न भई ना । मैं नहीं बोर हो रही हूँ। ये तो समस्या है मेरी सासू माँ की । आखिर उनको भारत से आये हुए चार माह जो हो चुके हैं। तीन महींने तो उनके ख़ुशी-ख़ुशी व्यतीत हो गए। लेकिन चौथा महीना आते ही माँ बोर होने लगीं । अनायास ही उनके स्वभाव में कुछ तल्खी भी आने लगी । भारत से देवर का फ़ोन आया , पूछा- " कैसी हो माँ ? उन्होंने कहा अच्छी हूँ , लेकिन बहुत बोर हो रही हूँ। दो एक बार ये सिलसिला जारी रहा तो देवर साब ने भी फोन पर पूछना छोड़ दिया की कैसी हो ।
विदेश आने के बाद ज्यादातर parents को बस एक ही शिकायत हो जाती है - वो है बोरियत। थोड़े समय तो वो नयी जगह एन्जॉय करते हैं, फिर वापस अपने देश जाने को बेचैन हो जाते हैं।
मैंने बहुत सोचा , इसका हल क्या हो सकता है , कैसे मम्मी की बोरियत दूर की जाए। समीर जी की मदद लेनी चाही तो हमेश की तरह एक ही जवाब - "तुम ही कुछ करो " । फिर हिम्मत करके उनसे इस विषय पर बात करने की सोची । चाय बनायीं और बात शुरू की ।
मैंने उनसे पूछा - "मम्मी आपको कुछ परेशानी या दुःख है ? या हम लोगों से कोई गलती हो रही है ? उन्होंने कहा - " नहीं बेटा , तुम लोग तो बहुत ध्यान रखते हो , लेकिन जाने क्यूँ बहुत बोर हो रही हूँ ".
मैंने डरते हुए समझाने की हिम्मत की - " माँ आखिर मैं भी तो घर में अकेली ही रहती हूँ दिन भर , बोरियत तो होनी चाहिए मुझे भी ? लेकिन मैं किससे कहूँ की बोर हो रही हूँ। क्युंकी यही मेरा घर है। यही मेरी परिस्थितियां हैं। जितना है उसी में खुश होना है। कहीं बोर ना हो जाऊं इसलिए लेख लिखती हूँ । इसी बहाने अनेकानेक लोगों के साथ विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है । कुछ सीखती भी हूँ इसी बहाने। बोरियत किसी स्थान विशेष से नहीं होती. बल्कि बोरियत हमारे दिमाग में जड़ता आने की वजह से होती है। आपको यदि लगता है की भारत जाकर बोर नहीं होंगी , तो ये आपकी ग़लतफहमी है। आपके पास तीन बेटे बहू हैं । तीनो ही आपको भरपूर प्यार से रखते हैं। आपके लिए तो एक जैसी ही परिस्थिति होगी तीनों जगहों पर। इसलिए जरूरत है आप खुद को व्यस्त रखें । जो पसंद है वो करें । टीवी देखें तथा आस पास लोगों से मिलें । उनका दुःख सुख पूछें। आपको अच्छा लगेगा।
मैंने देखा उनके चेहरे से उदासीनता की परतें छंट रही थीं। मैंने हिम्मत करके पुनः कहा -- " आप मेरे पिताजी को देखिये , लखनऊ में अकेले रहते हैं। न पत्नी है न बहू, जो देख-भाल करे। diabetes और पथरी जैसे रोग से जूझते हुए भी अपना खाना स्वयं बनाते हैं और तब ही एक निवाला मुंह में जाता है । आपके पास तीन बेटे और तीन बहुएं हैं प्यार और सम्मान देने वाली और जो आपका ख़याल रखती हैं। लेकिन उनके पास तो तीन बेटियां हैं जो परदेस में रहकर उनका ख़याल भी नहीं रख सकतीं। लेकिन वो हमेशा खुद को व्यस्त रखते हैं। घर का काम स्वयं करते हैं। फिर टीवी चलाकर क्रिकेट देखते हैं और देश-विदेश से जुडी खबरें सुनते हैं। और भूख लगने पर पुनः रसोई में जाकर कुछ भोजन का जुगाड़ करते हैं। और व्यस्त रहते हैं अपनी दिनचर्या में। जब किसी बेटी का फ़ोन आता है तो चहक पड़ते हैं और लग जाते हैं पूछने ढेरों सवाल - क्या समाचार है?, दामाद जी कैसे हैं ?, बच्चे कैसे हैं ?, ठीक से खाना-पीना, स्वास्थ्य का ध्यान रखना, तुम लोग कब आ रहे हो इत्यादि ।
मैंने देखा माँ की आँखों में नयी चमक आ गयी थी और चेहरे पर एक नयी स्फूर्ति । मेरी चर्चा सफल रही । कल देवर का फोन आया , पूछा -" कैसी हो माँ ?"
माँ ने कहा - " मैं बिलकुल मस्त हूँ यहाँ , और अब अगले वर्ष अगस्त में आऊँगी भारत" । कहकर वो मेरी तरफ मुड़ीं और मुस्कुरायीं ।
आजकल माँ को एक नया काम सौंपा है - ब्लॉग लिखने का। मुझसे पूछती हैं- किस विषय पर लिखूं ?
मैंने कहा- " आपको तीन महीने का वक़्त देती हूँ एक अच्छा सा टॉपिक सोचिये। माँ busy हैं , टॉपिक सोचने में।
और समीर जी परेशान हैं ये सोचने में की आखिर ये चमत्कार हुआ कैसे ? मुझसे पूछा आखिर सब "सेट-राईट " किया कैसे?
हमने भी कह दिया - " ब्लोगिंग बुरा नशा है। माँ को टॉपिक decide करने दीजिये।