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Thursday, October 4, 2012

हाय काजल लगी मदहोश तुम्हारी आखें..

बला का हुस्न गज़ब का शबाब नींद  में है
है जिस्म जैसे गुलिस्ताँ गुलाब नींद में है

उसे ज़रा सा भी पढ़ लो तो शायरी आ जाए
अभी ग़ज़ल की मुकम्मल किताब नींद में है

मचल रही है मेरे दिल में दीद की हसरत
वो डाले चेहरे पे नीला नकाब नींद में है

वो इन्कलाब उठाता है ले के अंगडाई
सवाल जागा हुआ है जवाब नींद में है