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Sunday, April 3, 2011

टिप्पणियां खैरात में नहीं बंटती -- ब्लॉगिंग और ब्लॉगर्स का अपमान मत कीजिये -- हम भिखारी नहीं हैं -- कृपया किसी के स्वाभिमान पर चोट मत कीजिये.

"ब्लॉग जगत में अक्सर हम लोग ईमानदारी से काम नहीं कर पाते,गूगल द्वारा मुफ्त के दिए प्लेटफार्म पर, लेखनी का जौहर दिखाते हम लोग,अपने आपको महान लेखक मानते देर नहीं लगाते हैं और बची खुची कसर टिप्पणियों के बदले आई टिप्पणिया कर देती हैं !

खैरात के बदले खैरात में मुफ्त बँटती इन टिप्पणियों के कारण, हम सब, दिन प्रतिदिन अपने प्रभामंडल का विस्तार होते महसूस करते हैं और उस आभासी स्वयंभू प्रभामंडल को आत्मसात कर लेते हैं :-)

हार्दिक शुभकामनायें ! "

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उपरोक्त टिपण्णी में टिपण्णीकार का नाम नहीं दिया गया है , क्यूंकि नाम कभी जरूरी नहीं होता । लेकिन इस टिपण्णी में कही गयी बात शायद बहुत से टिप्पणीकारों के मस्तिष्क में शोर करती होगी इसलिए सोचा क्यूँ न इस पर थोडा मनन किया जाए।

उपरोक्त टिपण्णी में क्या झलक रहा है ? -- प्रशंसा ?, चाटुकारिता ? , नफरत ?, द्वेष ?, पूर्वाग्रह ?, ईर्ष्या , भड़ास ? , मन की विषाक्तता ? या फिर कुछ और ?

चूँकि यही टिपण्णी मुझे दो बार दी गयी , इसलिए आत्मावलोकन जरूरी हो गया की -

  • क्या मैं ईमानदारी से नहीं लिखती हूँ ?
  • क्या गूगल द्वारा मुफ्त में दिए गए प्लेटफार्म का अनुचित प्रयोग कर रही हूँ ?
  • क्या अनेक विषयों पर यथाशक्ति मन में आये विचारों को शब्दों में ढालना , अनावश्यक जौहर दिखाना हुआ? रसोईंघर में स्त्रियाँ प्रतिदिन अपना जौहर दिखाती हैं , लेकिन यदि बेलन की जगह कलम भी थाम ली जाए तो वह जबरदस्ती का जौहर कहलायेगा ?
  • मुझे तो नहीं लगता कोई ब्लॉगर स्वयं को 'महान लेखक' मान कर आसमान में उड़ने लगता है। सभी अपनी-अपनी यथाशक्ति लिख रहे हैं। अपनी बात औरों तक पहुंचा रहे हैं । इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है भला ? और इसमें जौहर दिखाने जैसी क्या बात है ?
  • टिप्पणियों के बदले टिप्पणियां किस प्रकार से कसर पूरा करती हैं ? टिप्पणियां तो विषय पर होती हैं , इसमें कसर पूरा करने, न करने का सवाल ही नहीं पैदा होता। जो लोग 'लेखक' को केंद्र में रखकर टिपण्णी करते हैं , उन्हीं पर यह दोष लगाया जाना चाहिए , हर एक पर नहीं।
  • खैरात के बदले खैराती टिप्पणियां ---खैरात भिखारियों को दी जाती है , ब्लॉगर भिखारी नहीं हैं , जिन्हें खैरात में टिपण्णी दी जाए।
  • टिप्पणियां विषय से प्रभावित होकर इमानदारी के साथ एक अनजान लेखक के लेख पर भी दी जाती हैं।
  • टिप्पणियां आपसी सद्भाव का भी प्रतीक हैं । जहाँ विचार मिलते हैं , वहीँ लोग टिपण्णी करना ज्यादा पसंद करते हैं।
  • टिपण्णी के बदले में टिपण्णी करना कोई 'पाप' नहीं है , न ही खैरात की श्रेणी में आता है।
  • किसी के आत्मविश्वास को 'आभासी स्वम्भू प्रभामंडल' कहना अनुचित प्रतीत होता है।
  • ये टिप्पणीकार अक्सर 'नवोदित ब्लॉगर्स' के लेखों पर ये कहते पाये गए हैं - " आपकी लेखनी में दम है-शुभकामनायें"......अब इनको कौन समझाए की इनकी शुभकामनाएं और 'मिश्री की डली' से नवोदित ब्लॉगर्स प्रोत्साहन और आत्मविश्वास पाकर जब बेहतर लिखने लगते हैं तब इनकी 'आभासी स्वम्भू प्रभामंडल' जैसी टिपण्णी मिलने लगती है ।

ब्लॉग और टिप्पणियों की संख्या - क्यूँ होती है टिप्पणियों की संख्या कहीं ज्यादा कहीं कम?

  • सर्प्रथम जो अच्छा लिखता है वो उसका फल भी पाता है। खैरात में कुछ नहीं मिलता । न ही खैरात देने वाला दिल रखते हैं लोग। ज्यादातर को बहुत गुना-भाग करते देखा है , टिपण्णी करने से पूर्व।
  • टिप्पणियां जितनी आप करेंगे , कमोबेश उतनी ही पायेंगे। कृपणता दिखायेंगे तो खैरात भी नहीं मिलेगी , चाहे लेख कितना भी उम्दा क्यूँ न हो।
  • कुछ लोग व्यस्तता के कारण ज्यादा टिपण्णी नहीं करते , न पाते हैं ।
  • कुछ लोग द्वेष और ईर्ष्या के चलते टिपण्णी नहीं करते , न पाते हैं ।
  • कुछ लोग दुसरे की थाली में रोटी गिनते रह जाते हैं , वही समय सार्थक टिपण्णी अथवा लेख लिखने में कर सकते हैं।
  • दूसरों के ब्लॉग पर विष-वमन करने से बेहतर है, विषय पर दो पंक्तियाँ लिखी जाएँ।
  • मन की घृणा को वश में रखकर , स्नेह को छलकने देना चाहिए टिप्पणियों में ।
  • पुरजोर कोशिश होनी चाहिए की टिप्पणियों से अपमान न होने पाये लेखक का।
  • कुछ लोग में passion होता है किसी कार्य को करने का । जो जितनी ज्यादा लगन से किसी कार्य को करता है , उसे उतनी ही ज्यादा सफलता मिलती है । यदि बात टिप्पणियों की संख्या पर भी लागू होती है।
  • ज्यादा लोगों को आप मान देंगे , ज्यादा लोग आपको मान देंगे। मुक्त हस्त बाटेंगे , मुक्त हस्त पायेंगे।
  • आप आलोचना करेंगे , आलोचना पायेंगे। प्रशंसा करेंगे, प्रशंसा पायेंगे। विषय पर टिपण्णी करेंगे, विषय पर टिपण्णी पायेंगे। जैसा करेंगे , वैसे भरेंगे।
  • दिल खोल कर प्यार लुटायेंगे, उतना ही वापस पायेंगे। नया क्या है ?
  • व्यक्तिगत आक्षेप करेंगे, लोग दूरी बना लेंगे।
  • किसी के विचार हमेशा नहीं मिलते । कभी सहमती तो कभी असहमति होती ही है । लेकिन जो लोग सदैव असहमत ही दिखें तो उनके मंतव्य जाहिर हो जाते हैं।
  • सबसे अहम् बात है की विचारों की समानता सदैव आकर्षित करती है । इसलिए सहृदय लोग परस्पर एक-दुसरे से जुड़ते चले जाते हैं और कारवां बनता जाता है ।

लिखने को बहुत कुछ है , लेकिन थक गयी हूँ , आगे आप भी कुछ लिखिए , विषय को आयाम मिलेगा ...

आभार

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Sunday, December 12, 2010

पूर्वाग्रह - एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण -- Cognitive biases.

हम सभी कहीं कहीं पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होते हैं, लेकिन शायद ही कोई स्वयं को पूर्वाग्रहों से ग्रस्त मानना चाहता होकिसी को अपनी जाति का बायस है, किसी को रंग-रूप का, किसी को शिक्षा का तो किसी को अपनी उम्र से जुड़े तजुर्बों का पूर्वाग्रह हैलेकिन है जरूर कुछ कुछ पूर्वाग्रह सभी कोजब हम कोई भी कार्य पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर करते हैं तो हम अपनी वास्तविक क्षमता का १००% वहां नहीं दे पाते हैंकार्यों की ख़ूबसूरती बाधित होती है तथा विषय के साथ न्याय नहीं हो पाता है

कभी-कभी ये बायस पोसिटिव भी होते हैं तथा त्वरित निर्णय लेने में सहायक होते हैंलेकिन अधिकांशतः यह मस्तिष्क की विकृत कार्य प्रणाली के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं , जो गलत तरीके से इस्तेमाल होते हैं तथा कु-तर्क का रूप धारण करते हैंकोगनिटिव बायस हमसे गलत निर्णय करवाता है तथा इन पूर्वाग्रहों से बचना अक्सर दुश्वार होता हैये पूर्वाग्रह , बीतते समय के साथ, व्यक्ति के व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैंजो हटाये नहीं हटते और छुडाये नहीं छूटतेसबसे अफ़सोस की बात तो यह है की व्यक्ति को ये पता ही नहीं होता की वो पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो चुका है

अनेकानेक तरह के पूर्वाग्रह , व्यक्ति की पुख्ता धारणाएं बना देते हैं , जो जरूरी निर्णयों, शोध कार्यों तथा चर्चाओं में अपना प्रभाव दिखाते हैंइनके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं

  • कई बार निर्णय लेते समय , किसी विशिष्ट सूचना पर ही पूरी तरह निर्भर करते हैं।
  • जो ज्यादातर लोग कर रहे हैं , उसीका अनुसरण करना , ये सोचकर की यही उचित होगा क्योंकि एक बड़ा समुदाय ऐसा कर रहा है । [ भेड़चाल मानसिकता ]
  • पूर्वाग्रहों से ग्रसित व्यक्ति खुद को कभी बायस्ड नहीं समझता , बल्कि दूसरों को पूर्वाग्रही समझता है।
  • पूर्वाग्रही अक्सर ऐसी सूचनाओं और आंकड़ों को इकट्ठा करते हैं जो उनकी पूर्वाग्रहों से ग्रसित सोच को बल देते हैं। जिससे उनका पूर्वाग्रह , समय के साथ और भी ज्यादा पुख्ता होता जाता है।
  • पूर्वाग्रही ऐसे सभी तर्कों को खारिज कर देता है जो उनकी धारणाओं के विपरीत होता है। वो स्वयं को सबसे अधिक सही मानता है तथा स्वयं को सर्वोपरि देखना पसंद करता है।
  • ये किसी भी विषय पर एक पहलू से इतना ज्यादा प्रभावित रहते हैं की विषय के अन्य दुसरे पक्षों पर विचार करना जरूरी नहीं समझते। इससे इनके निर्णय दोषपूर्ण हो जाते हैं तथा इनके कार्यों में कोई productive result नहीं आता।
  • बहुत बार किसी सूचना विशेष से इतना ज्यादा प्रभावित हो जाते हैं की उम्र भर उसी से चिपके रहते हैं तथा अनावश्यक रूप से उन्हीं सूचनाओं के आधार पर हमेशा गलत निर्णय लेकर स्वयं तथा दूसरों के लिए परेशानी का सबब बनते हैं।
  • भिन्न पूर्वाग्रहों के चलते ये मीडिया रिपोर्ट्स को भी पूर्वाग्रहों से ग्रसित मान लेते हैं।
  • पूर्वाग्रहों के आधार पर ये किसी व्यक्ति को उसकी क्षमता से अधिक आंक लेते हैं या फिर उसे कुछ समझते ही नहीं चाहे वो कितना ही प्रतिभाशाली क्यूँ न हो।
  • इन्हें कोई कितनी भी अच्छी राय दे अथवा तर्कों द्वारा समझाए , लेकिन पूर्वाग्रही व्यक्ति कुछ समझने के लिए तैयार नहीं होते हैं। क्यूंकि ये अपनी बनायी धारणाओं के साथ ही जीना चाहते हैं तथा समय के साथ थोड़े जिद्दी हो जाते हैं।
  • कई बार तो ये दूसरों का रिकॉर्ड ट्रेस करने में इतना लग जाते हैं की इनके पूर्वाग्रह अपनी पराकाष्ठा को छूने लगते हैं , ऐसी स्थिति में ये ला-इलाज हो जाते हैं।
  • पूर्वाग्रही व्यक्ति अकसर आस-पास घट रही नकारात्मक घटनाओं को ज्यादा महत्त्व देते हैं , बजाये इसके की आस पास हो रही सार्थक एवं सकारात्मक घटनाओं से ऊर्जा ली जाए।
  • पूर्वाग्रही व्यक्ति , निर्णय लेते समय किसी भी प्रकार की संभावनाओं को पूरी तरह से नकार देते हैं । यदि कोई घटना या disaster , पूर्व में नहीं घटा है , तो ये उस विषय पर सोचने या प्लान करने से इनकार कर देते हैं।
  • इनकी विशफुल थिंकिंग होती है जिसके द्वारा ये मन को अच्छी लगने वाली धारणाओं के अनुरूप ही निर्णय लेते हैं। इन्हें logic या rationality से कोई सरोकार नहीं होता।
  • एक बड़े खतरे में बड़ी न्यूनता लाने के बजाये ये छोटे-छोटे खतरों को शून्य पर लाकर अपने " zero risk bias " को संतुष्ट करते हैं।
  • ये पूर्व की घटनाओं [past] से इतना prejudiced होते हैं की अक्सर ये कहते मिलेंगे -- " I knew it all along "। ये लोग ये सिद्ध करना चाहते हैं की इन्हें सब कुछ पता होता है।

पूर्वाग्रही अक्सर पिटी-पिटाई लीक पर चलते हैं , नया नहीं ग्रहण करना चाहते , जिससे स्मृति विकृत होती है तथा misconception अपनी जडें गहरी करता हैये इनकी मानसिकता को बीमार करके इन्हें कुछ भी सकारात्मक करने से रोकती है

पूर्वाग्रही व्यक्ति की सोच का दायरा बहुत सीमित होता है तथा अक्सर ये समाज के लिए अनुपयोगी होते हैंऐसे व्यक्ति का फोकस विषय पर केन्द्रित होकर व्यक्ति पर ज्यादा केन्द्रित होता हैये अपनी सकारात्मक ऊर्जा को विषय पर लगाने के बजाये व्यक्ति विशेष पर ही व्यय कर देते हैं

पूर्वाग्रहों से ग्रसित व्यक्ति , शीघ्र ही अपने मित्रों तथा शुभचिंतकों को खो देते हैं

आभार