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Saturday, June 7, 2014

शिक्षा एवं लोकतंत्र

लोकतंत्र बहाल रहे इसके लिए ज़रूरी है समाज में हर तरह की विचारधारा को स्थान मिले! और विभिन्न विचार सुरक्षित रहे समाज में इसके लिए हर तरह के स्वर उठने चाहिए , उनका दमन नहीं किया जाना चाहिए ! आवाज़ दो तरह से उठती है , एक सड़कों पर उत्तर कर क्रान्ति आती है , दूसरा लेखन के माध्यम से आवाज़ उठाई जाती है ! लेखन चिरकालीन है ! सदियों पुरानी घटनाएं भी लेखन के माध्यम से ही सुरक्षित रहती हैं ! सड़कों पर हुयी क्रांन्ति भी लेखन के माध्यम से ही संजोयी जाती हैं !यदि कोई लिखने वाला ही नहीं होगा और समसामयिक विषयों और मुद्दों पर वैचारिक मतभेदों को उजागर करने वाला ही नहीं होगा तो समाज में मोनोपोली हो जायेगी ! आने वाली संतति को सही और गलत को समझने की विभेदक बुद्धि नहीं मिलेगी ! समाज का सर्वांगीण विकास न होकर एकांगी विकास होगा और लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपना दम तोड़ देगा ! समाज भी शरीर में होने वाले पक्षाघात (पैरालिसिस) की तरह ही अपाहिज हो जाएगा !
लोकतंत्र में शिक्षा का सबसे बड़ा योगदान है ! जैसी जिसकी शिक्षा वैसी ही उसकी समझ और वैसा ही उसका लेखन ! बुद्धिजीवियों से एक विशेष आग्रह है की अपनी सोच को परिष्कृत कर समाज में सकारात्मक योगदान करें ! समाज में उठने वाली किसी भी विचार अथवा आइडियोलॉजी को दबाने की कुचेष्टा न करें ! आपकी प्रतिक्रियाएं दुराग्रहों से भरी हुयी ना होकर एक स्वस्थ प्रतिक्रिया होनी चाहिए ! पूर्वाग्रहों से रहित स्वस्थ विचार लिखें ! आपकी प्रतिक्रिया आपकी शिक्षा, संस्कार, पारिवारिक और सामाजिक परिवेश को उजागर करती है !

जय शारदे ! जय लोकतंत्र !

Monday, June 2, 2014

प्रजातंत्र

विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है भारत देश का ! लेकिन कि इस लोकतंत्र कि रक्षा का दायित्व उठाने वाले मात्र मुट्ठी भर हैं ! जनता जब मतदान करती है तो राष्ट्रहित में करती है, किसी व्यक्ति विशेष कि उपासक होकर नहीं ! नेतृत्व में आस्था उस नेता का सम्बल होता है , लेकिन अंधभक्तों द्वारा नेताओं का चरण-चुम्बन उस नेता का नुक्सान करता है और देश में गुंडाराज ला देता है !

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में बसपा से त्रस्त जनता ने अखिलेश यादव कि लहर को बना दिया ! जनता ने सोचा था कि अखिलेश इस राज्य को बेहतर बनाएगा ! शायद वो बेहतर बना भी पाता, लेकिन उसके अंधभक्त और अज्ञानी समर्थकों ने उसे पूरा बर्बाद कर दिया ! प्रदेश में गुंडाराज आ गया और अखिलेश यादव कि नेतृत्व-क्षमता और ऊर्जावान सोच ही समाप्त हो गयी !

इसी प्रकार इस बार लोकसभा चुनावों में जनता के बड़े हिस्से ने मोदी को जिताया है ! किन्तु एक बड़ा वर्ग आ भी आज भी उनके साथ नहीं है जो ये सिद्ध करता है कि देश में लोकतंत्र है ! सभी उपासक नहीं हैं किसी एक ही व्यक्ति विशेष के ! किन्तु भय एक बात का है कि कहीं मोदी-उपासक इस सरकार को भी बर्बाद न कर दें ! गुंडाराज न ला दें !मेरी पोस्टों पर आने वाले कुछ लोग मोदी के अंध-भक्त हैं जो देशहित में ना लिखकर पूर्वागहों से ग्रसित होकर टिप्पणी करते हैं , जिसमें वे अत्यंत खूंखार होकर दुराग्रह पर उत्तर आते हैं ! व्यक्तिवाद उचित नहीं है ! यदि वे इस तरह से काम करेंगे तो अखिलेश यादव के गुंडों और मोदी के गुंडों में कोई अंतर नहीं रह जाएगा !

निस्वार्थ होकर राष्ट्रहित में लिखिए , व्यक्तिवाद (किसी एक ही व्यक्ति कि उपासना) मत करिये तभी लोकतंत्र बहाल रहेगा !

Monday, March 4, 2013

अपना-अपना झरोखा ..

अजीत जी का एक आलेख पढ़ा , बहुत बढ़िया लिखा है, बस एक ही बात खटकी --"चिड़ियाघर"...मन तैयार नहीं ये मानने को की ब्लौगजगत एक चिड़ियाघर है और ब्लॉगर्स उस चिड़ियाघर का हिस्सा।

वाणी जी का तर्क बहुत अच्छा लगा- "अपने दिल की बात सच्ची-सच्ची लिखने का दम होना चाहिए बस "

एक दशक पूर्व तक हिंदी ब्लौगिंग का कोई नामो-निशान नहीं था ! लोग अपने मन की बात न कह पाते थे , ना ही लिख पाते थे!  लेकिन अब ये लाचारी नहीं है हमारे सामने। हिंदी ब्लौगिंग ने एक नया आयाम दिया है! आम जनता अपने मन की बात और अपने विचारों को सबके समक्ष रख सकती है।

हर व्यक्ति अपनी रूचि और ज़रुरत के अनुसार विभिन्न विषयों पर अपनी लेखनी चला रहा है, और इसी से लेखन में विविधता का भी कोई अभाव नहीं महसूस होता और पूरा ब्लॉगजगत इन्द्रधनुषी रंगों से सजा हुआ दिखता है।

किसी भी ब्लौग पर क्लिक करो, लोग अपनी-अपनी मासूम सी भाषा में अपने ह्रदय के भावों को निचोड़ कर रखे होते हैं। सभी को पढने में अलग ही आनंद आता है।

राजनीति पर पढना और लिखना सबसे ज्यादा अच्छा लगता है---

जो भरा नहीं है भावों से , बहती जिसमें रसधार नहीं,
वो ह्रदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

Zeal

Thursday, December 6, 2012

रंगे सियार ..


आखिर दोनों रंगे सियारों ने कल संसद में अपनी जात दिखा ही दी !

जय हिन्द !


Thursday, October 11, 2012

एक इकलौते वोट से बना गया प्रधानमन्त्री

बढती महत्वाकांक्षाओं ने हर किसी को प्रधानमन्त्री बनने के सपने दिखा दिए हैं ! हर कोई खुद को पोटेंशियल कैंडिडेट समझता है इस पद के लिए !  अब लद गए वो दिन जब जद्दोजहद होती थी अपनी पार्टी को जिताने की ! उम्र बीत जाती थी लेकिन अपनों के लिए कुछ करने का जज्बा समाप्त नहीं होता था !  लेकिन अब तो हर कोई खुद को ही हीरो समझता है और दूसरों को आईना दिखने में ही सबसे बड़ी काबिलियत समझता है !

आज कुकुरमुत्ते की तरह गली-गली में एक  स्कूल है और एक टूटपुंजिया सी राजनीतिक पार्टी खड़ी दिखाई देगी, लेकिन अफ़सोस तो ये है की अशिक्षित लाखों है और लोकतंत्र नदारद है ! 

एक ही पार्टी का प्रत्येक सदस्य खुद को प्रधानमन्त्री पद का दावेदार समझता है।  एक दुसरे का वोट काटकर खुद को चतुर समझता है।  वो दिन दूर नहीं जब ये सारे के सारे मौकापरस्त केवल अपने एक इकलौते वोट से ही जीतकर खुद को प्रधानमन्त्री बना हुआ समझेंगे ! 

मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं सभी ! 

  • नितीश को लगता है वो सबसे काबिल है  
  • राज ठाकरे तो खुद को खुदा सामझता है 
  • बाल ठाकरे को सुषमा सुहाती है 
  • अर्थशास्त्री तो अनर्थशास्त्री बनकर भी जमा हुआ है सत्ता में  
  • माँ का लाडला अमूल बेबी तो प्रधानमन्त्री  की कुर्सी को बपौती समझता है 
  • राउडी  राबर्ट के तो कहने ही क्या है , पूछता है अपनी सास से - " अमूल बेबी में ऐसा क्या है जो मुझमें नहीं है ? अगर वो बलात्कारी है तो मैं भी तो भ्रष्टाचारी हूँ, फिर मैं क्यों नहीं बन सकता प्रधानमन्त्री ? 
  • फिर प्रियंका गुस्से से तमतमाई, बोली- " नेहरू खानदान रीत है न्यारी, पत्नियाँ  होती हैं पतियों पर भारी , अतः प्रधानमंत्री तो सिर्फ मैं ही बनूंगी"
  • कजरारी अखियों वाले केजरीवाल का तो कहना ही क्या -अन्ना को गन्ने की तरह चूसकर किया किनारे , अब खुद को प्रधानमंत्री समझ रहा है और मुसलमानों को फंसाने के लिए उन्हें 11% आरक्षण का लालच दे रहा है ! क्योकि मुसल्मानों को खरीदना सबसे आसान जो है !
  • माया , मुलायम राबड़ी टाइप दलित तो दलितों के नाम पर आरक्षण लेकर गुडागर्दी करते हैं ! रहेंगे सब FIVE STAR  जैसे सुसज्जित बंगलों में और लूटेंगे देश को दलित बनकर ! 

 अब जिम्मेदारी उस समझदार वर्ग की है कि किसके इकलौते वोट से अपना वोट जोड़कर एक और एक दो कर दे। 

Zeal 

Monday, March 12, 2012

पॉलीटिक्स एवं महिलाएं

कुछ लोग कहते हैं - "मुझे पौलिटिक्स में रूचि नहीं है" । सच तो ये है की यह कहकर वे अपनी अज्ञानता पर पर्दा डालता हैं। अरे क्यों नहीं रूचि है भाई , देश-दुनिया की गतिविधियों पर भरपूर निगाह रखो । अच्छाई का समर्थन करो और अन्याय के खिलाफ जम कर विद्रोह करो। लोगों की यही अज्ञानता और तटस्थता तो मतदान में कमी लाती है और गुंडों का बोलबाला हो जाता है। ऐसी स्थिति में सही अर्थों में लोकतंत्र कैसे बहाल होगा ? जरूरी है देश का प्रत्येक नागरिक राजनीति और लोकतंत्र की पूरी जानकारी रखे। विशेषकर महिलाओं को इस दिशा में अपनी रूचि पैदा करनी होगी अन्यथा- "I hate politics" कहकर अपनी कमतरी को छुपाना व्यर्थ है।

Wednesday, March 7, 2012

देश का दुर्भाग्य...

भारत देश का ये दुर्भाग्य है की यहाँ की राजनीतिक पार्टियाँ सिर्फ अपने बारे में सोचती हैं। देश के बारे में सोचना उन्हें गुनाह लगता है। सपा और बसपा जैसे दल के नेताओं के पास इतनी बुद्धि ही नहीं है की वे राष्ट्र हित में सोच भी सकें। इनको तो ये भी नहीं पाता की जश्न कभी बन्दूक की गोलियों से नहीं मानना चाहिए। उस मासूम का गुनाह क्या था जिसकी मौत हो गयी। पत्रकारों की पिटाई क्यों की गयी। इतनी जल्दी यादव जी की पार्टी अपनी गुंडागर्दी दिखाएगी , ये मालूम न था। उत्तर प्रदेश की जनता ने कांग्रेस का बहिष्कार करके एक और अच्छा तो किया लेकिन गवारों के इस दल को जिताकर भारी भूल की है।

बीजेपी चाहती तो आसानी से इस समस्या का हल निकल सकता था। उन्हें अपने प्रधानमंत्री(मोदी) और उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री (सुश्री उमा भारती) का नाम स्पष्ट रूप से घोषित करना चाहिए था। गोल-मोल रखने से , ईर्ष्या द्वेष , आपसी फूट और षड्यंत्र की बू आती है। जब तक एक जुट नहीं होंगे तब तक गुंडा राज झेलना ही पड़ेगा। देश का धन निठाल्ले उड़ायेंगे और बाकि अपने स्विस खातों में जमा करते रहेंगे।