लोकतंत्र बहाल रहे इसके लिए ज़रूरी है समाज में हर तरह की विचारधारा को स्थान मिले! और विभिन्न विचार सुरक्षित रहे समाज में इसके लिए हर तरह के स्वर उठने चाहिए , उनका दमन नहीं किया जाना चाहिए ! आवाज़ दो तरह से उठती है , एक सड़कों पर उत्तर कर क्रान्ति आती है , दूसरा लेखन के माध्यम से आवाज़ उठाई जाती है ! लेखन चिरकालीन है ! सदियों पुरानी घटनाएं भी लेखन के माध्यम से ही सुरक्षित रहती हैं ! सड़कों पर हुयी क्रांन्ति भी लेखन के माध्यम से ही संजोयी जाती हैं !यदि कोई लिखने वाला ही नहीं होगा और समसामयिक विषयों और मुद्दों पर वैचारिक मतभेदों को उजागर करने वाला ही नहीं होगा तो समाज में मोनोपोली हो जायेगी ! आने वाली संतति को सही और गलत को समझने की विभेदक बुद्धि नहीं मिलेगी ! समाज का सर्वांगीण विकास न होकर एकांगी विकास होगा और लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपना दम तोड़ देगा ! समाज भी शरीर में होने वाले पक्षाघात (पैरालिसिस) की तरह ही अपाहिज हो जाएगा !
लोकतंत्र में शिक्षा का सबसे बड़ा योगदान है ! जैसी जिसकी शिक्षा वैसी ही उसकी समझ और वैसा ही उसका लेखन ! बुद्धिजीवियों से एक विशेष आग्रह है की अपनी सोच को परिष्कृत कर समाज में सकारात्मक योगदान करें ! समाज में उठने वाली किसी भी विचार अथवा आइडियोलॉजी को दबाने की कुचेष्टा न करें ! आपकी प्रतिक्रियाएं दुराग्रहों से भरी हुयी ना होकर एक स्वस्थ प्रतिक्रिया होनी चाहिए ! पूर्वाग्रहों से रहित स्वस्थ विचार लिखें ! आपकी प्रतिक्रिया आपकी शिक्षा, संस्कार, पारिवारिक और सामाजिक परिवेश को उजागर करती है !
जय शारदे ! जय लोकतंत्र !