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Thursday, May 19, 2011

देश की दूसरी महिला प्रधानमंत्री - एक हिंदी ब्लॉगर.

कभी सोचा है आपने की 'हिंदी' भाषा किसी को प्रधानमन्त्री भी बना सकती है ? नहीं सुना न ? तो अब जान लीजिये कैसे मैं प्रधानमन्त्री बनी अपनी राष्ट्र भाषा हिंदी के कारण

एक दिन फोन की घंटी बज रही , हम ब्लौग लिख रहे थे , खैर भागकर फोन उठाया तो पता चला प्रधानमन्त्री मोहना का फोन था। बोले- "दिव्या busy हो क्या , कुछ ज़रूरी मुद्दों पर तुम्हारी राय लेनी थी ?" मैंने कहा - "नहीं, busy नहीं हूँ , आपके किसी काम सकूँ , ये तो सौभाग्य है , कहिये , क्या समस्या है ? "

मोहना - "आजकल ओबामा का बहुत नाम हो रहा है , कुछ बताओ की मैं क्या करूँ ताकि मेरी भी कुछ नाम हो विश्व स्तर पर "

दिव्या - " Sir, listen to your heart "

मोहना- कैसे सुनूँ अपनी , तुम तो जानती हो सोनिया जी की बात भी रखनी पड़ती है।

दिव्या- Sir , एक काम कीजिये, आप सोनिया जी को प्रधानमन्त्री बना दीजिये फिर बन्दूक उनके कंधे पर रखकर....

मोहना - वाह ! ग्रेट आईडिया !

तभी राहुल बाबा गए , बोले -

राहुल - आपकी बातें सुनीं , आप तो जबरदस्त रणनीतिज्ञ हो । "Will you marry me ?"

दिव्या - Sorry Sir , I am already taken । Beauty with brains की डिमांड ज्यादा रहती है और वे शीघ्र ही विवाह करके settle हो जाती हैं

राहुल- इतना घमंडी हो तुम !

दिव्या- अब इसमें घमंड की क्या बात है , जो सच है वो कह दिया आप क्या उम्मीद कर रहे थे की मैं कहूँगी - "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली ".........ना भाई न , इतना underestimate नहीं कर सकती स्वयं को वैसे आप उदास हों , आपके लिए कोई कोई सरल , सुशीला ढूंढ ही दूँगी।

राहुल बाबा कुछ आश्वस्त दिखे , चिंतामग्न होकर बोले - "दिव्या कोई रास्ता बताओ , माया बहन को सबक सिखाने का ---मैं अपनी राजनीति की शुरुवात उत्तर प्रदेश से ही करना चाहता हूँ"

दिव्या- आप तो बिलकुल सही दिशा में चल रहे हैं बस लगे रहिये। अभी UP police ने जो नर संहार किया है , उसके भंडाफोड़ में आपके बयान अनमोल हैं आपने गरीबों और प्रधानमन्त्री के मध्य वार्तालाप कराकर एक सेतु का काम किया है। आप बधाई के पात्र हैं लगे रहिये !! बस बचे रहिएगा कुछ कांग्रसी मानसिकता के संक्रमण से। वैसे हर प्रकार की आपदा से एक पुरुष को उसकी पत्नी ही बचाती है , इसलिए विवाह कर लीजिये समय रहते।

बहू की बात सुनते ही सोनिया जी भी गयीं। बेटे के हाथ से फोन छीन लिया ,बोलीं- " दिव्या आज बहुत बात करने का मन है तुमसे , कभी चैन के दो पल भी नहीं मिले मुझे ...कुछ बताओ मन को सुकून कैसे मिले "

दिव्या- देखिये सोनिया जी , मन को सुकून सिर्फ देश भक्ति करने से ही मिलता है और वो आपने किया नहीं कभी।

सोनिया - क्या बात करती हो तुम ! मैं तो इतने वर्षों से भारतीय राजनीति में हूँ, महिलाओं के ३३ % आरक्षण के भी हक में हूँ मोहना को अपनी कीमती राय भी समय समय पर देती रहती हूँ , और तुम कह रही हो....

दिव्या- आपने राजनीति की है , देशभक्ति नहीं होश संभालते ही तो आप विदेशी धरती पर गयीं अपने देश की मिटटी की सोंधी खुशबू क्या होती है , ये तो आपने जाना ही नहीं आपका बचपन, सखियाँ सहेलियां ....क्या आपको याद नहीं आती इन सबकी ?...

सोनिया जी नोस्टालजिक हो गयीं , उनकी आखों के कोरों से दो अश्रु की बूँदें टपक पड़ीं॥

थोडा संयत होकर बोलीं - अब क्या करूँ , इधर मोहना ने मुझे प्रधानमन्त्री बना दिया है तुम्हारे कहने पर , अब इतना बड़ा दायित्व छोड़कर जाऊं कैसे ?

दिव्या- चिंता कीजिये , प्रधानमंत्री पद के लिए 'मोदी' से बेहतर कोई ना मिलेगा। फ़ौरन उन्हें सौंप दीजिये देश अच्छा चलायेंगे वे।

सोनिया- नहीं मोदी नहीं , मेरे वोटर नाराज़ हो जायेंगे। और फिर उनके खिलाफ भी सीडी वगैरह तैयार रखी होगी। इसलिए उनके प्रधानमंत्री बनते ही , वे जांचों के घेरे में जायेंगे। एक काम करो , तुम ही प्रधानमंत्री बन जाओ तुम्हें कोई जानता भी नहीं है , इसलिए तुमसे कोई ईर्ष्या द्वेष भी नहीं रखेगा। और फिर तुम तो हिंदी ब्लॉगर हो , इसलिए 'हिंदी' द्वारा दो अरब जनता को एक सूत्र में बाँध भी सकोगी। अब मैं कुछ दिनों के लिए इटली जाती हूँ। वहीँ खाऊँगी 'इटालियन पिज्जा '

क्या करती , सोनिया जी की बात नहीं टाल सकी और मैंने अंततोगत्वा शपथ ले ली प्रधानमन्त्री पद की

प्रधानमन्त्री दिव्या -

अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे इतने सारे मुद्दे और एक अकेली जान खैर , जो भी हो मैदान छोड़ का भाग तो नहीं सकती थी न।

शपथ लिए अभी दो दिन ही हुए थे की विरोधी अपना सर उठाने लगे। दिग्गी जी बोले - " दिव्या अपनी चल-अचल संपत्ति का उल्लेख करें " ....खैर मेरी निजी संपत्ति के नाम एक पुराना लैपटॉप मिला जो अक्सर हैंग हो जाता है।

अभी दिग्गी जी से निजात मिली ही थी की , डॉ अमर, आमरण अनशन पर बैठ गए- काला धन वापस लाओ नहीं तो दिव्या इस्तीफ़ा दें।

क्या करती ...ये हीरो बनें , इससे तो बेहतर था की मैं ही काला धन वापस मंगाकर लोगों के दिलों में राज करती। खैर हिम्मत करके काला धन बटोरने वालों की सूची जारी कर दी। लोग इतने प्रसन्न हुए की उन्होंने मेरा नाम उस सूची में होने के बावजूद मुझे ह्रदय से लगा लिया।

फिर क्या था , मुझमें भी जोश और हिम्मत , zeal ,वापस गयी --
  • सबसे पहले कसाब को पाकिस्तान भिजवाया
  • फिर घोटालेबाजों की संपत्ति को नीलाम करके उन्हें जेल भिजवाया
  • भारत और चढ़ाई करने वाले मुल्कों के मध्य चीन की दीवार से भी लम्बी दीवार के लिए निर्माण शुरू करवा दिया।
  • प्रत्येक जिले में आधुनिक चिक्तिसा सुविधाओं से युक्त अस्पताल और भव्य स्कूल का निर्माण शुरू ...
  • सभी बेरोजगार को रोजगार मिला man power कम पड़ने की स्थिति में अमेरिका से सस्ते लेबर को मंगवाया गया
  • देश से निकलने वाले टनों इलेक्ट्रोनिक कचरे को अमेरिका भेजा जाएगा recycle होने के लिए।
  • किसानों को खाद , बीज और कृषि सबंधी सभी सुविधाएं मुफ्त मुहैय्या। सूखे अथवा किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा की स्थिति में , किसानों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सरकार की होगी।
  • महिलाओं को harass करने वालों को पांच साल की बामशक्कत कैद।
  • पत्नी पर घरेलु हिंसा करने वाले पतियों को नौकरी से छुट्टी दिलाकर घर में बर्तन और झाड़ू-पोंछा करवाया जाएगा और पत्नी को नौकरी दी जायेगी।
  • लिस्ट जारी है ....

दिव्या के भ्रष्टाचार विरोधी मंत्री मंडल के सदस्य -

निर्मला कपिला जी ,
शोभना चौरे जी ,
अजित गुप्ता जी ,
राजेश कुमारी जी ,
एवं किरण बेदी जी

अब ज्यादा शोर मचाने की ज़रुरत नहीं की पुरुषों को मंत्री मंडल में क्यूँ नहीं शामिल किया गया। अरे भाई विरोधी दल जितना तगड़ा होगा , सरकार चलाने में उतने ही tough challenges आयेंगे। तभी हम अपना बेस्ट दे सकेंगे और कोशिश करेंगे की हमारा देश हर क्षेत्र में अग्रणी रहे इसलिए पुरुषों को अपने सशक्त विरोधी दल में रखा है। उम्मीद है opposition वाले सहयोग करेंगे।

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

जय हिंद !

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Monday, January 10, 2011

अजीमों शान शहंशाह , सलामत रहे ! -- Man of missiles !


देश की वो हस्तियाँ , जिनके स्मरण मात्र से ह्रदय , ऊर्जा एवं स्फूर्ति से भर जाता है , उसमें से एक शख्सियत हैं - डॉ . पी . जे . अब्दुल कलाम

१५ अक्टूबर १९३१ को जन्मे , भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति [२००२ से २००७ ] , जिनका पूरा नाम डॉ अवुल पक़िर जैनुलबदीन अब्दुल कलाम है, एक बहुत बड़ी हस्ती हैं जिन्होंने अपने कार्यों से पूरे देश को गौरवान्वित किया है। देशभक्ति और देश के विकास के लिए प्रयासरत इस भारत के रत्न को सादर नमन।

एक एरोनौटिकल इंजिनियर , जिसने DRDO एवं ISRO के साथ , बैलिस्टिक मिसाइल्स एवं रॉकेट टेक्नोलोजी पर कार्य किया। भारत के पोखरन-द्वितीय , नुक्लियर टेस्ट में इनका महत्वपूर्ण योगदान है।

डॉ कलाम का सपना है की , सन २०२० तक भारत एक सुपरपावर और विकसित देश बन कर उभरे । विज्ञान के क्षेत्र में डॉ कलाम के अभूतपूर्व योगदान हैं।

डॉ कलाम को मिले सम्मान -

  • पद्म भूषण - १९८१
  • पद्म विभूषण - १९९०
  • भारत रत्न - १९९७
  • Hoover medal [ अमेरिका का इंजीनियरिंग में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ]- २००७

डॉ कलाम द्वारा लिखित कुछ पुस्तकें -
  • Wings of fire
  • Ignited minds
  • India 2020
  • Indomitable spirit
  • Envisioning an empowered nation

देश के विकास के लिए समर्पित एक सच्चे भारतीय पर लेख लिखकर मन प्रसन्न एवं ऊर्जान्वित हैभारत माता के ऐसे सपूतों के आगे सर श्रद्धा से नतमस्तक हो उठता है

आभार


Saturday, January 1, 2011

हिंदी भाषा मेरी शान है , मेरी पहचान है -- मेरा १०० वां लेख !

अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी पर अपना शतकीय लेख लिखते हुए मन में अपार प्रसन्नता है

हिंदी ब्लॉग जगत से जुड़ने के बाद , पहली बार हिंदी भाषा से प्रेम हुआ और मन में अपार सम्मान पैदा हुआ अपनी राष्ट्र भाषा के लिए इसके पहले कभी सोचा ही नहीं इस था विषय पर शायद अंग्रेजी स्कूलों में पढ़कर brainwash हो गया था , जहाँ हिंदी का एक शब्द बोलना भी गुनाह होता था और उसके उस गुनाह के लिए शिक्षकों द्वारा बेरहमी से उँगलियों के जोड़ों [ knuckles ] पर, लकड़ी की मोटी पटरी से मारा जाता था तथा प्रति शब्द एक रूपए का जुरमाना देना होता था

इस यातना से बचने के लिए , कोई भी विद्यार्थी हिंदी बोलने का गुनाह नहीं करता था इसे लिखते समय अपने Loreto Convent और Canossa Convent के शिक्षक [ Mother Superior , Mother terressa , sister Fillo , sister Lidwin , sister tessel ] आदि आँखों के सामने तैर गए, जिनसे बहुत बार हिंदी बोलने की सजा पायी थी .

इसके बाद उत्तरोत्तर उच्च शिक्षा में तो हिंदी भाषा में किताबों का अकाल सा रहता है मेडिकल के दौरान भी विदेशी लेखकों [ Davidson, Parkinson , Hutchinson ] की अंग्रेजी में लिखी किताबों को ही पढ़कर डिग्री हासिल की

शुक्र है माता-पिता और आस-पड़ोस वालों का जिनके कारण हिंदी में वार्तालाप का मौक़ा मिलता था तथा हिंदी सीखने में मदद मिली वरना कितनी शर्म की बात होती की एक हिंदी राज्य में रहकर और हिंदी "मातॄ-भाषा" होने के बावजूद हिंदी नहीं आती

दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में जहाँ गणित और विज्ञान में ९० प्रतिशत अंक जुटाए वहीँ हिंदी में क्रमशः ६१ और ६४ मिलने के कारण अंकों का प्रतिशत नीचे गिर गया मेडिकल की CPMT परीक्षा में हिंदी भी पास करना अनिवार्य था जिसमें एक बार फिर इश्वर ने बचा लिया क्यूंकि १५० में से ७५ अंक लाना अनिवार्य था और मुझे मात्र ७५ अंक ही मिले थे यदि ७४ मिलते तो प्रवेश नहीं मिलता लेकिन BHU-PMT , AIIMS , Jipmer-Pondicherry , CBSE तथा AFMC आदि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में हिंदी में पास होना अनिवार्य नहीं था जो उस से एक राहत महसूस कराती थी लेकिन आज मुझे लगता है की हिंदी एक अनिवार्य विषय होना चाहिए और अंग्रेजी माध्यम से पढने वाले बच्चों की हिंदी काफी कमज़ोर होती है , जिस पर विशेष ध्यान देना चाहिए -

अंग्रेजी स्कूलों में पढने वाले विद्याथियों को हिंदी बोलने पर सजा और यातना नहीं मिलनी चाहिए , और ऐसे शिक्षकों के खिलाफ सख्त कारवाई करनी चाहिए जो बच्चों को हिंदी बोलने पर प्रताड़ित करते हैं जो बच्चे हिंदी जानते हैं और धारा-प्रवाह हिंदी में बात करते हैं , उनमें एक अलग ही आत्मविश्वास होता है जो उन्हें अन्य सभी क्षत्रों में भी बहुत आगे ले जाता है हिंदी सीखने , बोलने और लिखने से किसी की अंग्रेजी कमज़ोर नहीं हो जायेगी , अपितु आपके अन्दर निज पर अभिमान करने की प्रेरणा मिलेगी

भाषा और संस्कृति दिलों को जोडती है इसलिए अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करें, गर्व करें और प्रचार प्रसार करें
मैं उन लोगों की विशेष प्रशंसा करती हूँ जो दक्षिण भारतीय हैं, गुजराती हैं, बंगाली हैं, पजाबी हैं, मराठी हैं किन्तु फिर भी अपनी राष्ट्र भाषा का सम्मान करते हुए हिंदी भाषा से जुड़े हुए हैं

थाईलैंड में आकर मैंने देखा यहाँ के निवासी सिर्फ थाई भाषा में ही बात करते हैं , अपनी भाषा का सम्मान करते हैं और गर्व महसूस करते हैं यहाँ आकर विदेशी भी थाई ही बोलने लग जाते हैं उनसे भी काफी प्रेरणा मिली अपनी भाषा का सम्मान करने की

विदेश में बसे ज्यादातर भारतीय गुजराती , मराठी और ९० % दक्षिण भारत से हैं लेकिन वे सभी हिंदी में धाराप्रवाह बोलते हैं सिर्फ हिंदी भाषा ही है जो विदेशों में बसे , विभिन्न राज्यों से आये भारतीयों को एक सूत्र में बांधती है

मेरा व्यक्तिगत अनुभव है की जो काम अंग्रेजी से ना बनता हो उसे हिंदी से बनाया जा सकता है एक बार दिल्ली एयरपोर्ट पर अंग्रेजी में बात करने से लोग चिढ़कर कुछ कर नहीं रहे थे फिर एक उच्चाधिकारी से हिंदी में अपनी परेशानी कहने पर एक आत्मीयता का रिश्ता बना और कार्य चुटकियों में हो गया उसके बाद से अब हिंदी भाषा की महिमा का भान हो गया

एक हिंदी भाषा से जुडा हुआ रोचक किस्सा यहाँ लिख रही हूँ --

१८ मार्च २०१० को किरण बेदी जी थाईलैंड आई थीं जिनसे मुलाक़ात के लिए बड़ी बड़ी हस्तियाँ आमंत्रित थीं हॉल हिन्दुस्तानियों से भरा हुआ था लेकिन वातावरण में सिर्फ अंग्रेजी की धूम थी हर कोई ये बता देना चाहता था की उसकी अंग्रेजी किसी से कम नहीं है हर कोई किरण जी से सिर्फ अंग्रेजी में ही बात करना चाहता था, और वो भी मजबूरीवश अंग्रेजी में ही जवाब दे रहीं थीं लोगों की बे सर-पैर की अंग्रजी सुनकर मेरी सांस फूल रही थी , कि इनका अंग्रेजी वाक्य जो शुरू हो चुका है वो कब थमेगा कोई उतार , चढ़ाव, कॉमा , प्रश्न , ही कोई अंत किरण जी जैसे-तैसे इन अंग्रेजी मोहमाया में लिप्त सज्जन एवं सज्जनियों के प्रश्नों को समझकर उन्हें विनम्रता से उत्तर दे रही थीं और उनकी अंग्रेजी भावना का सम्मान कर रही थीं

फिर मेरे सब्र का बाँध टूट गया दो वाक्य हमने भी अंग्रेजी में बोलकर सबको ये सन्देश दे दिया की कम मत समझियो

उसके बाद शुरू हुआ मेरा और किरण जी का धाराप्रवाह हिंदी-संवाद उसके बाद तो पूरा वातावरण हिंदीमय हो गया लगा की भारत गया है थाईलैंड में सभी जोश में गए , नकाब उतार फेंका और सहज ही हिंदी में संवाद होने लगा सभी एक सूत्र में बंध गए , हिंदी भाषा से जो अपनापन अपनी भाषा में था वो अंग्रेजी में कहाँ ?

एक बार बड़ी बहिन से पूछा - " विश्वविद्यालय में अंग्रेजी में भौतिकी पढ़ाती हैं आप, सिमपोजियम attend करती हैं , लेक्चर्स देती हैं , फिर अपने मन के उदगार और कवितायें हिंदी में क्यूँ लिखती हैं ? उन्होंने कहा - " जैसे दिन भर की थकान सिर्फ घर आकर ही दूर होती है वैसे ही अंग्रेजी के आवरण को हटा , हिंदी में जो सुकून मिलता है ,वो अंग्रेजी भाषा में नहीं हैऔर यदि हिंदी भाषी लोग ही हिंदी में लिखने से कतरायेंगे तो बाकी लोग हिंदी का सम्मान कैसे करेंगे । "

मुझे लगता है , अंग्रेजी भाषा के स्कूल हिंदी के प्रचार प्रसार में बाधक हैंलेकिन यदि इन अंग्रेजी स्कूलों को हटा दिया जाए , तो शिक्षा की गुणवत्ता ही नहीं दिखेगीक्या वजह है अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षा का स्तर उंचा है ? मुझे लगता है , हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर उंचा करना बेहद जरूरी हैइसी से वहां की शिक्षा में गुणवत्ता आएगी और लोगों की हिंदी में भी रूचि बढ़ेगीवरना अंग्रजी के लिए दीवानापन दिनों दिन बढ़ता जाएगा

आज मुझे हिंदी में ब्लॉग लिखकर जो प्रसन्नता मिलती है , उसकी अभिव्यक्ति ठीक से करने के लिए मुझे और हिंदी सीखनी होगी राष्ट्र भाषा हिंदी में लिखने वालों को और हिंदी भाषा का सम्मान करने वालों को मेरा शत शत नमन

आभार