सभी ने अपने जीवन में प्यार का अनुभव तो किया ही होगा कभी न कभी या फिर हमेशा ही किसी न किसी के द्वारा। धनवान रही हूँ हमेशा से क्यूंकि "प्यार" जैसी बेशुमार दौलत को सदा ही पाया है। इतना प्यार मिलता है इसीलिए लुटाने के लिए भी मेरे पास प्रचुर मात्रा में रहता है।
किन्तु एक प्रश्न मन को उलझन में ड़ाल रहा है की प्रेम व्यक्ति को मज़बूत बनाता है या फिर कमज़ोर। मैंने लेखन छोड़ देने का जो निर्णय लिया था उसपर दृढ नहीं रह सकी क्यूंकि प्रेम करने वाले स्नेहीजनों की स्नेह्वर्षा से मैंने अपना निर्णय बदल दिया। तो क्या स्नेह ने कमज़ोर करके मुझसे मेरी दृढ़ता छीन ली। या फिर उठ खड़े होकर कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की ताकत दे दी ?
मुझे लगता है प्रेम में पिघला देने की ताकत होती है, बड़े-बड़े फौलाद को जो पिघला दे वह सिर्फ "निश्छल" प्रेम ही हो सकता है।
Zealकिन्तु एक प्रश्न मन को उलझन में ड़ाल रहा है की प्रेम व्यक्ति को मज़बूत बनाता है या फिर कमज़ोर। मैंने लेखन छोड़ देने का जो निर्णय लिया था उसपर दृढ नहीं रह सकी क्यूंकि प्रेम करने वाले स्नेहीजनों की स्नेह्वर्षा से मैंने अपना निर्णय बदल दिया। तो क्या स्नेह ने कमज़ोर करके मुझसे मेरी दृढ़ता छीन ली। या फिर उठ खड़े होकर कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की ताकत दे दी ?
मुझे लगता है प्रेम में पिघला देने की ताकत होती है, बड़े-बड़े फौलाद को जो पिघला दे वह सिर्फ "निश्छल" प्रेम ही हो सकता है।