इससे पहले की ब्लॉगजगत के सारे कवि और कवियत्री मिलकर मुझपर सड़े टमाटर और अंडें फेंके , मैं ये स्पष्ट कर दूँ की , अपवाद स्वरुप कुछ कवि मज़बूत ह्रदय वाले भी होते हैं ।
हो सकता है मैं गलत हूँ , लेकिन मुझे ऐसा लगता है कवि ह्रदय , अर्थात जो कवितायें लिखते हैं , उनकी एक मासूम सी खुशबूदार दुनिया होती है , जिसमें तितलियाँ है , कोयलें हैं , बसंत के इन्द्रधनुषी पुष्प पल्लवित हैं , कहीं पुरवाई तो कहीं मौसमी मंद बयार चल रही होती है , कहीं बुलबुल के नगमे होते हैं तो कहीं झींगुर , रात की नीरवता भंग करते हैं । कहीं अमराई है तो कहीं बलखाती अंगडाई है । कहीं प्रेम का कोलाहल है , तो कहीं काली रातों की कभी न चुकने वाली तन्हाई है । कहीं लबों पर मुस्कान थिरकती है तो कहीं आँखों में आँसू नर्तन करते हैं ।
चिंतित हूँ , इस कठोर दुनिया में कवि स्वयं को सँभालते कैसे हैं । वे न तो अपनी दुनिया से बाहर आते हैं , न ही कठोर-मना लेखकों को अपनी दुनिया में प्रवेश देते हैं ।
नमन है पद्य को गद्य का ....
पुनः याद दिला दूँ , टमाटर महंगे हैं , इन्हें यूँ न बर्बाद कीजिये मेरे ऊपर फोड़कर। आखिर क्षमाभाव रखना भी तो बडप्पन की निशानी है । और कवि ह्रदय बहुत विशाल होता है। करबद्ध प्रार्थना है , सभी कवियों से की नाराज़ होकर बोलना-बतियाना न बंद कर दीजियेगा मुझ मूढ़-अज्ञानी से।
कवियों को समर्पित एक पंक्ति ...
ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया
ये इंसान के दुश्मन रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ...
आभार ।
.
हो सकता है मैं गलत हूँ , लेकिन मुझे ऐसा लगता है कवि ह्रदय , अर्थात जो कवितायें लिखते हैं , उनकी एक मासूम सी खुशबूदार दुनिया होती है , जिसमें तितलियाँ है , कोयलें हैं , बसंत के इन्द्रधनुषी पुष्प पल्लवित हैं , कहीं पुरवाई तो कहीं मौसमी मंद बयार चल रही होती है , कहीं बुलबुल के नगमे होते हैं तो कहीं झींगुर , रात की नीरवता भंग करते हैं । कहीं अमराई है तो कहीं बलखाती अंगडाई है । कहीं प्रेम का कोलाहल है , तो कहीं काली रातों की कभी न चुकने वाली तन्हाई है । कहीं लबों पर मुस्कान थिरकती है तो कहीं आँखों में आँसू नर्तन करते हैं ।
चिंतित हूँ , इस कठोर दुनिया में कवि स्वयं को सँभालते कैसे हैं । वे न तो अपनी दुनिया से बाहर आते हैं , न ही कठोर-मना लेखकों को अपनी दुनिया में प्रवेश देते हैं ।
नमन है पद्य को गद्य का ....
पुनः याद दिला दूँ , टमाटर महंगे हैं , इन्हें यूँ न बर्बाद कीजिये मेरे ऊपर फोड़कर। आखिर क्षमाभाव रखना भी तो बडप्पन की निशानी है । और कवि ह्रदय बहुत विशाल होता है। करबद्ध प्रार्थना है , सभी कवियों से की नाराज़ होकर बोलना-बतियाना न बंद कर दीजियेगा मुझ मूढ़-अज्ञानी से।
कवियों को समर्पित एक पंक्ति ...
ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया
ये इंसान के दुश्मन रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ...
आभार ।
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