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Tuesday, August 14, 2012

चिकित्सा क्षेत्र के जनक -Father of Medicine and Surgery

अठाहरवीं शताब्दी से पहले ना तो विश्व में ऐलोपैथी नाम की कोई चिकत्सा पद्धति थी और ना ही होमोपैथी थी। योरूप में चिकित्सा विज्ञान नहीं के बराबर था जब कि चिकित्सा क्षेत्र में भारत के प्राचीन ग्रंथ सक्षम, विस्तरित तथा उच्च कोटि के थे। पौराणिक वैद्य धन्वन्तरी के अतिरिक्त ईसा से पाँच शताब्दी पूर्व सुश्रुत और ईसा के दो सौ वर्ष पश्चात शल्य चिकित्सक चरक और अत्रेय के नाम मानवी चिकित्सा के क्षेत्र में मुख्य हैं। चरक और सुश्रुत विश्व के प्रथम फिज़ीशियन और सर्जन थे जिन्हों ने आधुनिक चिकित्सा पद्धति की नींव रखी।

सुश्रुत

सुश्रुत को प्रेरणाधन्वन्तरी से प्राप्त हुई थी। सुश्रुत ने संस्कृत में रोगों की जाँच के बारे में ग्रंथ लिखा तथा उन के उपचार भी बताये। उन की कृति में शल्य चिकित्सा, हड्डियों की चिकित्सा, औषधियाँ, आहार, शिशु आहार तथा स्वच्छता और चिकित्सा के बारे में उल्लेख किया गया हैं। इस कृति के पाँच भाग हैं। सुश्रुत दूारा करी गयी कई शल्य चिकित्सायें आधुनिक काल में भी कठिन मानी जाती हैं। सुश्रुत ने 1120 रोगों का वर्णन किया है तथा उन के उपचार निरीक्षण दूारा बताये हैं।

सुश्रुत ने कई शल्य उपचारों के बारे में लिखा है जैसे कि मोतिया-बिन्द, हरनियाँ, और शल्य क्रिया (सीजेरियन) दूारा जन्म-क्रिया। जाबामुखी शल्का यंत्र मोतिया-बिन्द के आप्रेशन में इस्तेमाल किया जाता था। सुश्रुत 121 प्रकार के शल्य यन्त्रों का प्रयोग करते थे जिन में लेनसेट्स, चिमटियाँ (फोरसेप्स), नलियाँ (कैथिटर्स), तथा गुप्तांगो के स्त्राव की निरीक्षण (रेक्टल एण्ड वैजाईनल स्पेकुलम्स) मुख्य हैं। शल्यक्रिया यन्त्र इतने तेज़ और सक्षम थे कि ऐक बाल को भी लम्बाई की दिशा में विभाजित कर सकते थे। ब्राह्मणों के विरोध के बावजूद भी सुश्रुत ने मृत शरीरों को शल्य प्रशिक्षशण देने हेतु प्रयोग किया तथा इसे आवशयक बताया था। उन्हों ने पाचन प्रणाली तथा शरीरिक विकास के बारे में लिखा हैः-

रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते।

मदेसोSस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसम्भ्वः।। (सुश्रुत)

अर्थात – मनुष्य जो कुछ भोजन करता है वह पहले पेट में जा कर पचने लगता है, फिर उस का रस बनता है, उस रस का पाँच दिन तक पाचन हो कर उस से रक्त पैदा होता है। रक्त का भी पाँच दिन पाचन हो कर उस से माँस बनता है……और इसी प्रकार पाँच पाँच दिन पश्चात माँस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा, तथा अंत में मज्जा से सप्तम सार वीर्य बनता है। यही वीर्य फिर ओजस् रूप में सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो कर चमकता रहता है। स्त्री के इसी सप्तम सार पदार्थ को रज कहते हैं। वीर्य काँच की तरह चिकना और सफेद होता है और रज लाख की तरह लाल होता है। इस प्रकार रस से ले कर वीर्य और रज तक छः धातुओं के पाचन करने में पाँच दिन के हिसाब से पूरे तीस दिन तथा लग भग चार घंटे लगते हैं। वैज्ञानिकों के मतानुसार चालीस सेर भोजन में से एक सेर रक्त बनता है और एक सेर रक्त से दो तोला वीर्य बनता है। इसी कारण से स्वास्थ रक्षा हेतु भारतीय विचारों में ब्रह्मचर्य पालन पर सर्वाधिक अधिक महत्व दिया जाता है।

सुश्रत प्रथम चिकित्सक थे जिन्हों ने ऐक कटे फटे कान के रोगी को उसी के शरीर के अन्य भाग से चमडी ले कर उपचार दूारा ठीक किया था। सुश्रुत को आधुनिक रिह्नोप्लास्टरी तथा नासिका के पुनर्निर्माण क्रिया का जन्मदाता कहना उचित होगा।

सुश्रुत ने शल्य क्रिया से पूर्व तैय्यारी के लिये नियमावली भी निर्धारित करी थी। उन का निर्देश था कि शल्य क्रिया से पूर्व घाव को स्टैरलाईज़ किया जाना अनिवार्य है जो कि आधुनिक एन्टीसेप्टिक सर्जरी की ओर पहला कदम माना जाता है।

चरक

चरक ने चरक-संहिता की रचना की है जो चिकित्सा शास्त्र का वृहद ग्रँथ (एनसाईक्लोपीडिया) है तथा भारत में आज भी प्रयोग किया जाता है। इस ग्रँथ के आठ खण्ड हैं जिन में रोगों की व्याख्या के साथ उपचार भी दिये गये हैं। ऐलोपैथिक चिकत्सकों के लिये जिस प्रकार यूनानी हिप्पोक्रेटिक्स की दीक्षा का महत्व है उसी प्रकार चरक ने भारत के चिकित्सकों के लिये नियमावली निर्धारित की थी। चरक ने अपने शिष्यों को दीक्षा दी थी किः

“यदि तुम चिकित्सा क्षेत्र में अपने लिये यश, सम्पदा और सफलता की अपेक्षा करते हो तो तुम्हें प्रति दिन जागने के पश्चात और सोने से पूर्व समस्त प्राणियों के भले के लिये ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये तथा तुन्हें अपने तन, मन और आत्मा से रोगी की देख-भाल करनी चाहिये। तुम्हें अपने रोगियों की उपेक्षा कदापि नहीं करनी चाहिये चाहे उन की देख भाल में अपनी जान भी गँवानी पडे। तुम्हे नशीले पदार्थों का सेवन, दुष्ट संगति तथा दुष्ट कर्मों से स्दैव बचना चाहिये। तुम्हें स्दैव प्रिय भाषी, सहनशील और अपनी ज्ञान तथा कार्य कुशलता जागृत करते रहने के प्रति उद्यत रहना चाहिये ”।

अत्रेय – अत्रेय ईसा से पाँच सौ वर्ष पूर्व हुये थे। उन्हों ने शल्य चिकित्सा के बारे में ग्रंथ लिखा है। उन के अनुसार माता पिता का बीज माता पिता की के निजि शरीर से स्वतन्त्र होता है किन्तु उस में माता पिता के समस्त गुण दोष सुक्षम रूप में समेटे होते हैं।

माता पिता दूारा संतान पर पडने वाले प्रभाव को मनु-समृति में भी विस्तार से उल्लेखित किया गया हैः-

क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान्।

क्षेत्रबीजसमायोगात्संभवः सर्वदेहिनाम्।।

विशिष्टं कुत्रचिद्बीजं स्त्रयोनिस्त्वेव कुत्रचित्।

उभयं तु सनं यत्र सा प्रसूति प्रशस्.ते।। (मनु स्मृति 9- 33-34)

स्त्री क्षेत्र रूप और पुरुष बीज रूप होता है। क्षेत्र और बीज के संयोग से सभी प्राणियों की उत्पति होती है। कहीं बीज प्रधान और कहीं क्षेत्र प्रधान होता है। जहाँ दोनो समान होते हैं वहाँ सन्तान भी श्रेष्ठ होती है।

बीजस्य चैव योन्याश्च बीजमुत्कृष्ट मुच्यते।

स्रवभूप्रसूतिर्हि बीजलक्षणलक्षिता।

यादृशं तृप्यते बीजं क्षेत्रे कालोपपादिते।

तादृग्रोहति तत्तस्मिन्बीजं स्वैर्व्याञ्जतं गुणैः ।। (मनु स्मृति 9- 35-36)

बीज और क्षेत्र में बीज को ही श्रेष्ठ कहते हैं क्यों कि सभी प्राणियों की उत्पति बीज के ही लक्ष्णानुसार ही होती है। समय पर जैसा ही बीज क्षेत्र में बोया जाये गा वैसे ही बीज के गुणों से युक्त क्षेत्र में पौधा निकलता है।

इयं भूमिर्हि भूतानां शाशवती योनिरुच्यते।

न च योनिगणान्कांशि्चद्बीजं पुष्यति पुष्टिषु।।

भूमावप्येककेदारे कालोप्तानि कृषीवलैः।

नानारुपाणि जायन्ते बीजानीह स्वभावतः।। (मनु स्मृति 9- 37-38)

यह भूमि सभी प्राणियों का निरन्तर उत्पति स्थान है, किन्तु कभी भी भूमि के गुण से बीज पुष्ट नहीं होता है। एक ही समय में एक खेत में कृषकों दूारा बोये हुए अनेक प्रकार के बीज अपने स्वभाव के अनुसार अनेक प्रकार से उत्पन्न होते हैँ।

उपरोक्त तथ्यों की वैज्ञानिक प्रमाणिक्ता को पाश्चात्य चिकित्सक भी आसानी से नकार नहीं सकते और ना ही यह अन्ध विशवास के क्षेत्र में कहे जा सकते हैं।

चिकित्सा सम्बन्धी ग्रन्थ

पाणनि कृत अष्टाध्याय़ी में कई रोगों के नाम उल्लेख हैं जिस से प्रमाणित होता है कि ईसा से 350 वर्ष पूर्व रोग जाँच प्रणाली विकसित थी। संस्कृत भाषा के शब्द-कोष ‘अमरकोश’ में शरीर के अंगों के नाम दिये गये हैं जो चिकित्सा पद्धति के विकास का प्रमाण हैं।

वाघतः ने625 ईसवी में छन्द तथा पद्य में ऐक चिकित्सा ग्रंथ की रचना की।

भाव मिश्र ने 1550 ईसवी में शरीर विज्ञान पर ऐक विस्तरित ग्रन्थ लिखा जिस में रक्त संचार प्रणाली का पूर्ण विवरण दिया है। यह उल्लेख पाश्चात्य विशेषज्ञ हार्वे से लगभग ऐक सौ वर्ष पूर्व लिखे गये थे। भाव मिश्रने सिफिल्स रोग में पारे दूारा उपचार की परिक्रया लिखी है। यह रोग पूर्तगालियों के माध्यम से भारत में अभिशाप बन कर आया था।

इन के अतिरिक्त निम्नलिखित प्राचीन ग्रंथों में भी चिकित्सा सम्बन्धी जानकारी दी गयी हैः-

  • नारायण सूक्त – मानव शरीर विशेषत्यः हृदय के बारे में लिखा है।
  • मालिनि शास्त्र ऋषि श्रगिं जड और चेतन शरीरों के बारे में लिखा है।
  • गरुड़ः विषनाशक औषिधयों के बारे में विस्तरित जानकारी दी है।

उपचार पद्धति

  • सुश्रुत तथा चरक दोनो ने ही रोगी की शल्य परिक्रिया के समय औषधि स्वरूप मादक द्रव्यों के प्रयोग का वर्णन किया है। उल्लेख मिलता है कि भारत में 927 ईसवी में दो शल्य चिकित्सकों ने ऐक राजा को सम्मोहिनी नाम की मादक औषधि से बेहोश कर के उस के मस्तिष्क का शल्य क्रिया से उपचार किया था।
  • नाडी गति निरीक्षण से रोग पहचान तथा उपचार का उल्लेख 1300 ईसवी तक मिलता है।
  • मूत्र-विशलेषण भी रोग पहचान का विशवस्नीय विकलप था।

चीन के इतिहासकार युवाँग चवँग के अनुसार भारतीय उपचार पद्धति सात दिन के उपवास के पश्चात आरम्भ होती थी। कई बार तो केवल पेट की सफाई की इसी परिक्रिया के दौरान ही रोगी स्वस्थ हो जाते थे। यदि रोगी की अवस्था में सुधार नहीं होता था तो अल्प मात्रा में औषधि का प्रयोग अन्तिम विकलप के तौर पर किया जाता था। आहार, विशेष स्नान, औषधीय द्रव्यों को सूंघना, इनहेलेशन, यूरिथ्रेल एण्ड वैजाइनल इनजेक्शन्स को ही विशेष महत्व दिया जाता था। भारतीय चिकित्सक विष के तोड की औषधि के भी विशेषज्ञ माने जाते थे।

अठाहरवीं शताब्दी तक योरुप वासियों को चेचक वेक्सीनेशन का प्रयोग नहीं आता था। किन्तु भारत में 550 ईस्वी में ही इस क्रिया का प्रयोग धन्वन्तरी के उल्लेख में मिलता है।

चेचक का टीका उपचार प्राचीन भारत में परम्परागत तरीके से होता था। उस विधि को ‘टिक्का’ की संज्ञा दी गयी थी। चीन में भी यह प्रथा 11वीं शताब्दी में गयी। यह उपचार ब्राह्मण ऐक तेज तथा नोकीली सूई के दूारा देते थे। इस का प्रयोग उत्तर तथा दक्षिण भारत में प्रचिल्लत था । पश्चात अँग्रेज़ों मे 1804-1805 इस्वी में इसे निषेध कर दिया था। निषेध करने का मुख्य कारण योरूप वासियों के विचार में शरीर में सूई से चुभन करना ईसाई परम्पराओं के विरुध था।

आचार के नियम

अन्य विद्याओं की भान्ति चिकित्सा विज्ञान भी सामाजिक नियमों तथा परमपराओं के सूत्र में बन्धा हुआ था। ऐक चिकित्सक के लिये रोगी का उपचार करना ही सर्व श्रेष्ठ सेवा थी।

चरक से भी बहुत समय पूर्व रामायण युग में भी रावण के निजि वैद्य सुषेण ने युद्ध भूमि में मूर्छित लक्ष्मण का उपचार किया था। यह वर्तान्त आधुनिक रेडक्रास धारी स्वयं सेविकी संस्थानो के लिये ऐक प्राचीन कीर्तिमान स्वरूप है तथा चिकित्सा क्षेत्र के व्यवसायिक सेवा सम्बन्धी परम्पराओं की भारतीय प्रकाष्ठा को दर्शाता है। उल्लेखनीय है शत्रु के दल में जा कर शत्रु का उपचार करने के बावजूद भी वैद्य सुषैण के विरुद्ध रावण ने कोई दण्ड नहीं दिया था।

चाँद शर्मा

Sunday, July 1, 2012

वेदों के देश भारत में आयुर्वेद की दशा

ऋषियों , मुनियों और विद्वानों की धरती से उसकी पहचान ही विलुप्त होती जा रही हैक्यों हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी पश्चिम की भाषा, संस्कृति और चिकित्सा पद्धति को अपना रहे हैंनिज पर गर्व नहीं करते , ना ही उसके महत्त्व को समझते हैं

आयुर्वेद न सिर्फ रोगी की चिकित्सा करता है अपितु स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा भी करता है।

स्वस्थस्य
स्वास्थ रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं च।

एलोपैथिक पद्धति तो मात्र २०० वर्ष पुरानी है , जबकि हमारा आयुर्वेद , ब्रम्हा जी के मुख से निकला है और हमारे वेदों में वर्णित हैआयुर्वेद , अथर्वेद का ही एक उपवेद है, जिसमें कायिक और मानसिक सभी व्याधियों का उल्लेख एवं निदान हैआज के समय के एड्स (AIDS), और सार्स (SARS) जैसी व्याधियों का भी सम्पूर्ण उल्लेख है हमारी वैदिक चिकित्सा पद्धति में

आयुर्वेद द्वारा आतुर (रोगी) की चिकित्सा की जाती है और स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा का प्राविधान है। इसके उहाहरण हमारे दीर्घायु ऋषि-मनीषी हैं। कंद मूल फल पर जीवित रहने वाले हमारे तत्कालीन विद्वानोंऔर बुद्धिजीवियों ने मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए एक चमत्कारिक , चिकित्सा पद्धति की रचना कर डाली थी। मुह में छाले हो अथवा पीलिया जैसा घटक रोग हो अथवा अस्थिभंग हो या फिर मधुमेह जैसा सुख्रोग हो, या पथरी हो, सभी का आशुकारी इलाज , बिना हानिकर प्रभावों वाली प्राकृतिक दवाईयों क्रमशः नकछीवक , अस्थि श्रंखला, स्ट्रिविया, गोक्षुरु आदि से अपने प्राकृतिक रूप चूर्ण, क्वाथ, आसव अथवा अरिष्ट के रूप में किया जाता है जो सर्वथा हानिकर प्रभावों से मुक्त है।

देव व्यपाश्रय और युक्ति व्यपाश्रय चिकित्सा द्वारा , इलाज करने वाले देवताओं के चिकित्सक 'अश्विनी कुमारों' की वैदिक चिकित्सा पद्धति है ये, जिसमें किस व्याधि का इलाज नहीं है भला ? दमा, राजयक्ष्मा, अतिसार , आमवात और प्रमेह से लेकर उन्माद आदि सभी व्याधियों की सम्पूर्ण चिकित्सा का वर्णन है , सुश्रुत, अष्टांग संग्रह आदि वृहदत्रायी और लघुत्रयी में

दीपावली से दो दिन पूर्व हम धनतेरस मनाते हैंजिसमें हम भगवान् धन्वन्तरी की पूजा करते हैंकौन हैं ये धन्वन्तरी ? समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर अवतरित हुए धन्वन्तरी को ही 'Father of medicine' कहा गया हैऔर सुश्रुत को 'Father of Surgery' कहा गया है

हमारी वैदिक चिकित्सा पद्धति में , उस समय भी शल्य क्रिया आज से कहीं ज्यादा उन्नत अवस्था में थीआज का 'Organ Transplant' और Plastic surgery जिसमें सफलता का प्रतिशत संशयात्मक ही बना रहता है , वही वैदिक काल में १०० प्रतिशत सफलता के साथ किया जाता था

सुशुत के काल में त्वचा की सात परतों के अध्ययन के लिए लाश को नदी में बाँध दिया जाता थाऔर गलन प्रक्रिया के बाद बहुत सफाई के साथ त्वचा की सातों परतों का अध्ययन सुलभ होता थाआज के दौर की 'Blood letting' , उस समय सफलतापूर्वक 'जोंक और 'श्रृंग' के माध्यम से होती थीउस समय भी शल्य क्रिया के बाद stitching होती थी , बस अंतर केवल इतना था की Catgut की जगह काले चींटों का सफलतापूर्वक इस्तेमाल होता था

समय के साथ विज्ञान ने जो तरक्की की इस पद्धति ने , उस तरक्की को पश्चिम ने एलोपैथ का नाम देकर उस पर अपनी मुहर लगा दीऔर भेंड-चाल जनता ने उसका अंधानुसरण करके अपनी वैदिक चिकित्सा पद्धति 'आयुर्वेद' को उपेक्षित कर दिया आज बड़े-बड़े चिकित्सा उपकरण विज्ञान की उप्लाधियाँ हैं , एलोपैथ की नहीं इसको प्रत्येक चिकित्सा पद्धति के साथ जोड़ा जाना चाहिए, किसी एक के साथ नहींताकि विज्ञान के अविष्कारों का लाभ लेते हुए आतुर ( रोगी ) की चिकित्सा की जा सके

हमारे वैदिक ग्रंथों में वर्णित 'नीम', 'हल्दी', 'ब्राम्ही' जैसे द्रव्यों को भी ये अपने नाम से पेटेंट करा कर सब पर कब्जा कर लेना चाहते हैंज़रुरत है हमें अपनी धरोहर की रक्षा करने की और अपनी चमत्कारिक वैदिक पद्धति में विश्वास करने की

चीनी, ग्रीक, रोमन, पर्सियन, इजिप्शियन , अफगानिस्तानी और यूरोपियन भी हमारे देश भारत आये और इस वैदिक पद्धति को सीखा इन्होनेलेकिन अफ़सोस की इन्होने हमारे वैदिक ग्रंथों का अनुवादन करके और थोड़ी हेर-फेर करके इसे आधुनिक पद्धति का नाम दे दिया, और विज्ञान के विकास के साथ जोड़कर खुद को ज्यादा उन्नत बता दियाभारत में अंग्रेजी शासन ने हमें गुलामी में जकड लिया और हमारे ग्रथों को नष्ट किया गयाउस समय उन्होंने इस चिकित्सा पद्धति की बहुत उपेक्षा की मुगलों ने इसे अरबी भाषा में अनुवादित करके इसी की सहायता से यूनानी पद्धति को जन्म दिया

अतः सभी चिकित्सा पद्धतियों के मूल में हमारी वैदिक चिकित्सा पद्धति 'आयुर्वेद' ही है, लेकिन इसे उपेक्षित और तिरस्कृत किया गयाआजादी के बाद आयुर्वेद ने पुनः अपनी प्रतिष्ठा को वापस प्राप्त किया है , और देश भर में १०० से ज्यादा आयुर्वेदिक विद्यायालाओं में विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं

७० के दशक के बाद से आयुर्वेद की लोकप्रियता विदेशों में बहुत बढ़ी है, वहां से विद्यार्थी इस पद्धति को सीखने निरंतर यहाँ रहे हैं, और अपने देश को समृद्ध कर रहे हैं , लेकिन अफ़सोस की हमारे अपने देश में इस वैदिक चिकित्सा पद्धति के प्रति जागरूकता बहुत कम है

काहे री नलिनी तू कुम्हलानी, तेरे ही नाल सरोवर पानी...

हमारे पास तो चमत्कारिक धन-सम्पदा है, लेकिन अफ़सोस की हमारे पास 'पारखी नज़रें' नहीं हैंपश्चिम की अंधी दौड़ ने हमें इस चमत्कारी चिकित्सा-पद्धति (आयुर्वेद) से होने वाले लाभों से वंचित कर रखा है, और मूढ़ जनता अनेक हानिकर प्रभावों वाली पश्चिमी चिकित्सा पद्धति से अपना इलाज करके स्वयं को क्षति पहुंचा रही है

Zeal

Wednesday, January 4, 2012

चोरी, ऊपर से सीनाजोरी ? -- कुछ शर्म कीजिये

आयुर्वेद कितना पुराना है , ये अमरीका और ब्रिटेन को भले ही पता हो लेकिन समस्त भारतवासी ये जानते हैं की आयुर्वेद , अथर्ववेद का एक उपवेद है जो सृष्टि की उत्पत्ति के समय ब्रम्हा जी के मुख से निकला है ! समुद्र मंथन के दौरान निकले रत्नों में से निकले धन्वन्तरी , जिनके नाम पर हम 'धनतेरस' मनाते हैं , को "Father of medicine" कहा गया है , तथा आचार्य सुश्रुत को "Father of surgery" कहा गया है !

सदियों पूर्व लिखे गए ग्रंथों के पृष्ठ यदि पलटें जाएँ , तो आसानी से देखा जा सकता है उस समय की चिकित्सा एवं शल्य-क्रिया कितनी उन्नत अवस्था में थी ! लेकिन अफ़सोस है कि भारत एक 'ब्लैक-एज' के दौर से गुजरा है , जिस दौरान भारत कि धरोहर, अनेक ग्रंथों को चोरी कर लिया गया और अनेक ग्रंथों को नष्ट कर दिया गया ! ये अमेरिका और ब्रिटेनवासी तो पक्के चोर हैं इन्होने हमारे ग्रंथों को चुराया फिर उसमें लिखित एवं वर्णित बातों को अपने नाम से पेटेंट करते हैं!

सन २००१ में अमेरिका ने हमारी हल्दी और नीम को अपनी खोज बताकर उसे अपने नाम से पेटेंट करा लिया और हम देखते रह गए ! हमारे आयुर्वेद में शताब्दियों पूर्व लिखे गए ग्रंथों में ही इनका उल्लेख हो चुका है ! ये उन्नीसवी शताब्दी में पैदा हुए एलोपैथ तो सिर्फ चोरी ही कर सकते हैं ! नया क्या करेंगे !

सन २००७ में चाइना ने दावा किया कि उसने 'एवियन-फ्लू' का इलाज 'कालमेघ' नामक औषधि द्वारा ढूंढ लिया है ! हमारे "AYUSH" [Department of Ayurveda, Yoga and naturopathy, unani, siddha and homeopathy ] विभाग ने अपने ग्रंथों का विवरण देकर, जिसमें कालमेघ आदि का सम्पूर्ण विवरण है , सन २०१० में चाइना से ये केस जीता और उसका पेटेंट वापस लिया !

आज के ताजा समाचार के अनुसार , ब्रिटेन ने दावा किया है कि 'अदरख' और 'कुटकी' द्वारा जुखाम (नजला, cold) का सफल इलाज इन्होने ढूंढ लिया है , और पेटेंट का दावा ठोंक दिया ! एक बार फिर 'AYUSH ', ने अपने पुराने ग्रंथों में वर्णित इन सभी औषधीय 'द्रव्यों' को प्रस्तुत करके ब्रिटेन के दावे को ख़ारिज किया !

ये विदेशी क्या जानें कि आज का AIDS, SARS और conjunctivitis जैसी अनेक व्याधियां तो सदियों पूर्व ही हमारे ग्रंथों में उल्लिखित हैं

धन्य हैं ये चोर देश जो हमारे देश से ग्रन्थ चोरी करके उसका अनुवाद करने के बाद उसे अपने नाम से पेटेंट कराते हैं। और शर्म आती है अपने ही देश के उन लोगों पर जो अपनी इस मूल्यवान धरोहर का सम्मान नहीं करते ! हमारी धरती वीरों और विद्वानों कि धरती रही है ! गणित से लेकर चिकित्सा तक , सभी विषयों पर मूल्यवान ग्रंथों कि रचना हमारे ऋषि और मनीषी पहले ही कर गए हैं ! ज़रुरत है तो स्वयं में स्वाभिमान पैदा करने कि और अपनी इस अनमोल धरोहर को सुरक्षित करने कि , ताकि ये विदेशी हमारी ओर अपनी गिद्ध दृष्टि कर सकें !

आइये एकजुट हो जाएँ और अपनी इस गौरवशाली सम्पदा कि रक्षा करें !

Zeal