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Tuesday, March 29, 2011

प्रशंसा (प्रोत्साहन) की महिमा

प्रशंसा एक ऐसा भाव है , जो प्रशंसा मिलने वाले का उत्साह वर्धन करता है , और दिशा-निर्देश करता है। प्रशंसा एक सकारात्मक ऊर्जा है जो सृजनकर्ता , विद्यार्थी , कर्मचारी तथा प्रत्येक क्षेत्र में , व्यक्ति के मनोबल को बढाती है और उसे अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाने का बल और दिशा मिलती है। इसी उद्देश्य से , सर्टिफिकेट्स , मेडल्स , प्रशस्ति-पत्र , इंसेंटिव , उपहार आदि का चलन है

प्रशंसा , किसी भी व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाती है। उसके व्यक्तित्व को निखारने में मददगार साबित होती है।लैंगिक भेदभाव से परे , प्रशंसा सभी को अच्छी लगती है। चाहे स्त्री हो , पुरुष हो , बालक हो , युवा हो अथवा बुज़ुर्ग।

प्रशंसा करना भी एक कला है। कुछ लोग सकुचाते हैं , लज्जा वश प्रशंसा नहीं कर पाते कुछ लोग अंतर्मुखी व्यक्तित्व के होने के कारण अपने मन की बात नहीं कह पाते कुछ लोग पूर्वाग्रह और द्वेष के चलते प्रशंसा नहीं कर पाते कुछ लोगों के ह्रदय में प्रशंसा के भाव ही कभी नहीं आते , वो दूसरों को कमतर ही समझते हैं सदा। कुछ लोग अपने प्रतिद्वंदी की प्रशंसा से कतराते हैं

प्रशंसा अक्सर झूठी भी होती है , जिसे चाटुकारिता की श्रेणी में रखते हैं। वो अपना काम निकलवाने की दृष्टि से अथवा रिश्तों को जबरन बनाए रखने के उद्देश्य से की जाती है इसे स्वार्थ की श्रेणी में रखते हैं।

प्रशंसा करना भी सबके बस की बात नहीं। केवल निर्भीक तथा पूवाग्रहों से रहित , एक पवित्र ह्रदय में ही प्रशंसा के भाव आते हैं , और जिह्वा पर सरस्वती की अनुकम्पा से काव्य बन , सुनने वाले के कानों में मिश्री घोलते हैं

आभार

Thursday, February 24, 2011

मुट्ठी भर सौभाग्य ..

आज एक ब्लोगर मित्र ने कहा -

  • अगर तुम अपने आपको एक बड़ी लेखिका समझती हो तो तुम गलत हो
  • लोग तुम्हारी झूठी प्रशंसा करते हैं , और तुम बहुत खुश हो जाती हो सच्चाई के धरातल पर रहो तो बेहतर होगा

मैं लिखती ज़रूर हूँ लेकिन खुद को कभी लेखिका नहीं समझा पहले इंग्लिश में लिखती थी तो सभी ने हिंदी में लिखने को प्रेरित किया पहले हिंदी में लिखना बहुत दुष्कर लगता था , फिर धीरे-धीरे शब्दों के सही उच्चारण के साथ लिखना सीख लिया मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम और एक स्थान मिल गया आस पास परिवेश में जो विसंगतियां हैं , उस पर लिखने लगी लेकिन अच्छी तरह जानती हूँ की मैं लेखिका नहीं हूँ जिसने कभी साहित्य ही पढ़ा हो , वो लेखिका कैसे बन सकता है मैंने खुद को कभी बड़ा नहीं समझा मुझे अपनी कमतरी का पूरा -पूरा एहसास है आभार तो उन पाठकों का है , जिन्होंने मुझे कभी नीचा नहीं दिखाया , बल्कि मेरे छोटे-छोटे प्रयासों का भी मान रखा

रही बात प्रशंसा की तो कोई किसी की झूठी प्रशंसा क्यूँ करेगा अगर कोई दो मीठे शब्द प्रोत्साहित करने के लिए लिख देता है , तो वही मेरा पुरस्कार है और मेरा मुट्ठी भर सौभाग्य वर्ना जिंदगी में खुद पर मुस्कुराने के लिए मेरे पास है ही क्या ?

नौकरी करती नहीं हूँ , जहाँ मेरे काम की कोई प्रशंसा होगी कोई salary मिलनी नहीं है कोई incentive मिलना नहीं है कोई appreciation मिलना नहीं है कोई promotion होना नहीं है

ब्लॉग लेखन से भी प्यार कम नफरत ज्यादा पायी

कोई 'लोहारिन' कहता है ,
कोई 'लौहांगना' ,
कोई 'जंग लगा लोहा'
कोई 'माटी का माधव'

इन उपाधियों के बावजूद , अगर एक-दो लोग मीठा बोल ही देते हैं और मुझे थोड़ी सी ख़ुशी मिल ही जाती है तो बुरा क्या है

एक निवेदन -

कभी मेरी झूठी प्रसंसा मत कीजियेगा मैं सचमुच उसे सच ही मान लेती हूँ जब कोई बताता है की ये झूठी प्रशंसा थी तो मन विरक्ति से भर जाता है

और यदि कभी मैं आपकी प्रशंसा करूँ , तो उसे सच ही समझिएगा , क्यूंकि जब भी किसी की प्रशंसा करती हूँ तो ह्रदय से करती हूँ , दिखावे की नहीं

आभार