जब कोई किसी को अनायास ही गलत समझ लेता है तो वह व्यक्ति अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की चेष्टा करता है। लेकिन मुझे लगता है कि ऐसी अवस्था में स्पष्टीकरण कि आवश्यकता नहीं होती। क्यूंकि जिनका हमपर स्नेह एवं विश्वास होता है वे हमें गलत कभी समझते नहीं। और यदि गलती से गलत समझ भी लेते हैं तो खुद बखुद समय के साथ समझ भी जाते हैं। लेकिन जो मन में द्वेष रखते हैं , कान के कच्चे होते हैं , दूसरी के दिए गए तथ्यों पर जल्दी विश्वास कर लेते हैं और अपनी ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करने से परहेज़ करते हैं , वे ही दूसरों द्वारा प्रस्तुत किये गए तथ्यों पर यकीन करके किसी को अनायास ही गलत समझने कि गलती करते हैं। ऐसे लोगों को स्पष्टीकरण देने का कोई लाभ भी नहीं होता क्यूंकि - " दुश्मनों को स्पष्टीकरण समझ नहीं आता , जबकि अपनों को स्पष्टीकरण देने कि ज़रुरत ही नहीं पड़ती"
"Friends do not need explanation while foes do not understand explanation"
ऐसा करके वे कुछ अच्छे और कुछ सच्चे लोगों को खो देते हैं। इसलिए किसी के बारे में राय बनाने से पहले पूरे सच कि जान लेने कि कोशिश अवश्य करनी चाहिए। वरना "कव्वा कान लेकर भागा" वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।
सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर लेना आपके कान कच्चे होने के परिचायक हैं, जिसके बारे में राय बनायीं है , उसकी कमजोरी के नहीं। इसलिए दूसरों के बारे में गलत राय निर्धारण से पहले अपने व्यक्तित्व को दृढ करने कि ज्यादा आवश्यकता है।
खतावार समझेगी दुनिया तुझे...
अब इतनी जियादा सफाई ना दे..
Zeal
"Friends do not need explanation while foes do not understand explanation"
ऐसा करके वे कुछ अच्छे और कुछ सच्चे लोगों को खो देते हैं। इसलिए किसी के बारे में राय बनाने से पहले पूरे सच कि जान लेने कि कोशिश अवश्य करनी चाहिए। वरना "कव्वा कान लेकर भागा" वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।
सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर लेना आपके कान कच्चे होने के परिचायक हैं, जिसके बारे में राय बनायीं है , उसकी कमजोरी के नहीं। इसलिए दूसरों के बारे में गलत राय निर्धारण से पहले अपने व्यक्तित्व को दृढ करने कि ज्यादा आवश्यकता है।
खतावार समझेगी दुनिया तुझे...
अब इतनी जियादा सफाई ना दे..
Zeal