Showing posts with label Chanchal. Show all posts
Showing posts with label Chanchal. Show all posts

Thursday, July 21, 2011

सिमटते पन्ने - कहानी

आई ए एस की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद चंचल ने सात वर्ष तक नौकरी की , फिर कुछ परिस्थितियां ऐसी बनीं की नौकरी करना संभव नहीं हो सका ! चंचल ने अपनी अन्य जिम्मेदारियों के साथ लेखन में ही मन की शान्ति ढूंढ ली थी . लेखन के माध्यम से वह समस्त चराचर जगत से जुड़ गयी थी ! नाते रिश्ते , प्यार , जीवन मूल्य , संवेदनाएं और भावनाएं क्या होती हैं ये उसने लेखन के जुड़ने के बाद ही जाना था! लोगों को करीब से जानने और समझने लगी थी ! लेखन ही मानों उसका संसार हो गया था ! खुश थी वो ! समस्त सृष्टि भी उसके साथ उसकी खुशियों में शामिल थी ! उसे अपने जीवन का लक्ष्य मिल चुका था !

लेकिन मित्र विराग को ये अच्छा नहीं लगता था. वो उसकी खुशियों में शामिल नहीं हो पाता था ! उसे चंचल का लेखन फूटी आँखों नहीं सुहाता था ! हमेशा उससे यही कहता रहता था की उसका लेखन व्यर्थ है , वह अपनी शिक्षा और योग्यता का दुरुपयोग कर रही है ! वह चंचल से नौकरी करने के लिए कहता था ! वो कहता था की यदि चंचल पैसे कमाएगी तो उसे सबसे ज्यादा ख़ुशी होगी !

चंचल जानती थी की जो उसकी ख़ुशी में आज नहीं शामिल है वो उसको मिलने वाली कल किसी दूसरी उपलब्धि पर भला कैसे खुश हो सकता है ! लेकिन समय बलवान होता है ! विराग के बार बार कहने पर उसने नौकरी कर ली ! सफलता की अनेक ऊँचाइयाँ चढ़ती चली गयी ! धन के मार्ग पर एक बार आने के बाद कोई वापस मुड कर नहीं देखता ! चंचल बहुत आगे निकल चुकी थी ! वो पहले भी खुश थी ! और आज भी ! लेकिन विराग अब अकेला था ! चंचल को ढूंढता था उसके लिखे हुए पन्नों में !

Monday, June 20, 2011

चंचल -- कहानी

एक लड़की थी। नाम था 'चंचल' सीधी -साधी लड़की थी , किसी का दिल नहीं दुखाती थी। जहाँ तक बन पड़ता था गैरों के दुःख सुख में शामिल होती थी। बच्चे , बूढ़े , स्त्री-पुरुष सभी की अपनी थी वो कभी बुरा नहीं मानती थी किसी बात का। कोई बात हो भी जाए तो समझने प्रयास करती थी , लेकिन अपने मन में द्वेष नहीं रखती थी , कोशिश करती थी अपनापन बना रहे। धीरज और साहस ही उसकी ताकत थी

उसका एक मित्र था मिहिर मिहिर बुद्धिमान था, विद्वान् था और अन्य भी बहुत से गुणों की खान था। लेकिन अकसर अपने व्यवहार से चंचल को दुःख देता रहता था। चंचल उन बातों का बुरा ना मानकर अपने कामों में व्यस्त रहती थी। वो उसके अवगुणों पर ध्यान देने के बजाये उसके गुणों को ज्यादा सम्मान देती थी। लेकिन मिहिर इस बात से बहुत परेशान रहता था की चंचल को गुस्सा क्यूँ नहीं आता ? इतना शांत कैसे रख पाती है स्वयं को ?

चंचल जितना ही शांत रहती थी , मिहिर उससे नाराज़ करने के प्रपंच रचता रहता था। बार-बार उसके दिल को चोट पहुंचाता था। सफल भी रहता था, लेकिन चंचल हर बार उसे माफ़ कर देती थी। चंचल का माफ़ कर देना ही मिहिर को अपनी पराजय लगता था। वो चाहता था की चंचल उससे झगडा करे। क्यूंकि वो जानता था की जिस दिन वो उससे नाराज़ होकर झगडा करेगी उसी दिन उसकी विजय होगी।

चंचल बखूबी समझती थी उसके अहम् को उसका चुप रहना भी मिहिर के अहंकार को पोषित करता था। मिहिर का तिलमिलाया अहम् चंचल को हर हाल में पराजित देखना चाहता था वो उसके शांत स्वभाव को तोड़ देना चाहता था। ऐसी बातें करता था जिससे उत्तेजित होकर वो अपना धैर्य खो दे और गुस्से में कुछ अनुचित कहे अथवा करे। लेकिन वो हमेशा असफल रहता था।

एक दिन मिहिर ने चंचल का इतना अपमान किया की वो रो दी। चंचल को रोते देखकर मिहिर को अपने विजयी होने का एहसास हुआ। फिर एक बार चंचल ने उसे माफ़ कर दिया।

--------------------

मेरा आपसे दो प्रश्न है --

- क्या चंचल को अपमान से तिलमिलाकर मिहिर से नाराज़ हो जाना चाहिए था अथवा रोने के बाद पुनः अपने शांत स्वभाव के कारण मिहिर को माफ़ करके उसने उचित किया ?
Link
- मिहिर जैसे लोग , जो एक अति शांत से व्यक्तित्व को भी दुखी कर देते हैं , जो की किसी भी प्रकार से उसका नुकसान नहीं कर रहे , दुःख नहीं दे रहे , मित्र-धर्म भी निभा रहे हैं , क्यूँ ऐसा करते हैं ? इसके पीछे मिहिर की मानसिकता क्या है ? क्या मिहिर कमज़ोर है जो किसी को रोता देखकर विजयी महसूस करता है? किसी को तोड़ देना ही क्यूँ ध्येय होता है किसी का ?

लोग किसी के शांत स्वाभाव से भी द्वेष क्यूँ रखते हैं। मधुर संबंधों को मधुरता के साथ क्यूँ नहीं जीते ?

Zeal