आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ--
अकेले ही आये हैं, और अकेले ही जाना है हम सभी को एक दिन। फिर भी जीवन के इस सफ़र में न जाने कितने ही अनगिनत लोग हमसे मिलते हैं बिछड़ने के लिए । कितने ही रिश्ते बनते और टूटते हैं प्रतिपल। बहुत बार सोचा इन रिश्तों का सच क्या है ? सिर्फ एक ही उत्तर मिला --
सब मिथ्या है इस जगत में। सत्य तो सिर्फ क्षणिक है। और हर क्षण इतना सूक्ष्म है , की सत्य को पकड़ कर नहीं रखा जा सकता । काल के घूमते चक्र के साथ सत्य भी तो प्रतिपल बदल रहा है । क्या है जो शाश्वत सत्य है ? क्या प्रेम सत्य है ? क्या हमारी भावनाएं सत्य हैं ? मन में चलने वाले विचारों के मंथन से उपजी असंख्य भावनाओं का सत्य क्या है ? इस पल प्रेम और अगले ही पल द्वेष में बदलती हमारी भावनाओं का सत्य कितना सूक्ष्म-कालिक है ।
जो शास्वत है- वो है बदलाव !.... " Change is the only thing which is constant "
कुछ भी अजर-अमर नहीं, सभी कुछ नष्ट ही होगा एक दिन। चाहे वो व्यक्ति हो या फिर व्यक्ति की भावनाएं। चाहे आस्था हो या फिर मान्यताएं। चूँकि हम समय को रोक नहीं सकते इसलिए समय के सूक्ष्मतम लम्हों से जुडा हुआ सत्य भी हमारे साथ नहीं रहता । लेकिन क्या हम कुछ नहीं कर सकते ? क्या चले जाने दें उन सुन्दर क्षणों को जो भुलाए नहीं भूलते ?
कर सकते हैं हम बहुत कुछ ! संजो लीजिये उन सुखद पलों को अपनी यादों में और लगा दीजिये ताला उन चंद लम्हों पर -- ११ दिन , १८ महीने, वो बारिश की रात ...
जब भी कोई हमे छोड़ के जाता है तो कोई वजह होती हैउसके पास , जिसका हमे सम्मान करना चाहिए । लेकिन कोई दूर रह सकता है क्या भला ? यादों के घेरे में कैद कोई बिछुड़ नहीं सकता।
वो पास रहे, या दूर रहे, नज़रों में समाये रहते हैं,
इतना तो बता दे कोई हमे , क्या प्यार इसी को कहते हैं ?