेहतर समझने में मदद भी मिलती है। और सबसे बड़ी बात , विषय के साथ न्याय भी होता है

कभी-कभी कुछ लोग प्रति-टिपण्णी मिलने पर नाराज़ हो जाते हैं। इसलिए प्रति-टिपण्णी लिखने में डर सा लगता है।

मेरा आप सभी से ये प्रश्न है की क्या -
  • लेख लिखने के बाद लेखक अथवा लेखिका को मौन धारण कर लेना चाहिए ?
  • क्या विषय को विस्तार देने के लिए यदि कोई नयी बात मस्तिष्क में है तो भी नहीं लिखनी चाहिए?
  • क्या प्रति-टिपण्णी मिलने पर टिप्पणीकार का बुरा मानना उचित है ?
  • क्या लेखक को ये अधिकार है की वो अपने ऊपर आई व्यक्तिगत टिपण्णी पर आपत्ति करे ?
  • क्या प्रति-टिपण्णी में सिर्फ यही उचित है की ....आपका आभार , पुनः आइयेगा , स्नेह बनाए रखियेगा , आदि-आदि ....

मेरे विचार से किसी भी विषय पर विमर्श के दौरान लेखक अथवा प्रतिभागियों को एक से ज्यादा बार अपनी बात लिखने अथवा कहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। टिप्पणियां जितनी अहम् हैं , प्रति-टिप्पणियां भी उतनी ही उपादेय हैं बस इतना ध्यान रखें की अपने विचार रखते समय किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करें , तथा अपनी शैली को शिष्ट एवं शालीन रखें

इस विषय पर आपके विचार जानने की उत्कंठा है

आभार।

Sunday, February 20, 2011

निर्वस्त्र होने से क्रांति नहीं आती , ना ही न्याय मिलता है .

आजकल समाचारों में पढने कों मिलता है कि अमुक स्त्री ने न्याय ना मिलने पर अदालत में निर्वस्त्र होकर विरोध जतायाकहीं कोई स्त्री ससुराल में प्रताड़ित होती है तो दिल्ली , मुंबई की सड़कों पर निर्वस्त्र दौड़ पड़ती हैकहीं पर समाज के ठेकेदार ( राम सेना के चीफ ) जैसे लोग मॉरल-पुलिसिंग करते हैं तो महिलाओं द्वारा 'pink chaddi campaign' चलाया जाता हैकहीं सूखा पड़ा है तो स्त्रियों के निर्वस्त्र होकर खेतों में हल चलाने से , इंद्र देव प्रसन्न होकर बारिश करायेंगे आदि

इस तरह से न्याय नहीं मिलता ना ही कोई क्रांति लायी जा सकती हैये स्त्री की एक अत्यंत ही लाचार और हताश अवस्था कों इंगित करती हैइस तरह के आचरण से लाभ नहीं होगा अपितु स्त्री की गरिमा कों क्षति पहुंचेगीइसलिए यदि अपने अधिकारों के लिए लड़ना है , तो अपनी गरिमा और मर्यादा कों कदापि नहीं भूलना हैजिस सभ्यता को पाने में युगों लग गए , उसे त्यागकर आदि-मानवों की तरह आचरण करने से क्या हासिल होगायह तो खुद के ऊपर अत्याचार करने जैसा हुआ

ऐसे आचरण जिससे, स्त्री और पुरुष सभी असहज हो जाएँ , उसे न्याय पाने का हथियार क्यों बनाना ? न्याय तो मिलेगा नहीं , मानसिक अस्पताल में भर्ती होने का आदेश ज़रूर मिल जाएगा

आज भी समाज में स्त्री एवं पुरुष के बीच दोहरा मापदंड हैस्त्री चाहे गरीब हो अथवा अमीर , गावं की हो अथवा शहर की , पढ़ी-लिखी हो अथवा अनपढ़ , सभी कों पुरुष से कमतर समझने की ही मानसिकता हैइसी मानसिकता का परिणाम है - कन्या भ्रूण हत्या , दहेज़ , सती प्रथा आदि

ऐसी मानसिकता वाले समाज से कुछ मांगो नहीं , क्यूंकि मांगने वाला सिर्फ 'भिक्षु' होता हैवो कभी भी स्वयं पर गर्व नहीं कर सकताअपना हक माँगा नहीं जातासाम , दाम , दंड , भेद से लड़कर हासिल किया जाता है

पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से , मुस्कुराओ तो कोई बात बने
सर झुकाने से कुछ नहीं होता , सर उठाओ तो कोई बात बने
अपना हक संगदिल ज़माने से , छीन पाओ तो कोई बात बने


आप बताइए कैसे लड़ी जाए ये लड़ाई ?

  • सबसे पहले तो अपने तन पर वस्त्रों की गरिमा कों समझियेकिसी भी हालत में स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने वाले इन वस्त्रों का अपमान मत कीजियेलाचारी एवं हताशा की अवस्था में भी मर्यादित रहियेये वस्त्र इतने गरिमामयी होने चाहियें की देखने वालों की नज़र भी श्रद्धा एवं सम्मान से भर जाए । ( अन्यथा स्त्री कों निर्वस्त्र देखने वाले उन्मादी असंख्य हैं )
  • पिंक चड्ढी की जगह , मॉरल पुलिसिंग करने वालों कों ' चप्पलें ' भेजनी चाहियें
  • एकता में बल है , इसलिए किसी भी अभियान कों एकजुट होकर सफल बनाया जा सकता है
    यदि व्यक्ति सही है तो उसे समर्थन करने वाले भी मिल जायेंगेइसलिए खुद कों लाचार समझने की ज़रुरत नहीं हैसंवेदनशील लोगों से सहयोग की अपेक्षा की जा सकती है
  • खुद को इतना मज़बूत बनाइये की अन्याय करने वाला अपने ही बाल नोंच डाले ।

ग्रंथों , पुराणों और उपनिषदों में नारी को 'देवी' कह दिया गया लेकिन विरला ही कोई होगा जो स्त्री को देवी समझता होगाइसलिए गलती से भी स्वयं को देवी की भूल-भुलैय्या में ना रखिये

मनुष्य बने रहकर , निर्भय होकर सबसे पहले खुद में आत्मविश्वास लाइएजब आप स्वयं का सम्मान करना सीख जायेंगी तो जमाना आपके साथ-साथ चलेगा

आभार

Friday, February 18, 2011

महिला स्वाभिमान !

स्त्री एवं पुरुष जीवन में एक दुसरे के पूरक हैं रथ के दोनों पहियों के परस्पर समन्वय से ही जीवन रुपी रथ मंथर गति से , अनेक विघ्न बाधाओं कों पार करते हुए आगे बढ़ता रहता है। एक समझदार स्त्री एवं पुरुष एक दुसरे कों अच्छी प्रकार समझते हैं और एक दुसरे के प्रति सहयोग कि भावना रखते हैं।

बचपन से बड़े होने तक हम अपनी माँ और पिता कि छत्रछाया में बढ़ते हैं। वो भी तो एक स्त्री और एक पुरुष हैं उन दोनों कों परस्पर एक दुसरे का सहयोग और सम्मान करते हुए देखते हैं तभी अपने छोटे से परिवार कि पूर्णता दिखती है माता और पिता कों हम बराबर प्यार और सम्मान देते हैं। दोनों में से कोई भी हमें किसी से कमतर नहीं लगता लेकिन अफ़सोस जब हम बड़े होते हैं तो क्यूँ हम स्त्री और पुरुष एक दुसरे से अलग देखते हैं क्यूँ हम स्त्रियों की समाज में कमज़ोर स्थिति के लिए पुरुषों कों जिम्मेदार ठहराने लगते हैं।

मुझे लगता है स्त्रियाँ अपनी स्थिति के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं माना कि समाज का ढांचा सदियों से कुछ इस प्रकार का रहा है कि स्त्री के हिस्से में घरेलू काम और पुरुष के हिस्से में धनोपार्जन आता है लेकिन यदि कोई महिला कार्यों के इस आबंटन से संतुष्ट नहीं है तो उसे बिना अपने पति कों दोष दिए ही अपनी रूचि के अनुसार नौकरी करनी चाहिए अच्छी नौकरी , जिसमें पैसा और इज्ज़त दोनों ज्यादा हो , उसके लिए स्वयं कों बेहतर शिक्षित भी करना होगा

इसके लिए स्त्री कों स्वयं ही सोचना होगा स्कूलों और विद्यालयों में लड़का लड़की का कोई भेद नहीं है माता पिता भी बेटे और बेटी कों समान शिक्षा का अवसर देते है विवाह के बाद पति भी अपनी पत्नी कों बढ़ते हुए देखना चाहता है अपनी पत्नी कि तरक्की और ख़ुशी में पति भी गौरवान्वित महसूस करता है वो पत्नी के ऊपर घरेलू कार्यों के बोझ कों कम करने के लिए उसका हाथ बंटाने में सहयोग करता है और पत्नी भी पति के जिम्मे कुछ कार्यों कों अपने ऊपर ले लेती है इस प्रकार काम के बोझ और काम कि प्रकृति दोनों कों समान रूप से मिलती जाती है दोनों कों एक दूसरे से कोई शिकायत नहीं रहती मन में कोई अवसाद और क्लेश नहीं रहता और जीवन मधुर और सुखमय होता है

जो महिलाएं आज उच्च पदस्थ हैं , देश का नाम रौशन कर रही हैं , वो भी हमारी तरह स्त्रियाँ हैं। वे तो पुरुष प्रधान सत्ता कों दोष नहीं देतीं क्यूंकि उन्होंने शिकायत करने जैसी महामारी से स्वयं कों बचा कर रखा में और अपनी सकारात्मक ऊर्जा कों अपने ही विकास में लगाया और सक्षम होने के बाद अपना योगदान समाजोपयोगी रूप में कर रहीं हैं। वो कुंठित नहीं हैं। कुंठा मन में तब आती है जब हम स्वयं कों असक्षम पाते हैं तब। हमारी कमतरी के लिए पुरुष जिम्मेदार नहीं हैं। हमें प्रेरणा लेनी चाहिए समाज में जिन स्त्रियों ने अपना स्थान बनाया है , अपनी पहचान बनायी है

जो स्त्रियाँ कुछ करना चाहती हैं , समाज में स्थान चाहती हैं वो स्वयं ही विकट से विकट परिस्थिति में भी बेहतर विकल्प ढूंढ लेती हैं। सर्वप्रथम तो स्वयं कों शिक्षित करती हैं फिर नौकरी करके या फिर बच्चों कों पढ़ाकर या फिर पत्र पत्रिकाओं में लेख लिखकर समाज में एक जागरूकता लाने का सार्थक कार्य कर सकती हैं। सकारात्मक कार्य करने वाली एक स्त्री अनावश्यक रूप से शिकायती नहीं होती प्रसन्नचित्त रहती है

लेकिन कुछ स्त्रियाँ के पास समय प्रचुर मात्रा में होता है पति अच्छा कमा रहा है तो उनके पास नौकर होने कि अवस्था में कुछ ख़ास कार्य शेष नहीं रह जाता खाली दिमाग शैतान का घर दिन भर समय नष्ट करना फालतू टीवी सेरियाल्स देखना , जिसमें कुछ भी सकारात्मक देखने कों नहीं मिलता फिर बचे हुए समय में अनावश्यक करना और समय नहीं कटता इसलिए किटी-पार्टीज़ जैसे विकल्प कों अपनाती हैं। रोजाना कि इसी दिनचर्या से उनके दिमाग कों घुन लग जाता है थोड़ा ऊपर उठकर सोचने कि शक्ति का उनका ह्रास हो जाता है यही बहुमूल्य समय वो अपनी मानसिक गुणवत्ता बढ़ाने में कर सकती हैं शिक्षा के प्रचार प्रसार में सहयोग कर सकती है पत्र -पत्रिकाओं , जर्नल्स , periodicals तथा समाचारों द्वारा खुद कों अपडेट रख सकती है जितनी ज्यादा ज्ञान होगा उतना ज्यादा योगदान होगा उसका समाज और परिवार के लिए , खासकर उसके अपने बच्चों की बेहतर परवरिश में।

यदि हम समाज के गरीब वर्ग कि बात करें तो वो एक मेहनतकश जीवन गुजारती हैं , घर के काम के साथ साथ वो मेहनत मजदूरी कर आर्थिक रूप से अपने पति का सहयोग करती हैं।

मिडिल क्लास कि बात करें तो वो भी यथासंभव अपनी योग्यतानुसार नौकरी करती हैं पति का सहयोग करती हैं और कुंठित नहीं रहतीं

एक वर्ग ऐसा है जहाँ पति ज़रुरत से ज्यादा कमा रहा है पत्नी के पास हर सुविधा और ऐशो आराम है घरेलू कामों के लिए नौकर भी हैं। ये ही महिलाएं अक्सर आराम तलब बन जाती हैं अपनी शैक्षणिक योग्यता कों ताख पर रख , अनावश्यक gossip , आदि में बहुमूल्य समय नष्ट करते हुए अपना जीवन व्यर्थ गुज़ार देती हैं।

स्त्रियों कों प्रेरणा लेने चाहिए समाज कि उन महिलाओं से जो समाज में विभिन्न संस्थानों में कार्यरत हो, पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं हमें प्रेरणा लेनी चाहिए मध्यम वर्ग कि मेहनतकश महिलाओं से जो बिना किसी कुंठा के , सकारात्मक सृजन में अनवरत लगी हुई हैं। प्रेरणा उन मजदूर वर्ग कि महिलाओं से , जिनकी लगन ये सन्देश देती है कि - जीवन एक संघर्ष है , मुस्कुरा कर जियो , शिकायतों का कोई स्थान नहीं है

अधिकाँश पुरुष अपने समय कों व्यर्थ नहीं करते हमें पुरुषों से भी प्रेरणा लेनी चाहिए कि कैसे वो अपने जीवन कों नियंत्रित करते हैं , और प्रसन्नचित्त रहते हैं यदि समाज में उनकी स्थिति ज्यादा सुदृढ़ है तो हम महिलाओं कों उनसे सीखना होगा कि वे हमसे ज्यादा सशक्त क्यूँ और कैसे हैं एक बार यदि हम कोशिश करेंगे तो खुद कों बेहतर बनाकर समाज में अपना स्थान बनाकर कुंठा से दूर रह सकेंगे।

यहाँ मेरे आस पास के परिवेश में जितनी भी महिलाएं हैं वो सभी उच्च शिक्षित हैं समय इफरात है , इसलिए किटी पार्टीज़ जैसे विकल्प से स्वयं कों व्यस्त रखती हैं। मुझसे कहा शामिल होने के लिए , और जब मैंने इनकार किया तो मुझ पर बहुत ही unsocial , असामाजिक होने का टैग लगा दिया मैं खुश हूँ इस टैग से , कम से कम मैं जो करना चाहती हूँ वो कर तो पा रही हूँ।

जब मैं भारत वापस आउंगी तो मेडिकल प्रैक्टिस करुँगी लेकिन जब तक यहाँ हूँ , तब तक ब्लोग्स के माध्यम से स्वास्थ्य एवं सामाजिक विषयों पर लिखकर समाज के लिए योगदान जारी रहेगा हम अपने बच्चों के सामने भगत सिंह , डॉ कलाम , कल्पना चावला और किरण बेदी जैसे व्यक्तित्वों कि मिसाल रखते हैं ताकि वो प्रेरणा ले सकें , इसलिए मुझे लगता है कि अपनी कमतरी पर रोने के बजाय और शिकायत करने से बेहतर है खुद का मानसिक विकास करना और एक मिसाल कायम करना स्त्री हो या पुरुष , स्वाभिमान के साथ जीना उसके अपने हाथ में है

मेरी दिनचर्या -
  • परिवार के लिए पौष्टिक भोजन पकाती हूँ।
  • विभिन्न विषयों पर ब्लॉग लेखन एवं पठन , जिससे मेरे दिमाग कों जंग लगे और अपनों के बीच हूँ , इस बात का भी एहसास होता है
  • IBM के चार बच्चों कों सप्ताह में तीन दिन पढाती हूँ (इससे मेरे मस्तिष्क का अच्छा व्यायाम होता है और धनोपार्जन भी)
आभार

Thursday, February 17, 2011

छुटकी टिप्पणी , बडका ब्लॉगर

ये राधिका भी ! जब देखो तब कहती है - " क्या दिव्या भारी भरकम पोस्ट लगा दी , पका देती हो तुम तो तुम्हारे लेख पढ़कर तो नींद ही नहीं आती , Diazepam की गोली खाकर नींद बुलानी पड़ती है " तो समर्पित है आज की हलकी-फुलकी पोस्ट राधिका के नाम

जैसे जैसे उम्र बढती है , बुढापा घेर लेता है लोग खाना कम कर देते है , सोचते हैं , पचा नहीं पाऊंगा चटक-मटक कपडे कम पहनता है , सोचता है लोग क्या कहेंगे पार्टीज़ में कम जाता है , डरता है कहीं समाज हँसे मुझ पर घर में बूढी कुर्सी पर खुद ही बैठने लगता है , डरता है कहीं कोई टोक दे मुख्य सोफे पर बैठने से

भाई ना! डरिये नहीं जीने के यही चार दिना , जिंदगी चले प्यार बिना धन-दौलत बिना चले मगर , जिंदगी ना चले यार बिना इसलिए खुद कों , खुद ही अकेला मत कीजिये मिल कर रहिये बुज़ुर्ग कम हों तो युवाओं के साथ हाथ मिलाइएफिर देखिये ज़िन्दगी आप पर किस तरह मेहरबान होती हैउनकी ऊर्जा से खुद कों चिर-युवा बनाइयेअपने अहम् कों ताख पर रखकर युवाओं और बच्चों की मस्ती भरी अटखेलियों का आनंद उठाइए और निरंतर ऊर्जान्वित रहिये

अरे हम तो भटक गए , बात हो रही ब्लॉगर्स की हाँ तो जनाब जैसे जैसे एक ब्लॉगर बड़ा होता जाता है , उसकी टिप्पणियां छोटी हो जाती हैं ऐसा क्यों ? अरे भाई वो डरने लगता है -

  • कहीं कुछ कम ज्यादा लिख दे
  • कहीं कोई विवाद हो जाए
  • कहीं कोई छुटके ब्लॉगर का मान बढ़ जाए
  • कहीं छुटंकू का TRP बढ़ जाए
  • कहीं छुटकू ज्यादा भाव खाने लगे
  • कहीं मेरी महिमा घटने लगे .
  • सबको पता चल जाएगा की मैं इसे पढता हूँ
  • मैं दूसरों कों तो टिप्पणी करने से नहीं रोक सकता , लेकिन अपनी एक टिप्पणी से तो इसको वंचित कर ही डालूँ
  • बडके बिलागर की चार पोस्ट पर टिपण्णी करो , तब आयेंगे गरीबों की एक पोस्ट पर । ४: १ का रेशिओ । और छुटकू उसी में हो जायेंगे मगन कि तारनहार आये हमरे द्वार । लगेंगे गाने , आभार , आभार , आभार ।
  • कभी कभी तो राधिका जैसे बडके ब्लॉगर दांत भींचे लौट जाते हैं , और छुटकी टिप्पणी भी नहीं देते धत तेरे की , ऐसा भी क्या गुमान
  • कभी-कभी तो बडके ब्लॉगर इतनी microscopic टिप्पणी देते हैं की हम उतने micro ( सूक्ष्म) स्तर तक सोच ही नहीं पाते और उनके monosyllable ( इकलौते शब्द) में व्यक्त अनेकार्थों कों समझ ही नहीं पाते
  • कभी-कभी वो invisible ink में लिखते हैं , जो कमेन्ट बॉक्स में नज़र ही नहीं आती वो आते हैं , पढ़ते हैं, होठों ही होठों में बुदबुदाते हैं और बिना चाय-पानी , दुआ-सलाम के चले जाते हैं।
  • कभी-कभी बड़का ब्लॉगर घबराते हैं की कहीं उनकी टिप्पणी भीड-भाड़ में खुवाय जाए , इसलिए भी खुदकों अलग थलग ही रखते हैं।
  • जाने कौन कौन से डर पाले हैं , मन में डरिये मत ! लिख डालिए ! दर्दे दिल। हाले मन। मन की हलचल ! याँ फिर भड़ास टिप्पणी तो आखिर टिप्पणी है लेखक का मनोबल ही बढ़ाएगी , घटाएगी नहीं और यकीन मानिए टिप्पणी लिखकर आप बडके से छुटके ब्लॉगर कदापि नहीं बनेंगे बल्कि आपकी शान में एक और feather बढ़ जाएगा
थोडा सा प्रवचन झेलेंगे क्या ?

Food chain का नाम तो सुना ही होगा एक सीधा खड़ा हुआ शंकु ( upright pyramid)होता है , जिसमें ढेरों टिड्डे एक साथ दल बनाकर जीवन का मज़ा लेते हैं , लेकिन शिखर पर बैठा शेर अकेला होता है वो राजा है , उसकी जी-हुजूरी करने वाले असंख्य होते हैं , लेकिन दोस्त कोई नहीं होता

corporate world की बात करें तो शीर्ष पर बैठा CEO , नितांत अकेला पड़ जाता है जीवन की हलकी-फुलकी बात किससे करे ? अरे बड़ा होने का खामियाजा तो बड़े लोग ही जानते है

तनहा-तनहा हम रो लेंगे , महफ़िल-महफ़िल गायेंगे ..

मुई राधिका मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी पूछती है - " दिव्या तुम छुटकी हो या बडकी बिलागर ?

हमने कहा -"अरी मूरख , इतनी बड़ी-बड़ी टिपण्णी लिखती हूँ की पढने वाला भी पक जाए " दिल से लिखती हूँ दिल से। "एक हाथ से लेती हूँ दोनों हाथ से देती हूँ" ( सौजन्य IDBI Bank ) इसलिए छुटकी बिलागर हूँ छुटकी ! और हमेशा छोटे ही बने रहना चाहती हूँ।

"कल और आयेंगे नगमों की , खिलती कलियाँ चुनने वाले ,
मुझसे बेहतर लिखने वाले , तुमसे बेहतर पढने वाले ....

इसलिए जी भर के लिखो , लेख भी और टिपण्णी भी आपके शब्द ही आपकी पहचान हैं।

वैसे कोशिश करती हूँ - "कम खर्च बालानशीं " की तर्ज पर संक्षेप में लिखकर काम चलाया करूँ पर क्या करूँ ये निगोड़ी उंगलियाँ मानती ही नहीं कहती हैं - "ये दिल मांगे मोर "

आभार