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Saturday, April 21, 2012

क्या वाकई स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है ?-- Let's think again.

मेरे विचार से तो स्त्री , कभी भी किसी स्त्री की दुश्मन नहीं होती, लेकिन एक स्त्री ब्लॉगर की लगातार नीचता ने मुझे भी सोचने को मजबूर कर दिया ! इन मोहतरमा को मेरी इस पोस्ट पर आपत्ति है! इन्होने एक गहन विषय पर विचार तो रखे नहीं केवल भाषा की दलाल बनकर लेखिका को अपमानित करने के उद्देश्य से " आई ऑब्जेक्ट" का झंडा लेकर खड़ी हो गयीं, मानों दुनिया भर की सारी अकल इन्हें ही नवाजी गयी हो! कभी ये नारी की आर्थिक स्वतंत्रता के विरोध में खड़ी हो जाती हैं तो कभी अपने पुरुष मित्र की तरफदारी करने के लिए महिला ब्लॉगर्स के खिलाफ पोस्ट लगाकर महिलाओं का अपमान करती है ! इनकी इस मानसिक अवस्था के लिए हो सकता है हो सकता है घरेलू हिंसा जिम्मेदार हो , अतः निवेदन है इस महिला के साथ सहानुभूति का रवैय्या रखा जाए !

अब आते है उस पोस्ट पर जिस पर मोहतरमा को आपत्ति है ! बेचारी का संशय भी तो दूर करना है, क्योंकी इनकी पोस्ट पर आये इनके चाटुकार मित्रों ने न ही तर्क रखे , न ही भ्रम दूर किये ! केवल जी हुजूरी करके चले गए ! ( क्या करें बेचारे , टिपण्णी पाने के लिए ये सब तो करना ही पड़ता है ) ! एक दुसरे की पीठ खुजाना ( ब्लॉगिंग की अनैतिक नीति)

भारत विभाजन के समय , नेहरू ने देश के साथ बहुत अन्याय किया ! जबरदस्ती प्रधानमंत्री बनकर बहुत से क्षेत्रों में मनमानी की , जिसकी सज़ा आज भी भुगत रही है भारत की मासूम जनता ! उन्ही नेहरू ने और गांधी ने मिलकर मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अखंड भारत को खंडित करके हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में विभक्त कर दिया! और भारतवासियों को सौगात में मिला कभी न थमने वाला आतंकवाद का सिलसिला ! इस आतंकवाद ने लाखों की संख्या में काश्मीरी ब्राम्हणों को विस्थापित किया उनका क़त्ल किया और उनकी बहन बेटियों के साथ बलात्कार किया !

नेहरू की मनमानी ने ही "अंबेडकर' के कंधे पर रखकर बन्दूक चलाई ! मात्र १५ दिन के अन्दर कॉपी-पेस्ट वाला मनमाना संविधान बनवाया ! अंबेडकर ने स्वयं उस संविधान में समय-समय पर बदलाव किये जाने के लिए लिखा है, जो की कभी नहीं किया गया ! उस समय जिस आरक्षण की बात कही गयी वह मात्र दस वर्षों के लिए थी, लेकिन उसे आज तक दुबारा कभी संशोधित नहीं किया गया और आरक्षण का कोढ़ हमारे देश को अभी भी लगा हुया है , जो भारत वर्ष को दशकों पीछे ले जा रहा है !

दलित भी हिन्दू है , और हम सभी एक हैं , लेकिन कहीं न कहीं इस संविधान में निहित कमियों के चलते दलित हमसे अलग हो गया है! उसके मन में कभी ना समाप्त होने वाली कुंठा और आक्रोश है! हिन्दू समाज को बाँट दिया गया ! जो मुखिया होता है , दोषी भी उसी को ठहराया जाता है ! जिसने संविधान बनाया उसके इरादे पाक साफ़ होते हुए भी , उसने नेहरू की दादागीरी से डरकर वही किया जो वे करवाना चाहते थे !

अंबेडकर को इस जबरदस्ती पर सख्त आपत्ति थी और उन्होंने ने स्वयं कहा था -- " मुझे दो संविधान। मैं बीच सड़क पर इसे जला दूंगा। ऐसा करने में मेरा राष्ट्रधर्म मुझे नहीं रोकेगा।"

काश यही राष्ट्र धर्म उन्हें संविधान बनाते समय समझ आ गया होता ! काश उन्होंने थोड़ी सी हिम्मत जुटा ली होती तब ! लेकिन नहीं , हम सबको बहुत कुछ भुगतना था , शायद इसीलिए ऐसा हुआ !
आने वाली कई शताब्दियों तक इन्हें इनकी अच्छाईयों के लिए जाना जाएगा तो इनकी भूलों को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जाएगा, ताकि भविष्य में ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति ना हो !

उम्मीद है इन मोहतरमा को उत्तर मिल गया होगा और इनकी आत्मा को शांति मिली होगी! यदि न मिली हो तो इन्हें चाहिए कि अपने ब्लौग पर विष वमन करने के बजाये रामायण का पाठ जारी रखें !

इन मोहतरमा को भी विरोध में आई टिपण्णी मोडरेट करने की आदत है ! जो टिपण्णी इन्होने प्रकाशित नहीं की वह नीचे संलग्न है !



Diwas Gaur---ये तो कोई बात नहीं है। जो प्राणघातक है, उसका कैसा सम्मान? संविधान भारत नहीं और भारत कोई संविधान नहीं। हम भारत का सम्मान करते हैं, प्यार करते हैं, पूजा करते हैं, उस पर मर मिट सकते हैं किन्तु संविधान? वह क्या है? केवल एक तरीका कि भारत कैसे चलाया जाए। यदि तरीका ही गलत हो तो फिर कैसा सम्मान?


मुझे दो संविधान। मैं बीच सड़क पर इसे जला दूंगा। ऐसा करने में मेरा राष्ट्रधर्म मुझे नहीं रोकेगा"--स्वयं डॉ. अम्बेडकर ने भी संविधान के सम्बन्ध में यही कहा था। जिसे संविधान का निर्माता कहा जाता है उसे ही संविधान से प्यार नहीं।


और इस समूचे ब्लॉग जगत में टारगेट करने के लिए सबको दिव्या दीदी ही क्यों मिलती हैं? ब्लॉग जगत में फैली अनियमितताओं, मठाधीशों, इस्लामी टट्टुओं, जमाल जैसे कुत्तों पर आँखें क्यों मूँद ली जाती हैं?देखिये जमाल ने क्या किया? http://www.diwasgaur.com/2012/04/blog-post.html


  • नोट- मजे कि बात यह है कि मेरे पोस्ट लिखने के तुरंत बाद ही, आधे घंटे के अन्दर इन मोहतरमा ने घबराकर दिवस जी कि टिपण्णी प्रकाशित कर दी , जो पिछले २४ घंटों से इनके मॉडरेशन में दम तोड़ रही थी !  ( वैसे बहाने तो ऐसे लोगों के पास अनेक होते हैं अपनी इस अशिष्टता को छुपाने के)

यदि इस महिला के पास ज़रा भी बुद्धि है, तो इनसे निवेदन है  , मुझसे ईर्ष्या और द्वेष ना पालें ! अपनी ऊर्जा यदि सच्चे अर्थों में कहीं लगानी है , तो समाज के हित में लगायें और सत्ता में बैठे देश के गद्दारों के खिलाफ लिखें ! मेरे विरोध में लिखकर ये सिर्फ अपनी तुच्छ और बीमार मानसिकता का ही परिचय देती हैं !

जय हिंद !
वन्दे मातरम् !

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Sunday, April 10, 2011

ईष्या, द्वेष , पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत आक्षेप से भरे वक्तव्य व्यक्ति के संस्कारों को उजागर कर देते हैं.

जब इंसान स्वयं को किसी से कमतर पाता है तो उसके अन्दर अनायास ईर्ष्या , द्वेष जन्म लेने लगता है । वो अपने स्तर से गिर जाता है , दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में स्वयं को और भी नीचे गिरा लेता है। ईर्ष्या से कांपते हुए अपनी कमतरी छुपाने के लिए व्यक्तिगत हो जाता है और दूसरों पर निरर्थक आक्षेप लगाने लगता है।

जो लोग दूसरों की प्रतिभा की सराहना करना जानते हैं वो लोग इस भयानक मानसिक दोष से मुक्त रहते हैं। अन्यथा व्यक्तिगत आक्षेप करके अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं । और अपने संस्कारों को भी परिलक्षित करते हैं।

ऐसा ही कुछ किया पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाडी 'शाहिद अफरीदी' ने । अपनी हार बर्दाश्त न कर पाने के कारण पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर खेल के बारे में न बोलकर , भारत के लोगों के खिलाफ बयान दे दिया। शायद निंदा करके वो अपने मनोबल को बनाए रखना चाहता था। शायद अपने देशवासियों को मुंह दिखाने के लिए पर-निंदा द्वारा ही शेर बनना चाहता होगा। क्या भारत के खिलाफ बयानबाजी ही पाकिस्तानियों की मर्दानगी है ? इनके साथ कितना भी दोस्ताना सलूक क्यूँ न किया जाए , ये नहीं सुधरेंगे।

वहां के सैन्य बल और राजनीतज्ञों का वैमनस्य और द्वेष तो क्षम्य है , लेकिन खिलाड़ियों के मुंह से ऐसे वक्तव्य अत्यंत अशोभनीय हैं और खेल की भावना को दूषित करते हैं।

आभार।

Thursday, October 21, 2010

इन्द्रिय निग्रहण --- ईर्ष्‍या एक घातक मानसिक विकार --- Jealousy-A malignant cancer !

वेदों , उपनिषदों , संहिताओं और ग्रंथों में भी यह कहा गया है कि - काम , क्रोध, लोभ , मोह, मद और मत्सर से बचिए। हमें अपने मन में आये इन वेगों को धारण करना चाहिए अर्थात इन पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। जब तक हमारी इन्द्रियों पर हमारा नियंत्रण नहीं होगा , तब तक हम अनेकानेक मानसिक विकारों से ग्रस्त होते रहेंगे।

ईर्ष्‍या एक ऐसा ही घातक मानसिक विकार है , जिसकी परिणति अक्सर भयानक होती है। लोगों को पता भी नहीं चलता कि कब वो ईर्ष्‍या से ग्रस्त हो गए हैं। यह एक ऐसा मानसिक विकार है जो व्यक्ति को अति-दयनीय स्थिति में पहुंचा देता है ईर्ष्‍या का मन में प्रादुर्भाव अक्सर कुछ खो देने अथवा दूर हो जाने के एहसास के कारण होता है।

ईर्ष्‍या में अक्सर एक त्रिकोण होता हैं । त्रिकोण के दो सिरों पर खतरा मंडराता रहता है। और ईर्ष्यालु व्यक्ति खुद को तो नष्ट कर ही रहा होता है। अर्थात तीनों कि ही हानि होती है।

प्यार जब अप्राप्य हो जाता है तो भी व्यक्ति ईर्ष्‍या से ग्रस्त हो जाता है , तीसरे व्यक्ति से द्वेष रखने लगता है कि इसने मेरा प्यार छीन लिया। वह उस तीसरे व्यक्ति को अपना प्रतिद्वंदी समझने कगता है। ऐसी स्थिति में अक्सर स्त्री का जीवन खतरे में होता है। ईर्ष्‍या बढ़ने के साथ साथ वह व्यक्ति उन दोनों कि मृत्यु का कारण भी बन सकता है।

आफिस में एक कर्मचारी को दुसरे से इर्ष्या हो सकती है, कि यह बौस का ज्यादा प्रिय है। प्रायः सास को बहू से ईर्ष्‍या होती है कि यह मेरे पुत्र को मुझसे छीन रही है। जबकि वास्तविकता यह नहीं होती। विवाह के बाद पुरुष का प्यार तो बंटना ही है। समझदार माएं कभी बहू से ईर्ष्‍या नहीं रखती और उनके घर में बहू , एक बेटी कि तरह शान से रहती है।

अक्सर ये ईर्ष्‍या बच्चों और उन टीनेजर्स में भी देखने को मिलती है , जिनमें आत्मविश्वास तथा आत्म सम्मान [ self esteem ] कम होता है। तथा उनमें ये ईर्ष्‍या ऐग्रेसिव [ आक्रामक ] रूप धारण कर लेती है । यही कारण है आज बच्चों में बढ़ते क्राइम का। बच्चों में अक्सर गहरी दोस्ती , उनके अन्दर भावनात्मक असुरक्षा तथा एकाकीपन पैदा करती है । वो यह नहीं बर्दाश्त कर पाते कि उनका दोस्त किसी दुसरे से बात करे।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि , छेह महीने वाले नवजात शिशु भी ईर्ष्‍या से ग्रस्त हो सकते हैं। यदि माँ किसी दूसरे बच्चे पर ज्यादा ध्यान दे रही है, तो शिशु डिस्ट्रेस के लक्षण व्यक्त करता है। इसी कारण से सिबलिंग- राइवेलरी भी होती है।

ईर्ष्‍या एक ऐसी प्रतिक्रिया है , जिसमें ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य , किसी के बारे में मनमाना रिश्ता बनाकर सोचने लगता है , जो कभी सच , कभी आभासी तो कभी पूर्णतया काल्पनिक होता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति सदैव अपने को एक अनजाने खतरे से घिरा हुआ पाता है । उसका आत्मविश्वास कम होने लगता है और वो भावनात्मक रूप से टूटने लगता है । भय और शंका से ग्रस्त होकर वो अक्सर अजीबोगरीब हरकतें करता है और खुद को बहुत ही दयनीय स्थिति में पहुंचा देता है।

वह जहाँ भी जाता है , उस व्यक्ति कि निंदा अपने साथियों के साथ करता है। उसके इस कृत्य में उसके ' लो सेल्फ-इस्टीम ' वाले साथी , उसका साथ देते हैं , और उसको बर्बादी कि ओर अग्रसर करते हैं । इन मौका परस्त दोस्तों के साथ जब वह निदा करके अपनी भड़ास निकाल लेता है तो थोडा सा संयत महसूस करता है और तब ही भोजन ग्रहण करने कि अवस्था में आ पाता है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वह व्यक्ति अपनी निजी गांठें खोल चुका होता है तथा समाज के सामने नंगा हो चुका होता है।

एक ईर्ष्यालु व्यक्ति , अपनी ईर्ष्‍या कि बढती हुई भावना के चलते , लगातार अपने आस पास वालों से ये आश्वासन मांगता रहता है कि वह बेहतर है , और धीरे-धीरे वह इसी भ्रम में अपनी जिंदगी गुजारने लगता है।

एक
ईर्ष्‍या से ग्रस्त व्यक्ति में निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं--

  • कुछ खो देने का भय
  • किसी के धोखा देने का संशय अथवा गुस्सा
  • अनिश्चितता तथा जिंदगी में खालीपन
  • अपने किसी ख़ास व्यक्ति या मित्र को किसी दुसरे प्रभावी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के हाथों खो देने का भय
  • खुद पर अविश्वास
  • हीन भावना से ग्रस्त होना।
  • खोई हुई वास्तु या मित्र को पाने के लिए छटपटाना
  • परिस्थियों से द्वेष रखना [ रिसेंटमेंट ]
  • जिससे इर्ष्या करता है उसका निरंतर बुरा सोचना तथा उसको नुक्सान पहुंचाने कि योजना में लिप्त
  • अक्सर अपने निंदनीय कार्यों के कारण , आत्मग्लानि के बोझ तले दबा रहता है
  • अपने प्रतिद्वंदी कि खूबियों को पा जाने कि लालसा रखना
  • अपनी भावनाओं [ इर्ष्या ] को स्वीकार करने से इनकार करना
  • ऐसे लोग बहुत ही पजेसिव प्रवित्ति के होते हैं.
ईर्ष्यालु व्यक्ति कि सोच पर पर्दा पड़ जाता है। उसकी सही दिशा में तार्किक शक्ति का लोप हो जाता है तथा लोजिकल और रैशनल बुद्धि उससे विदा ले लेती है। उसकी शिक्षा भी ईर्ष्‍या कि अग्नि में भस्म हो जाती है। उसके चाटुकार मित्र उसको उकसाते रहते हैं और एक दिन उसका सब कुछ समाप्त हो जाता है। किसी ने सच ही कहा है--"ईर्ष्‍या तू न गयी मेरे मन से " ।

ईर्ष्‍या में व्यक्ति , दुसरे से ज्यादा खुद को ही नुकसान पहुंचाता है । यह एक घातक मानसिक विकार है। इसपर नियंत्रण रखिये।

ईर्ष्‍या से बचने का उपाय -

ईर्ष्‍या से बचने के लिए , उसकी प्रशंसा कीजिये जिससे आप ईर्ष्‍या रखते हैं और अपने मन को निर्मल रखिये।

एक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा मुझे ,
जब खुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा ....

आभार।