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Thursday, September 15, 2011

प्यार ताकत देता है या फिर कमज़ोर करता है ?

सभी ने अपने जीवन में प्यार का अनुभव तो किया ही होगा कभी न कभी या फिर हमेशा ही किसी न किसी के द्वारा। धनवान रही हूँ हमेशा से क्यूंकि "प्यार" जैसी बेशुमार दौलत को सदा ही पाया है। इतना प्यार मिलता है इसीलिए लुटाने के लिए भी मेरे पास प्रचुर मात्रा में रहता है।

किन्तु एक प्रश्न मन को उलझन में ड़ाल रहा है की प्रेम व्यक्ति को मज़बूत बनाता है या फिर कमज़ोर। मैंने लेखन छोड़ देने का जो निर्णय लिया था उसपर दृढ नहीं रह सकी क्यूंकि प्रेम करने वाले स्नेहीजनों की स्नेह्वर्षा से मैंने अपना निर्णय बदल दिया। तो क्या स्नेह ने कमज़ोर करके मुझसे मेरी दृढ़ता छीन ली। या फिर उठ खड़े होकर कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की ताकत दे दी ?

मुझे लगता है प्रेम में पिघला देने की ताकत होती है, बड़े-बड़े फौलाद को जो पिघला दे वह सिर्फ "निश्छल" प्रेम ही हो सकता है।

Zeal

Monday, September 12, 2011

हिंदी भाषा के साथ अन्याय करते चंद हिंदी ब्लॉगर.

हम देश-विदेश के मुद्दों पर अटकें रहे और अपने ब्लॉगजगत में क्या हो रहा है , इसको नज़रंदाज़ करते चलें तो "चिराग तले अँधेरा" वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी। जहाँ देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने एकजुटता दिखाई वहीँ हिंदी-ब्लौगिंग में व्याप्त अभद्रता के खिलाफ एकता क्यूँ नहीं है। क्या डर है लेखकों को कि वे एक टिप्पणीकार खो देंगे और इसी डर से वे अभद्रता और अशिष्टता के खिलाफ आवाज़ उठाने से कतराते हैं। देश का भ्रष्टाचार तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक प्रत्येक इकाई स्वयं को नहीं सुधारेगी। महिलाओं को उनका हक मात्र महिला दिवस मनाने से नहीं मिलेगा अपितु उन्हें भी अपने समान ही भावनाओं एवं संवेदनाओं से युक्त इंसान समझने कि आवश्यकता है। इसी तरह हिंदी भाषा भी अपमानित होती रहेगी जब तक स्वयं हिंदी भाषी ही इसका दुरुपयोग करना बंद नहीं करेंगे।

हिंदी पत्र-पत्रिकाओं से इतर यदि हिंदी-भाषा का कहीं सर्वाधिक प्रयोग हो रहा है तो वह है हिंदी-ब्लॉगिंग। जहाँ कुछ ब्लॉगर साहित्य सृजन कर रहे तो कुछ लोग विभिन्न मुद्दों और विषयों पर लिखने के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय एवं मिठास-युक्त हिंदी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस तो यह है कि चंद ब्लॉग्स पर हिंदी जैसी पवित्र भाषा का उपयोग स्त्रियों को गाली देने के लिए किया जा रहा है और इसी अभद्रता और अशालीनता के ज़रिये ये लोग खुद को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं।

और सबसे ज्यादा अफ़सोस तो तब होता है जब स्थापित , वरिष्ठ एवं उम्रदराज ब्लॉगर (Arvind Mishra) इस तरह कि घिनौनी हरकत करते हैं। पराई-स्त्री को अपनी बपौती समझ गाली देकर ये स्वयं को जन्म देने वाली कोख का अपमान करते हैं। कैसे मुंह दिखाते हैं ये अपनी संतानों को और कैसे आँख मिलाते होंगे अपने घर कि लक्ष्मी से। यदि इनकी बातों का विरोध करो तो अनेकों लोगों का तुर्रा ये होता है कि बड़ों का सम्मान नहीं हो रहा।

बड़ों को सम्मान तब मिलता है जब वे छोटों के लिए आदर्श स्थापित करते हैं। छोटों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं , उनसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते और छोटों के प्रति स्नेह दृष्टि रखते हैं। ना कि जहाँ देखी स्त्री , वहीँ अपमानित करने के लिए उपस्थित हो गए। इन लोगों को ब्लॉगजगत के अन्य वरिष्ठ एवं बुज़ुर्ग ब्लॉगर्स से भी कुछ सीखना चाहिए। बिना दूसरों को मान दिए कोई भी सम्मान का अधिकारी नहीं हो सकता। प्यार और सम्मान माँगा नहीं जाता अर्जित किया जाता है।

अभद्रता का एक नमूना यहाँ देखिये-

"...... हम गाँव गिराव के आदमी बिच विच नहीं जानते -हम परेशां करने वाली कुतिया का दो रूप जानते हैं -एक खौरही कुतिया और एक कटही कुतिया और सबसे खराब जो कटही और खौरही दोनों हो .. ...मुझे तो लगता है ऐसे ज्यादातर मामलों में कुत्ते कुत्तियाँ इन मनुष्यों से बेहतर हैं और जग जानता है वे वफादार भी ज्यादा है ....."

अब देखिये Arvind Mishra, के विचार देखिये स्त्रियों के बारे में। यदि इनके हाथ कोई स्त्री नहीं आई तो वह कटही आदि बना दी जायेगी। और इनसे कोई पूछे कि पशु ही बेहतर हैं तो ब्लॉगिंग क्यूँ कर रहे हैं ? वफादार प्राणी तो इन्हें पढ़ नहीं रहे। और इनके परिवार कि स्त्रियों को किस श्रेणी में रखा जाए? खेद होता है इन्हें शिक्षित कहते हुए।

उपरोक्त भाषा का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर्स। उस पर आपत्ति जताने वाले तो कोई नहीं दिखे अपितु उनकी भाषा शैली कि प्रशंसा करते बहुतेरे नज़र आये। धन्य हैं ऐसे चाटुकार मित्र।

हाँ एक वरिष्ठ ब्लॉगर (श्री अनूप शुक्ल) ऐसे भी मिले जिसने परिवेश में फैली गन्दगी के खिलाफ आवाज़ निडर होकर उठायी -- ----
"....................एक खौरही कुतिया और एक कटही कुतिया और सबसे खराब जो कटही और खौरही किसके लिये आप कह रहे हैं यह आप भले न जानते हों लेकिन ब्लागजगत में जो आपको पढ़ता रहा है वह जानता है कि आपने किसके लिये यह कहा! जिसके लिये कहा कभी आप उसकी मानसिक क्षमताओं के प्रशंसक हुआ करते थे। आपसे बहुत छोटी उमर की उस महिला के लिये यह सब कहकर आप पता नहीं कौन ऊंचाई हासिल कर रहे हैं। यह निहायत खराब बात है। घटिया घराने की। निम्नकोटि की। मिसिरजी, सोचिये क्या करते हैं आप! सुधर जाइये! बड़े बनिये। उदार बनिये। "

कुछ हिंदी-भाषा के विद्वान् तो दूसरों के ब्लॉग से सामग्री चुराकर उस पर अश्लील साहित्य रचकर बड़ा बनना चाहते हैं। स्त्रियों को अपमानित करना कोई इस हिंदी-सेवी के ब्लॉग पर जाकर देखे। शर्म आती है इनके परिवार में माँ-बहन नहीं है क्या ? और हिन्दी-भाषा को कलंकित ही करना था तो हिंदी में स्नातक क्यूँ किया ?

हिन्दी-ब्लॉगिंग में ऐसी अभद्रता और अश्लीलता के खिलाफ आवाज़ न उठाना हमारी मानसिक नपुंसकता का दोत्तक है। रक्त जम चुका है, आत्मा सो चुकी है, नैतिकता मर चुकी है। होने दो अपमानित यदि होती है नारी और हमारी राष्ट्रभाषा तो । रोने दो भारत-माता को। उनके बेटे ही कपूत बनकर , उनकी बेटियों का अपमान कर रहे हैं तो कौन रक्षा करेगा भला।

चल रही है गुटबाजी , खेमेबाजी , हमारी अपनी हिन्दी-ब्लॉगिंग में। मठाधीशों का ही वर्चस्व है। भ्रष्टाचार सर्वत्र व्याप्त है। हिन्दी-ब्लॉगिंग भी अब आजाद नहीं। गुलामी में जकड ये सिसकने लगे इससे पहले इसे बचाना होगा।

दुयोधनों कि महासभाएं अब भी होती हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी विराजते भी हैं लेकिन बलि-वेदी पर चढ़ती स्त्री को बचाने अब कृष्ण अवतरित नहीं होते क्यूंकि मानसिकता नपुंसकता व्यक्ति को पुरुषार्थ करने से रोकती है। दुर्जन अपनी जात भले ही न छोडें लेकिन सज्जनों को निष्क्रिय नहीं होना चाहिए। कभी-कभी देश के प्रति , स्त्री के प्रति , राष्ट्र-भाषा के प्रति भी उदारता दिखानी चाहिए। ये हमारा नैतिक दायित्व भी है।

तटस्थ रहने वालों से बड़ा गुनाहगार कोई नहीं है।

Zeal

Tuesday, September 6, 2011

क्या स्पष्टीकरण की ज़रुरत पड़ती है ?

जब कोई किसी को अनायास ही गलत समझ लेता है तो वह व्यक्ति अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की चेष्टा करता है। लेकिन मुझे लगता है कि ऐसी अवस्था में स्पष्टीकरण कि आवश्यकता नहीं होती। क्यूंकि जिनका हमपर स्नेह एवं विश्वास होता है वे हमें गलत कभी समझते नहीं। और यदि गलती से गलत समझ भी लेते हैं तो खुद बखुद समय के साथ समझ भी जाते हैं। लेकिन जो मन में द्वेष रखते हैं , कान के कच्चे होते हैं , दूसरी के दिए गए तथ्यों पर जल्दी विश्वास कर लेते हैं और अपनी ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करने से परहेज़ करते हैं , वे ही दूसरों द्वारा प्रस्तुत किये गए तथ्यों पर यकीन करके किसी को अनायास ही गलत समझने कि गलती करते हैं। ऐसे लोगों को स्पष्टीकरण देने का कोई लाभ भी नहीं होता क्यूंकि - " दुश्मनों को स्पष्टीकरण समझ नहीं आता , जबकि अपनों को स्पष्टीकरण देने कि ज़रुरत ही नहीं पड़ती"

"Friends do not need explanation while foes do not understand explanation"

ऐसा करके वे कुछ अच्छे और कुछ सच्चे लोगों को खो देते हैं। इसलिए किसी के बारे में राय बनाने से पहले पूरे सच कि जान लेने कि कोशिश अवश्य करनी चाहिए। वरना "कव्वा कान लेकर भागा" वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।

सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर लेना आपके कान कच्चे होने के परिचायक हैं, जिसके बारे में राय बनायीं है , उसकी कमजोरी के नहीं। इसलिए दूसरों के बारे में गलत राय निर्धारण से पहले अपने व्यक्तित्व को दृढ करने कि ज्यादा आवश्यकता है।

खतावार समझेगी दुनिया तुझे...
अब इतनी जियादा सफाई ना दे..

Zeal

Monday, September 5, 2011

प्रेम के साँचे

प्रेम तो एक ही है। किसी भी व्यक्ति में किसी के भी लिए ह्रदय में जो प्रेम है वह एक ही है। प्रेम का स्वरुप बदल जाता है उसके नामकरण के साथ, किन्तु प्रेम वही रहता है। जैसे पानी तो वही है , किन्तु किस पात्र में उसे एकत्र करते वह उसी का आकार ग्रहण कर लेता है। यथा कटोरी में आने पर उसका आकार गिलास में उसके आकार से पृथक होगा लेकिन जल तो वही है , कल-कल, पारदर्शी , निर्मल और शीतल।

विज्ञान की यदि बात करें तो ऊर्जा के संरक्षण के नियम के अनुसार , सृष्टि में ऊर्जा एक ही है , सिर्फ यह अपनी परिस्थिति के अनुसार अपना स्वरुप बदलकर स्थितिज (potential), गतिज (kinetic), ऊष्मा (heat), ध्वनि (sound) आदि स्वरुप को प्राप्त होती है लेकिन इनका ह्रास नहीं होता अपितु यह संरक्षित रहती हैं सृष्टि में अपने किसी न किसी स्वरुप में।

उपरोक्त उदाहरणों का इस्तेमाल किया है प्रेम को समझने में। मेरे विचार से प्रेम सिर्फ एक ही है। जब एक स्त्री अपना प्यार अपनी संतान को देती है तो "वात्सल्य" , जब पिता को देती है तो वही प्रेम पुत्री-प्रेम कहलाता है , फिर वही प्रेम पत्नी-प्रेम, बहन का प्रेम , भाभी का प्रेम , मित्र का प्रेम , देश-प्रेम आदि नामों से अलंकृत हो जाता है। यहाँ प्रेम करने वाली स्त्री अथवा पुरुष तो एक ही है और उसके पास जो प्रेम है वह भी एक ही प्रकार का है किन्तु जिसे दिया गया और जिसने ग्रहण किया उसकी वय और समझ के अनुसार प्रेम उसी साँचे का स्वरुप ले लेता है।

चूँकि मनुष्य के अन्दर एक ह्रदय विद्यमान है और उसमें अनेक भावनाओं का निरंतर संचरण होता रहता है अतः एक दुसरे के प्रति प्रेम का उत्पन्न होना अत्यंत स्वाभाविक है। हाँ , प्रेम का उत्पन्न न होना हमें 'पादप' की श्रेणी में ला देता है। लेकिन आवश्यकता है इस प्रेम को सही साँचे में ढालकर देने की और सही साँचे में ग्रहण करने की। प्रेम के इस लेन-देन में एक-दुसरे की वय और वैवाहिक अवस्था ( marital status) का ध्यान रखना अति आवश्यक है। हमारी छोटी से छोटी भूल भी किसी निर्दोष का सुखी जीवन बर्बाद कर सकती है।

कभी-कभी देने वाला तो निस्वार्थ प्रेम लुटा रहा होता है लेकिन लेने वाला उसे मनमाने साँचे में एकत्र करके उसे "वीभत्स' स्वरुप देकर स्नेह लुटाने वाले को अपमानित करता है। अतः स्नेह देते एवं लेते समय स्वयं को अनुशासित एवं मर्यादित रखना अति-आवश्यक है।

प्रेम का हर स्वरुप ( यथा- वात्सल्य, करुणा, सहानुभूति) स्वीकार्य है लेकिन किसी भी परिस्थिति में पर-स्त्री और पर-पुरुष के लिए ह्रदय में श्रृंगार के भाव नहीं आने देना चाहिए।

प्रेम के स्थायी एवं शाश्वत स्वरुप को समझा एवं निभाया जाए।

Zeal