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Wednesday, October 10, 2012

इस देश में शिक्षा की भी क़द्र होती तो...

पढ़े-लिखे हों अथवा गंवार, बस मंत्री बन गए तो खुद को खुदा समझने लगते हैं।  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (भूरिया) ने रतलाम के कलेक्टर को बिना वजह फटकार लगा दी।  अब झेलो सांसदों , अफसरों का गुस्सा! इस देश में शिक्षा की भी क़द्र होती तो नेताओं का इतना नैतिक पतन नहीं होता। भूरिया हटाओ, देश बचाओ !


Sunday, September 18, 2011

अपोस्ट से कुपोस्टों का सफ़र......

दुःख के साथ कहना पड़ रहा है की कुछ ब्लॉगर्स के पास लिखने को जब कुछ नहीं रह जाता तो वे ब्लॉग पर हो रहे विवादों से मसाला ढूंढकर एक आलेख लिखते हैं और टिप्पणी बटोरते हैं। हिंदी ब्लॉगिंग की गिरते स्तर को परिलक्षित करती है ऐसी मानसिकता। और यही हमारे समारे समाज का गिरता चरित्र भी परिलक्षित करता है।

दूसरों के घर में आग लगी देखकर तमाशा देखने वालों की भीड़ हमेशा ज्यादा होती है। कुछ लोग दूसरों को अपमानित देखकर एक sadistic pleasure पाते हैं। और उसके तहत अपने-अपने ब्लॉग पर और भी ज्यादा अपमानित करने के लिए व्यंगात्मक आलेख लिखकर अपनी भड़ास निकालते हैं। ऐसे आलेखों पर जो लोग शिरकत करते हैं उनकी बुद्धि पर भी खेद उत्पन्न होता है । लेकिन खेमेबाजी का इलाज नहीं है। चली रहेगी ये खेमेबाजी अनंत काल तक ।

किहीं पर विवाद का धुआं उठता देखा नहीं कि, ब्लॉग जगत में अनेकों पोस्टों की भरमार हो जायेगी।

कुछ लोग तटस्थ रहकर प्रवचनकारी आलेख लिखेंगे कि वाद-विवाद नहीं होने चाहिए । और प्रवचन के दरबार में तो दस्तक अक्सर ही ज्यादा होती है। ऐसे लोग किसी के मन कि व्यथा समझना ही नहीं चाहते ,बस मसाला देखा और पोस्ट लिख दी।

दुसरे प्रकार के लोग अपनी TRP बढाने के लिए किसी कि छवि धूमिल करने से गुरेज़ नहीं करते। व्यंगात्मक आलेख लिखकर खेमेबाजों कि टिप्पणियां हासिल करते हैं। ऐसे लोगों में नैतिक मूल्यों कि कमी होती है।

तीसरे प्रकार के लोग किसी के व्यथित होकर लेखन छोड़ने के निर्णय को "टंकी-आरोहण" कहकर नौटंकी बताते हैं और अपमानित करने के लिए आलेख लिखते हैं। वहां भी भड़ासियों की जमघट काफी होती है।

चौथे प्रकार में लोग आते हैं जो भडासी आलेख नहीं लिखते हैं , बल्कि ऐसे आलेखों को ढूंढकर , टिप्पणी के माध्यम से अपने मन की भड़ास निकालते हैं।

किसी की व्यथा और अपमान पर "व्यंगात्मक" आलेख लिखकर टिप्पणी कमाना और सस्ती लोकप्रियता हासिल करना अत्यंत घृणित मानसिकता की दोत्तक है। ऐसे कृत्यों का बहिष्कार किया जाना चाहिए, यदि हिंदी ब्लॉगिंग का स्तर ऊंचा रखना है तो।

Zeal

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पोस्ट पर कमेन्ट आप्शन बंद है। आपने हमें पढ़ा , इसके लिए आपका आभार।

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Sunday, April 10, 2011

ईष्या, द्वेष , पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत आक्षेप से भरे वक्तव्य व्यक्ति के संस्कारों को उजागर कर देते हैं.

जब इंसान स्वयं को किसी से कमतर पाता है तो उसके अन्दर अनायास ईर्ष्या , द्वेष जन्म लेने लगता है । वो अपने स्तर से गिर जाता है , दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में स्वयं को और भी नीचे गिरा लेता है। ईर्ष्या से कांपते हुए अपनी कमतरी छुपाने के लिए व्यक्तिगत हो जाता है और दूसरों पर निरर्थक आक्षेप लगाने लगता है।

जो लोग दूसरों की प्रतिभा की सराहना करना जानते हैं वो लोग इस भयानक मानसिक दोष से मुक्त रहते हैं। अन्यथा व्यक्तिगत आक्षेप करके अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं । और अपने संस्कारों को भी परिलक्षित करते हैं।

ऐसा ही कुछ किया पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाडी 'शाहिद अफरीदी' ने । अपनी हार बर्दाश्त न कर पाने के कारण पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर खेल के बारे में न बोलकर , भारत के लोगों के खिलाफ बयान दे दिया। शायद निंदा करके वो अपने मनोबल को बनाए रखना चाहता था। शायद अपने देशवासियों को मुंह दिखाने के लिए पर-निंदा द्वारा ही शेर बनना चाहता होगा। क्या भारत के खिलाफ बयानबाजी ही पाकिस्तानियों की मर्दानगी है ? इनके साथ कितना भी दोस्ताना सलूक क्यूँ न किया जाए , ये नहीं सुधरेंगे।

वहां के सैन्य बल और राजनीतज्ञों का वैमनस्य और द्वेष तो क्षम्य है , लेकिन खिलाड़ियों के मुंह से ऐसे वक्तव्य अत्यंत अशोभनीय हैं और खेल की भावना को दूषित करते हैं।

आभार।

Monday, January 10, 2011

पिता के संस्कारों ने उजाड़ा अपने ही बेटे का जीवन -- Culture, Ethics, Values

वर्ष २०१० में एक ब्लोगर युवक मोहन [परिवर्तित नाम ] से परिचय हुआ। उसने अपनी उम्र २८ बतायी थी। इतनी कम उम्र में उसने घर में बहुत कलह-क्लेश देखे , जिसने उसके व्यक्तित्व को बहुत कमज़ोर बना दिया। उसके अन्दर एक आत्महीनता आ गयी तथा वो थोड़े से सौभाग्य [सहानुभूति , प्यार] के लिए दर-दर भटकने लगा । इस भटकन ने उसे हमेशा गलत लोगों की संगत में रखा। जो सही लोग मिले , वो उससे दूर होते चले गए और गलत लोगों का उस पर प्रभुत्व बढ़ने लगा । उसका अपना अस्तिव कहीं खो गया ।

मोहन की माँ , जिसने अनगिनत असहनीय प्रताड्नायें झेलीं अपने पति द्वारा , उनके लिए कुछ करना चाहता था मोहन। अपनी बहन के दुखों को दूर करना चाहता था। लेकिन मोहन की गलत संगति ने और पिता के गलत संस्कारों ने उसे माँ, बहन के दुखों से दूर कर दिया। वो संवेदनाहीन हो गया। मोहन अब खुद भी अपने पिता जैसा क्रूर और स्त्रियों का अपमान करने वाला बन गया है। उसके कृत्यों से उसकी निर्दोष माँ और बहन अब और भी दुःख झेल रही हैं। उनकी एक आस अपने इस घर के चिराग से थी , जो अब पूर्णतया बुझ चुकी है। उनके घर में पहले एक पुरुष था जो स्त्रियों पर अत्याचार करता था , लेकिन अब दो पुरुष हैं , जो मिलकर कहर बरपा रहे हैं।

आज जरूरत है कि माता पिता अपने बच्चों को सही शिक्षा एवं संस्कार दे। भरपूर प्यार दे , नहीं तो देश की भावी पीढ़ी इसी तरह स्त्रियों पर अत्याचार करती रहेगी और समाज में हिंसा बढती रहेगी। राजेश गुलाटी जैसे लोग जो अपनी पत्नी को मारकर ७२ टुकड़े करते हैं वो ऐसी ही मानसिकता वाले होते हैं. जब माँ , बहनें , पत्नियां ही सुरक्षित नहीं रहेंगी तो कौन देगा संस्कार।

समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाइए । आस-पास परिवेश में ऐसे लोगों और कृत्यों को देखिये तो तटस्थ मत रहिये , ऐसे युवकों को समझाइए और उन्हें सही मार्ग पर लाइए। नहीं तो हिंसक मानसिकता वालों की संख्या बढती जायेगी।

हर व्यक्ति के अन्दर इंसानियत और एक जानवर होता है । इससे पहले की जानवर बलवान हो जाए , घोंट दीजिये घृणा और बदले की भावना का। इंसानियत का परचम लहराने दीजिये।

आभार।