प्रशंसा एक ऐसा भाव है , जो प्रशंसा मिलने वाले का उत्साह वर्धन करता है , और दिशा-निर्देश करता है। प्रशंसा एक सकारात्मक ऊर्जा है जो सृजनकर्ता , विद्यार्थी , कर्मचारी तथा प्रत्येक क्षेत्र में , व्यक्ति के मनोबल को बढाती है और उसे अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाने का बल और दिशा मिलती है। इसी उद्देश्य से , सर्टिफिकेट्स , मेडल्स , प्रशस्ति-पत्र , इंसेंटिव , उपहार आदि का चलन है ।
प्रशंसा , किसी भी व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाती है। उसके व्यक्तित्व को निखारने में मददगार साबित होती है।लैंगिक भेदभाव से परे , प्रशंसा सभी को अच्छी लगती है। चाहे स्त्री हो , पुरुष हो , बालक हो , युवा हो अथवा बुज़ुर्ग।
प्रशंसा करना भी एक कला है। कुछ लोग सकुचाते हैं , लज्जा वश प्रशंसा नहीं कर पाते । कुछ लोग अंतर्मुखी व्यक्तित्व के होने के कारण अपने मन की बात नहीं कह पाते । कुछ लोग पूर्वाग्रह और द्वेष के चलते प्रशंसा नहीं कर पाते । कुछ लोगों के ह्रदय में प्रशंसा के भाव ही कभी नहीं आते , वो दूसरों को कमतर ही समझते हैं सदा। कुछ लोग अपने प्रतिद्वंदी की प्रशंसा से कतराते हैं ।
प्रशंसा अक्सर झूठी भी होती है , जिसे चाटुकारिता की श्रेणी में रखते हैं। वो अपना काम निकलवाने की दृष्टि से अथवा रिश्तों को जबरन बनाए रखने के उद्देश्य से की जाती है । इसे स्वार्थ की श्रेणी में रखते हैं।
प्रशंसा करना भी सबके बस की बात नहीं। केवल निर्भीक तथा पूवाग्रहों से रहित , एक पवित्र ह्रदय में ही प्रशंसा के भाव आते हैं , और जिह्वा पर सरस्वती की अनुकम्पा से काव्य बन , सुनने वाले के कानों में मिश्री घोलते हैं ।
आभार ।
प्रशंसा , किसी भी व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाती है। उसके व्यक्तित्व को निखारने में मददगार साबित होती है।लैंगिक भेदभाव से परे , प्रशंसा सभी को अच्छी लगती है। चाहे स्त्री हो , पुरुष हो , बालक हो , युवा हो अथवा बुज़ुर्ग।
प्रशंसा करना भी एक कला है। कुछ लोग सकुचाते हैं , लज्जा वश प्रशंसा नहीं कर पाते । कुछ लोग अंतर्मुखी व्यक्तित्व के होने के कारण अपने मन की बात नहीं कह पाते । कुछ लोग पूर्वाग्रह और द्वेष के चलते प्रशंसा नहीं कर पाते । कुछ लोगों के ह्रदय में प्रशंसा के भाव ही कभी नहीं आते , वो दूसरों को कमतर ही समझते हैं सदा। कुछ लोग अपने प्रतिद्वंदी की प्रशंसा से कतराते हैं ।
प्रशंसा अक्सर झूठी भी होती है , जिसे चाटुकारिता की श्रेणी में रखते हैं। वो अपना काम निकलवाने की दृष्टि से अथवा रिश्तों को जबरन बनाए रखने के उद्देश्य से की जाती है । इसे स्वार्थ की श्रेणी में रखते हैं।
प्रशंसा करना भी सबके बस की बात नहीं। केवल निर्भीक तथा पूवाग्रहों से रहित , एक पवित्र ह्रदय में ही प्रशंसा के भाव आते हैं , और जिह्वा पर सरस्वती की अनुकम्पा से काव्य बन , सुनने वाले के कानों में मिश्री घोलते हैं ।
आभार ।