हम देश-विदेश के मुद्दों पर अटकें रहे और अपने ब्लॉगजगत में क्या हो रहा है , इसको नज़रंदाज़ करते चलें तो "चिराग तले अँधेरा" वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी। जहाँ देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने एकजुटता दिखाई वहीँ हिंदी-ब्लौगिंग में व्याप्त अभद्रता के खिलाफ एकता क्यूँ नहीं है। क्या डर है लेखकों को कि वे एक टिप्पणीकार खो देंगे और इसी डर से वे अभद्रता और अशिष्टता के खिलाफ आवाज़ उठाने से कतराते हैं। देश का भ्रष्टाचार तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक प्रत्येक इकाई स्वयं को नहीं सुधारेगी। महिलाओं को उनका हक मात्र महिला दिवस मनाने से नहीं मिलेगा अपितु उन्हें भी अपने समान ही भावनाओं एवं संवेदनाओं से युक्त इंसान समझने कि आवश्यकता है। इसी तरह हिंदी भाषा भी अपमानित होती रहेगी जब तक स्वयं हिंदी भाषी ही इसका दुरुपयोग करना बंद नहीं करेंगे।
हिंदी पत्र-पत्रिकाओं से इतर यदि हिंदी-भाषा का कहीं सर्वाधिक प्रयोग हो रहा है तो वह है हिंदी-ब्लॉगिंग। जहाँ कुछ ब्लॉगर साहित्य सृजन कर रहे तो कुछ लोग विभिन्न मुद्दों और विषयों पर लिखने के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय एवं मिठास-युक्त हिंदी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस तो यह है कि चंद ब्लॉग्स पर हिंदी जैसी पवित्र भाषा का उपयोग स्त्रियों को गाली देने के लिए किया जा रहा है और इसी अभद्रता और अशालीनता के ज़रिये ये लोग खुद को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं।
और सबसे ज्यादा अफ़सोस तो तब होता है जब स्थापित , वरिष्ठ एवं उम्रदराज ब्लॉगर (Arvind Mishra) इस तरह कि घिनौनी हरकत करते हैं। पराई-स्त्री को अपनी बपौती समझ गाली देकर ये स्वयं को जन्म देने वाली कोख का अपमान करते हैं। कैसे मुंह दिखाते हैं ये अपनी संतानों को और कैसे आँख मिलाते होंगे अपने घर कि लक्ष्मी से। यदि इनकी बातों का विरोध करो तो अनेकों लोगों का तुर्रा ये होता है कि बड़ों का सम्मान नहीं हो रहा।
बड़ों को सम्मान तब मिलता है जब वे छोटों के लिए आदर्श स्थापित करते हैं। छोटों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं , उनसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते और छोटों के प्रति स्नेह दृष्टि रखते हैं। ना कि जहाँ देखी स्त्री , वहीँ अपमानित करने के लिए उपस्थित हो गए। इन लोगों को ब्लॉगजगत के अन्य वरिष्ठ एवं बुज़ुर्ग ब्लॉगर्स से भी कुछ सीखना चाहिए। बिना दूसरों को मान दिए कोई भी सम्मान का अधिकारी नहीं हो सकता। प्यार और सम्मान माँगा नहीं जाता अर्जित किया जाता है।
अभद्रता का एक नमूना यहाँ देखिये-
"...... हम गाँव गिराव के आदमी बिच विच नहीं जानते -हम परेशां करने वाली कुतिया का दो रूप जानते हैं -एक खौरही कुतिया और एक कटही कुतिया और सबसे खराब जो कटही और खौरही दोनों हो .. ...मुझे तो लगता है ऐसे ज्यादातर मामलों में कुत्ते कुत्तियाँ इन मनुष्यों से बेहतर हैं और जग जानता है वे वफादार भी ज्यादा है ....."
अब देखिये Arvind Mishra, के विचार देखिये स्त्रियों के बारे में। यदि इनके हाथ कोई स्त्री नहीं आई तो वह कटही आदि बना दी जायेगी। और इनसे कोई पूछे कि पशु ही बेहतर हैं तो ब्लॉगिंग क्यूँ कर रहे हैं ? वफादार प्राणी तो इन्हें पढ़ नहीं रहे। और इनके परिवार कि स्त्रियों को किस श्रेणी में रखा जाए? खेद होता है इन्हें शिक्षित कहते हुए।
उपरोक्त भाषा का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर्स। उस पर आपत्ति जताने वाले तो कोई नहीं दिखे अपितु उनकी भाषा शैली कि प्रशंसा करते बहुतेरे नज़र आये। धन्य हैं ऐसे चाटुकार मित्र।
हाँ एक वरिष्ठ ब्लॉगर (श्री अनूप शुक्ल) ऐसे भी मिले जिसने परिवेश में फैली गन्दगी के खिलाफ आवाज़ निडर होकर उठायी -- ----
हिंदी पत्र-पत्रिकाओं से इतर यदि हिंदी-भाषा का कहीं सर्वाधिक प्रयोग हो रहा है तो वह है हिंदी-ब्लॉगिंग। जहाँ कुछ ब्लॉगर साहित्य सृजन कर रहे तो कुछ लोग विभिन्न मुद्दों और विषयों पर लिखने के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय एवं मिठास-युक्त हिंदी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस तो यह है कि चंद ब्लॉग्स पर हिंदी जैसी पवित्र भाषा का उपयोग स्त्रियों को गाली देने के लिए किया जा रहा है और इसी अभद्रता और अशालीनता के ज़रिये ये लोग खुद को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं।
और सबसे ज्यादा अफ़सोस तो तब होता है जब स्थापित , वरिष्ठ एवं उम्रदराज ब्लॉगर (Arvind Mishra) इस तरह कि घिनौनी हरकत करते हैं। पराई-स्त्री को अपनी बपौती समझ गाली देकर ये स्वयं को जन्म देने वाली कोख का अपमान करते हैं। कैसे मुंह दिखाते हैं ये अपनी संतानों को और कैसे आँख मिलाते होंगे अपने घर कि लक्ष्मी से। यदि इनकी बातों का विरोध करो तो अनेकों लोगों का तुर्रा ये होता है कि बड़ों का सम्मान नहीं हो रहा।
बड़ों को सम्मान तब मिलता है जब वे छोटों के लिए आदर्श स्थापित करते हैं। छोटों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं , उनसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते और छोटों के प्रति स्नेह दृष्टि रखते हैं। ना कि जहाँ देखी स्त्री , वहीँ अपमानित करने के लिए उपस्थित हो गए। इन लोगों को ब्लॉगजगत के अन्य वरिष्ठ एवं बुज़ुर्ग ब्लॉगर्स से भी कुछ सीखना चाहिए। बिना दूसरों को मान दिए कोई भी सम्मान का अधिकारी नहीं हो सकता। प्यार और सम्मान माँगा नहीं जाता अर्जित किया जाता है।
अभद्रता का एक नमूना यहाँ देखिये-
"...... हम गाँव गिराव के आदमी बिच विच नहीं जानते -हम परेशां करने वाली कुतिया का दो रूप जानते हैं -एक खौरही कुतिया और एक कटही कुतिया और सबसे खराब जो कटही और खौरही दोनों हो .. ...मुझे तो लगता है ऐसे ज्यादातर मामलों में कुत्ते कुत्तियाँ इन मनुष्यों से बेहतर हैं और जग जानता है वे वफादार भी ज्यादा है ....."
अब देखिये Arvind Mishra, के विचार देखिये स्त्रियों के बारे में। यदि इनके हाथ कोई स्त्री नहीं आई तो वह कटही आदि बना दी जायेगी। और इनसे कोई पूछे कि पशु ही बेहतर हैं तो ब्लॉगिंग क्यूँ कर रहे हैं ? वफादार प्राणी तो इन्हें पढ़ नहीं रहे। और इनके परिवार कि स्त्रियों को किस श्रेणी में रखा जाए? खेद होता है इन्हें शिक्षित कहते हुए।
उपरोक्त भाषा का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर्स। उस पर आपत्ति जताने वाले तो कोई नहीं दिखे अपितु उनकी भाषा शैली कि प्रशंसा करते बहुतेरे नज़र आये। धन्य हैं ऐसे चाटुकार मित्र।
हाँ एक वरिष्ठ ब्लॉगर (श्री अनूप शुक्ल) ऐसे भी मिले जिसने परिवेश में फैली गन्दगी के खिलाफ आवाज़ निडर होकर उठायी -- ----
- "....................एक खौरही कुतिया और एक कटही कुतिया और सबसे खराब जो कटही और खौरही किसके लिये आप कह रहे हैं यह आप भले न जानते हों लेकिन ब्लागजगत में जो आपको पढ़ता रहा है वह जानता है कि आपने किसके लिये यह कहा! जिसके लिये कहा कभी आप उसकी मानसिक क्षमताओं के प्रशंसक हुआ करते थे। आपसे बहुत छोटी उमर की उस महिला के लिये यह सब कहकर आप पता नहीं कौन ऊंचाई हासिल कर रहे हैं। यह निहायत खराब बात है। घटिया घराने की। निम्नकोटि की। मिसिरजी, सोचिये क्या करते हैं आप! सुधर जाइये! बड़े बनिये। उदार बनिये। "
कुछ हिंदी-भाषा के विद्वान् तो दूसरों के ब्लॉग से सामग्री चुराकर उस पर अश्लील साहित्य रचकर बड़ा बनना चाहते हैं। स्त्रियों को अपमानित करना कोई इस हिंदी-सेवी के ब्लॉग पर जाकर देखे। शर्म आती है इनके परिवार में माँ-बहन नहीं है क्या ? और हिन्दी-भाषा को कलंकित ही करना था तो हिंदी में स्नातक क्यूँ किया ?
हिन्दी-ब्लॉगिंग में ऐसी अभद्रता और अश्लीलता के खिलाफ आवाज़ न उठाना हमारी मानसिक नपुंसकता का दोत्तक है। रक्त जम चुका है, आत्मा सो चुकी है, नैतिकता मर चुकी है। होने दो अपमानित यदि होती है नारी और हमारी राष्ट्रभाषा तो । रोने दो भारत-माता को। उनके बेटे ही कपूत बनकर , उनकी बेटियों का अपमान कर रहे हैं तो कौन रक्षा करेगा भला।
चल रही है गुटबाजी , खेमेबाजी , हमारी अपनी हिन्दी-ब्लॉगिंग में। मठाधीशों का ही वर्चस्व है। भ्रष्टाचार सर्वत्र व्याप्त है। हिन्दी-ब्लॉगिंग भी अब आजाद नहीं। गुलामी में जकड ये सिसकने लगे इससे पहले इसे बचाना होगा।
दुयोधनों कि महासभाएं अब भी होती हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी विराजते भी हैं लेकिन बलि-वेदी पर चढ़ती स्त्री को बचाने अब कृष्ण अवतरित नहीं होते क्यूंकि मानसिकता नपुंसकता व्यक्ति को पुरुषार्थ करने से रोकती है। दुर्जन अपनी जात भले ही न छोडें लेकिन सज्जनों को निष्क्रिय नहीं होना चाहिए। कभी-कभी देश के प्रति , स्त्री के प्रति , राष्ट्र-भाषा के प्रति भी उदारता दिखानी चाहिए। ये हमारा नैतिक दायित्व भी है।
तटस्थ रहने वालों से बड़ा गुनाहगार कोई नहीं है।
Zeal