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Sunday, February 20, 2011

निर्वस्त्र होने से क्रांति नहीं आती , ना ही न्याय मिलता है .

आजकल समाचारों में पढने कों मिलता है कि अमुक स्त्री ने न्याय ना मिलने पर अदालत में निर्वस्त्र होकर विरोध जतायाकहीं कोई स्त्री ससुराल में प्रताड़ित होती है तो दिल्ली , मुंबई की सड़कों पर निर्वस्त्र दौड़ पड़ती हैकहीं पर समाज के ठेकेदार ( राम सेना के चीफ ) जैसे लोग मॉरल-पुलिसिंग करते हैं तो महिलाओं द्वारा 'pink chaddi campaign' चलाया जाता हैकहीं सूखा पड़ा है तो स्त्रियों के निर्वस्त्र होकर खेतों में हल चलाने से , इंद्र देव प्रसन्न होकर बारिश करायेंगे आदि

इस तरह से न्याय नहीं मिलता ना ही कोई क्रांति लायी जा सकती हैये स्त्री की एक अत्यंत ही लाचार और हताश अवस्था कों इंगित करती हैइस तरह के आचरण से लाभ नहीं होगा अपितु स्त्री की गरिमा कों क्षति पहुंचेगीइसलिए यदि अपने अधिकारों के लिए लड़ना है , तो अपनी गरिमा और मर्यादा कों कदापि नहीं भूलना हैजिस सभ्यता को पाने में युगों लग गए , उसे त्यागकर आदि-मानवों की तरह आचरण करने से क्या हासिल होगायह तो खुद के ऊपर अत्याचार करने जैसा हुआ

ऐसे आचरण जिससे, स्त्री और पुरुष सभी असहज हो जाएँ , उसे न्याय पाने का हथियार क्यों बनाना ? न्याय तो मिलेगा नहीं , मानसिक अस्पताल में भर्ती होने का आदेश ज़रूर मिल जाएगा

आज भी समाज में स्त्री एवं पुरुष के बीच दोहरा मापदंड हैस्त्री चाहे गरीब हो अथवा अमीर , गावं की हो अथवा शहर की , पढ़ी-लिखी हो अथवा अनपढ़ , सभी कों पुरुष से कमतर समझने की ही मानसिकता हैइसी मानसिकता का परिणाम है - कन्या भ्रूण हत्या , दहेज़ , सती प्रथा आदि

ऐसी मानसिकता वाले समाज से कुछ मांगो नहीं , क्यूंकि मांगने वाला सिर्फ 'भिक्षु' होता हैवो कभी भी स्वयं पर गर्व नहीं कर सकताअपना हक माँगा नहीं जातासाम , दाम , दंड , भेद से लड़कर हासिल किया जाता है

पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से , मुस्कुराओ तो कोई बात बने
सर झुकाने से कुछ नहीं होता , सर उठाओ तो कोई बात बने
अपना हक संगदिल ज़माने से , छीन पाओ तो कोई बात बने


आप बताइए कैसे लड़ी जाए ये लड़ाई ?

  • सबसे पहले तो अपने तन पर वस्त्रों की गरिमा कों समझियेकिसी भी हालत में स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने वाले इन वस्त्रों का अपमान मत कीजियेलाचारी एवं हताशा की अवस्था में भी मर्यादित रहियेये वस्त्र इतने गरिमामयी होने चाहियें की देखने वालों की नज़र भी श्रद्धा एवं सम्मान से भर जाए । ( अन्यथा स्त्री कों निर्वस्त्र देखने वाले उन्मादी असंख्य हैं )
  • पिंक चड्ढी की जगह , मॉरल पुलिसिंग करने वालों कों ' चप्पलें ' भेजनी चाहियें
  • एकता में बल है , इसलिए किसी भी अभियान कों एकजुट होकर सफल बनाया जा सकता है
    यदि व्यक्ति सही है तो उसे समर्थन करने वाले भी मिल जायेंगेइसलिए खुद कों लाचार समझने की ज़रुरत नहीं हैसंवेदनशील लोगों से सहयोग की अपेक्षा की जा सकती है
  • खुद को इतना मज़बूत बनाइये की अन्याय करने वाला अपने ही बाल नोंच डाले ।

ग्रंथों , पुराणों और उपनिषदों में नारी को 'देवी' कह दिया गया लेकिन विरला ही कोई होगा जो स्त्री को देवी समझता होगाइसलिए गलती से भी स्वयं को देवी की भूल-भुलैय्या में ना रखिये

मनुष्य बने रहकर , निर्भय होकर सबसे पहले खुद में आत्मविश्वास लाइएजब आप स्वयं का सम्मान करना सीख जायेंगी तो जमाना आपके साथ-साथ चलेगा

आभार

Saturday, December 25, 2010

माई नेम इस मोहन - मोहन की जवानी ...

जब तक पुरुषों पर जवानी ज्यादा छायी रहेगी , महिलाओं की जवानियाँ सड़क पर शर्मसार होती रहेगीबड़े फख्र से ये बतायेंगे की पुरुष कभी बूढ़े नहीं होतेएक्टिवे ही रहते हैंकुछ ज्यादा ही hyperactive हैं

आखिर पुरुष क्यूँ नहीं विरोध करते घृणित , गन्दी , अश्लील मानसिकता का ? समाज में मुन्नी बदनाम और शीला की जवानी जैसे भद्दे गाने चल रहे हैं , किसी को परवाह नहींकोई सरोकार नहींक्या इन्हें इतना भी भय नहीं की इनकी बेटियाँ इसी समाज में बड़ी हो रही हैंअच्छी से अच्छी शिक्षा भी बेकार जायेगी जब तक ये भोंडापन रहेगा समाज मेंपुरुषों को भी विरोध करना चाहिए

भला हो बनारस की जागरूक महिलाओं का , जिन्हें परवाह हैं अपनी संस्कृति कीकहीं तो विद्रोह हुआ इस अश्लील , गाने का कैटरीना और मल्लिका और राखी सावंत में अंतर क्या है ? भारत को पतन की तरफ की तरफ ले जा रही ये महिलाएं भयानक जुर्म कर रही हैंसंस्कृति को नीलाम कर रही हैंइनके खिलाफ भी कानून बनना चाहिए और कार्यवाई होनी चाहिए

ये महिलाएं ही जिम्मेदार है , बढ़ते हुए बलात्कार जैसी घटनाओं की और युवाओं की मानसिकता को विकृत करने कीआखिर वेश्याओं और इन महिलाओं में भला अंतर क्या हैफरहा खान तो हर-एक अभिनेत्री से अश्लील नाच करवाने के बाद ही उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस का खिताब मिलने देगी

सुर्ख़ियों में रहने के लिए इतना नीचे गिरना जरूरी है क्या ?

एक इन्जिनीरिंग कॉलेज में एक लड़के अभिषेक ने दो लड़कियों को blackmail करके उनसे , १७० लड़कियों के MMS बनवाकर विदेशों में बेचकर करोड़ों कमा लिएवाह ! मजे भी लूटे और कमाई इतनी आसानअरे इससे तो अच्छा है , जिसे शौक है वो ब्लू-फिल्में देखे और समाज को साफ़-सुथरा रहने दे

सेंसर बोर्ड सो रहा है अथवा नेत्रहीन है जो आँख के सामने इतना कुछ होते हुए देख रहा है और कोई आपत्ति भी नहींशीला दीक्षित जी को यदि इस गाने पर भी आपत्ति नहीं तो समझ लीजिये की उनकी आत्मा मर चुकी है

अपनी संस्कृति पर क्या कोई लेख लिखे , जब उसे डूबाने वाले कतार बांधे खड़े हैं