आजकल समाचारों में पढने कों मिलता है कि अमुक स्त्री ने न्याय ना मिलने पर अदालत में निर्वस्त्र होकर विरोध जताया । कहीं कोई स्त्री ससुराल में प्रताड़ित होती है तो दिल्ली , मुंबई की सड़कों पर निर्वस्त्र दौड़ पड़ती है । कहीं पर समाज के ठेकेदार ( राम सेना के चीफ ) जैसे लोग मॉरल-पुलिसिंग करते हैं तो महिलाओं द्वारा 'pink chaddi campaign' चलाया जाता है । कहीं सूखा पड़ा है तो स्त्रियों के निर्वस्त्र होकर खेतों में हल चलाने से , इंद्र देव प्रसन्न होकर बारिश करायेंगे आदि।
इस तरह से न्याय नहीं मिलता । ना ही कोई क्रांति लायी जा सकती है । ये स्त्री की एक अत्यंत ही लाचार और हताश अवस्था कों इंगित करती है । इस तरह के आचरण से लाभ नहीं होगा अपितु स्त्री की गरिमा कों क्षति पहुंचेगी । इसलिए यदि अपने अधिकारों के लिए लड़ना है , तो अपनी गरिमा और मर्यादा कों कदापि नहीं भूलना है । जिस सभ्यता को पाने में युगों लग गए , उसे त्यागकर आदि-मानवों की तरह आचरण करने से क्या हासिल होगा । यह तो खुद के ऊपर अत्याचार करने जैसा हुआ ।
ऐसे आचरण जिससे, स्त्री और पुरुष सभी असहज हो जाएँ , उसे न्याय पाने का हथियार क्यों बनाना ? न्याय तो मिलेगा नहीं , मानसिक अस्पताल में भर्ती होने का आदेश ज़रूर मिल जाएगा ।
आज भी समाज में स्त्री एवं पुरुष के बीच दोहरा मापदंड है । स्त्री चाहे गरीब हो अथवा अमीर , गावं की हो अथवा शहर की , पढ़ी-लिखी हो अथवा अनपढ़ , सभी कों पुरुष से कमतर समझने की ही मानसिकता है । इसी मानसिकता का परिणाम है - कन्या भ्रूण हत्या , दहेज़ , सती प्रथा आदि ।
ऐसी मानसिकता वाले समाज से कुछ मांगो नहीं , क्यूंकि मांगने वाला सिर्फ 'भिक्षु' होता है । वो कभी भी स्वयं पर गर्व नहीं कर सकता । अपना हक माँगा नहीं जाता । साम , दाम , दंड , भेद से लड़कर हासिल किया जाता है ।
पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से , मुस्कुराओ तो कोई बात बने
सर झुकाने से कुछ नहीं होता , सर उठाओ तो कोई बात बने
अपना हक संगदिल ज़माने से , छीन पाओ तो कोई बात बने ।
आप बताइए कैसे लड़ी जाए ये लड़ाई ?
इस तरह से न्याय नहीं मिलता । ना ही कोई क्रांति लायी जा सकती है । ये स्त्री की एक अत्यंत ही लाचार और हताश अवस्था कों इंगित करती है । इस तरह के आचरण से लाभ नहीं होगा अपितु स्त्री की गरिमा कों क्षति पहुंचेगी । इसलिए यदि अपने अधिकारों के लिए लड़ना है , तो अपनी गरिमा और मर्यादा कों कदापि नहीं भूलना है । जिस सभ्यता को पाने में युगों लग गए , उसे त्यागकर आदि-मानवों की तरह आचरण करने से क्या हासिल होगा । यह तो खुद के ऊपर अत्याचार करने जैसा हुआ ।
ऐसे आचरण जिससे, स्त्री और पुरुष सभी असहज हो जाएँ , उसे न्याय पाने का हथियार क्यों बनाना ? न्याय तो मिलेगा नहीं , मानसिक अस्पताल में भर्ती होने का आदेश ज़रूर मिल जाएगा ।
आज भी समाज में स्त्री एवं पुरुष के बीच दोहरा मापदंड है । स्त्री चाहे गरीब हो अथवा अमीर , गावं की हो अथवा शहर की , पढ़ी-लिखी हो अथवा अनपढ़ , सभी कों पुरुष से कमतर समझने की ही मानसिकता है । इसी मानसिकता का परिणाम है - कन्या भ्रूण हत्या , दहेज़ , सती प्रथा आदि ।
ऐसी मानसिकता वाले समाज से कुछ मांगो नहीं , क्यूंकि मांगने वाला सिर्फ 'भिक्षु' होता है । वो कभी भी स्वयं पर गर्व नहीं कर सकता । अपना हक माँगा नहीं जाता । साम , दाम , दंड , भेद से लड़कर हासिल किया जाता है ।
पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से , मुस्कुराओ तो कोई बात बने
सर झुकाने से कुछ नहीं होता , सर उठाओ तो कोई बात बने
अपना हक संगदिल ज़माने से , छीन पाओ तो कोई बात बने ।
आप बताइए कैसे लड़ी जाए ये लड़ाई ?
- सबसे पहले तो अपने तन पर वस्त्रों की गरिमा कों समझिये । किसी भी हालत में स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने वाले इन वस्त्रों का अपमान मत कीजिये । लाचारी एवं हताशा की अवस्था में भी मर्यादित रहिये । ये वस्त्र इतने गरिमामयी होने चाहियें की देखने वालों की नज़र भी श्रद्धा एवं सम्मान से भर जाए । ( अन्यथा स्त्री कों निर्वस्त्र देखने वाले उन्मादी असंख्य हैं )
- पिंक चड्ढी की जगह , मॉरल पुलिसिंग करने वालों कों ' चप्पलें ' भेजनी चाहियें।
- एकता में बल है , इसलिए किसी भी अभियान कों एकजुट होकर सफल बनाया जा सकता है ।
यदि व्यक्ति सही है तो उसे समर्थन करने वाले भी मिल जायेंगे । इसलिए खुद कों लाचार समझने की ज़रुरत नहीं है । संवेदनशील लोगों से सहयोग की अपेक्षा की जा सकती है । - खुद को इतना मज़बूत बनाइये की अन्याय करने वाला अपने ही बाल नोंच डाले ।
ग्रंथों , पुराणों और उपनिषदों में नारी को 'देवी' कह दिया गया लेकिन विरला ही कोई होगा जो स्त्री को देवी समझता होगा । इसलिए गलती से भी स्वयं को देवी की भूल-भुलैय्या में ना रखिये ।
मनुष्य बने रहकर , निर्भय होकर सबसे पहले खुद में आत्मविश्वास लाइए । जब आप स्वयं का सम्मान करना सीख जायेंगी तो जमाना आपके साथ-साथ चलेगा ।
आभार