मैकाले की शिक्षा पद्धति ने ब्रेन-वाश कर दिया है हमारे भारतीय समाज का। divide and rule policy चलाकर उन्होंने हमें टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट दिया। आज इसी विभाजन की "मंथरा-नीति" से कांग्रेस हमें नोच-नोच कर खा रही है । देश का विकास बाधित है । धन और सत्ता को हड़पने का लालच चरम पर है। फिर भी विकल्प है हमारे पास। इस भ्रष्ट मैकाले -तंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए इन्ही के हथियार से इन्हें मारना होगा। मैकाले-सरकार (कांग्रेस) को अपनी "भारतीय संस्कृति " की ताकत से मारना होगा। परंपरागत तरीके , आस्था और विश्वास , रीति-रिवाज , पर्व और त्योहारों की महत्ता को समझकर, अपने बच्चों को समझाना होगा । हम जैसा भारत चाहते हैं वैसा भारत पहले अपने घरों में बनाना होगा। ध्यान रहे कहीं "चिराग तले अँधेरा न रह जाए" ।
अपने बच्चों के साथ देश की चर्चा अवश्य कीजिये। वे क्या बदलाव चाहते हैं , उन्हें सुनिए। समाज में क्या घट रहा है , उन कडवी सच्चाईयों से उन्हें अवगत कराईये। उनके साथ भिन्न भिन्न विषयों पर डिबेट करिए। उनका दिमागी विकास भी होगा और समाधान भी आएगा। उनके मन में उठ रहे अनेक संशयों का अंत भी होगा।
कभी अपने बच्चों से बात करके देखिये, आप उन्हें कनफ्यूज़न का डिब्बा ही पायेंगे। क्योंकि बढ़ते बच्चों के पास पल प्रतिपल असंख्य प्रश्न जन्म ले रहे होते हैं , लेकिन उनका समाधान करने वाला कोई नहीं होता। माता पिता या तो असमथ होते हैं उनके उत्तर देने में , या फिर उनके पास समय नहीं होता है अपने बच्चों के लिए। वे समझते हैं अच्छे स्कूलों में डालकर इतिश्री हो गयी उनके दायित्वों की। आँख-नाक -कान खुले रखने से तो जैसे परहेज़ है इन पढ़े-लिखे लोगों को। न खुद अपडेटेड रहते हैं मुद्दों पर , न ही अपने बच्चों को रखते हैं।
बच्चे रट-रट कर तो आगे बढ़ जाते हैं , लेकिन उनके पास विषय पर पकड़ गहरी नहीं होती । कंसेप्ट नहीं होता। दुनिया में इतना ज्ञान बिखरा पड़ा है और घटनाएं हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए लेकिन सब कुछ एक साथ तो घोंटकर नहीं पिलाया जा सकता है। पुरुष अपनी अपनी नौकरियों में व्यस्त और त्रस्त हैं और उनकी पत्नियाँ शाम ढले गॉसिप करती मिल जायेंगी। मटर-गोभी , हेयर-स्टाइल और पडोसी निंदा से ज्यादा बतियाने की ज़रुरत ही नहीं समझती। बच्चों को क्या संस्कार देंगीं ।
कभी अपने बच्चों के साथ भी पर्वों पर चिंतन और राष्ट्र-हित की चर्चा किया कीजिये। वरना चिराग तले अँधेरा ही रह जाएगा।
जिस कवी की कल्पना में, ज़िन्दगी हो प्रेमगीत
उस कवी को आज तुम नकार दो...
भीगती नसों में आज, फूलती रगों में आज
आग की लपट का तुम बघार दो ....
भारत माता की जय ,
वन्दे मातरम् !
अपने बच्चों के साथ देश की चर्चा अवश्य कीजिये। वे क्या बदलाव चाहते हैं , उन्हें सुनिए। समाज में क्या घट रहा है , उन कडवी सच्चाईयों से उन्हें अवगत कराईये। उनके साथ भिन्न भिन्न विषयों पर डिबेट करिए। उनका दिमागी विकास भी होगा और समाधान भी आएगा। उनके मन में उठ रहे अनेक संशयों का अंत भी होगा।
कभी अपने बच्चों से बात करके देखिये, आप उन्हें कनफ्यूज़न का डिब्बा ही पायेंगे। क्योंकि बढ़ते बच्चों के पास पल प्रतिपल असंख्य प्रश्न जन्म ले रहे होते हैं , लेकिन उनका समाधान करने वाला कोई नहीं होता। माता पिता या तो असमथ होते हैं उनके उत्तर देने में , या फिर उनके पास समय नहीं होता है अपने बच्चों के लिए। वे समझते हैं अच्छे स्कूलों में डालकर इतिश्री हो गयी उनके दायित्वों की। आँख-नाक -कान खुले रखने से तो जैसे परहेज़ है इन पढ़े-लिखे लोगों को। न खुद अपडेटेड रहते हैं मुद्दों पर , न ही अपने बच्चों को रखते हैं।
बच्चे रट-रट कर तो आगे बढ़ जाते हैं , लेकिन उनके पास विषय पर पकड़ गहरी नहीं होती । कंसेप्ट नहीं होता। दुनिया में इतना ज्ञान बिखरा पड़ा है और घटनाएं हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए लेकिन सब कुछ एक साथ तो घोंटकर नहीं पिलाया जा सकता है। पुरुष अपनी अपनी नौकरियों में व्यस्त और त्रस्त हैं और उनकी पत्नियाँ शाम ढले गॉसिप करती मिल जायेंगी। मटर-गोभी , हेयर-स्टाइल और पडोसी निंदा से ज्यादा बतियाने की ज़रुरत ही नहीं समझती। बच्चों को क्या संस्कार देंगीं ।
कभी अपने बच्चों के साथ भी पर्वों पर चिंतन और राष्ट्र-हित की चर्चा किया कीजिये। वरना चिराग तले अँधेरा ही रह जाएगा।
जिस कवी की कल्पना में, ज़िन्दगी हो प्रेमगीत
उस कवी को आज तुम नकार दो...
भीगती नसों में आज, फूलती रगों में आज
आग की लपट का तुम बघार दो ....
भारत माता की जय ,
वन्दे मातरम् !
