आज प्रातः समाज सेवकों के एक समूह से बात हुयी! वे लोग जाड़े की रातों में अपनी नींद त्यागकर गावों की तरफ निकल पड़ते हैं ! भोर होते ही प्रातः काल बड़ी संख्या में ग्रामीडों एवं किसानों को एकत्र करके उन्हें योगासन कराते हैं , उन्हें फसल उगाने की सही तकनीक से अवगत कराते हैं, खाद कैसे बनानी है और अन्य जानकारियाँ विस्तार से देते हैं ! खेती छोड़कर अन्य कामों की तरफ न भागें इस बात के लिए भी उनका मागदर्शन करते हैं ! किसानों की समस्याओं का हल बताते हैं , उनके हर प्रश्न का जवाब देते हैं , उनकी जिज्ञासाओं का समाधान बताते हैं! गावों की कच्ची सड़कों पर जाड़े की सर्द सुबहों में सफ़र भी कुछ आसान नहीं होता ,लेकिन ये जांबाज सेनानी डटे हुए हैं , निष्ठा के साथ अपने कर्तव्य पथ पर! इस कार्य को ये सेनानी निस्वार्थ रूप से देश और जनता की भलाई के लिए कर रहे हैं ! ये समूह तो गुमनाम ही है ! इनके योगदान न कहीं दिखाया जाता है , न हो कोई जानता है! मिडिया में तो बड़े लोगों के सपूतों को स्वर्णाक्षरों और स्वर्णचित्रों में दिखाया जाता है ! ये अमीर युवराज आखिर करते क्या है ग्रामीण जनता के लिए ? ...बस उनसे पूछते हैं - " आप लोगों को गुस्सा नहीं आता क्या? " ...और फिर चल देते हैं अपने महल की ओर , किसी दलित के घर की रोटी तोड़ने के बाद !
मन में अनायास ही एक प्रश्न आया की यदि निस्वार्थ कर्म करने वाले ये लोग हैं जो की अपने नियमित कामों और नौकरियों के साथ-साथ सर्द रातों में भी गरीबों की भलाई में तत्पर हैं , जो की सरकार को करना चाहिए या फिर पैसा लूटने वाले संगठनों करना चाहिए ! ...तो फिर सरकार किसलिए है ? व्यवस्थाएं किसलिए हैं ?
करे कोई और , मरे कोई और ? और सत्ता में होने का ऐश करे कोई और ? वाह !
खैर ...७० वर्षीय कर्नल साहब , श्रीमती सुनंदा जी, एवं हमारे युवा जो इन महान कार्यों में तत्पर हैं , उन्हें मेरा नमन एवं अभिनन्दन !
Zeal