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Friday, October 15, 2010

टिप्पणियों की आचार संहिता कैसी हो ? -- एक विमर्श !

तीन मॉस पूर्व ब्लॉग लेखन प्रारंभ किया। बहुत कुछ सीखा है यहाँ । एक बात ये भी सीखी की सब-कुछ सीखने के लिए एक उम्र बहुत छोटी है।

यहाँ पर विभिन्न विषयों पर , अनेकानेक विद्वान् मित्रों के लेख पढ़कर तथा विचार जानकार , मन के बहुत से अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर मिला है। ऐसे ही एक अनुत्तरित प्रश्न को आप सबके सामने रख रही हूँ , शायद इसका भी कोई बेहतर उत्तर आज मुझे मिल जाए।

प्रश्न
है -
  • टिप्पणियां कैसी होनी चाहिए ?
  • क्या टिपण्णी लिखते वक़्त किसी प्रकार के पूर्वाग्रह होने चाहिए ?
  • क्या टिपण्णी में व्यक्तिगत आक्षेप होना चाहिए ?
  • क्या लेखक ने जिस भावना को लेकर लेख लिखा है , पाठक को उसकी मूल भावना को समझना चाहिए ?
  • क्या लेख को पूरी तरह खारिज कर देना ही पाठक का उद्देश्य होना चाहिए ?
  • क्या अपनी टिपण्णी में लेखक को थोडा सा प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए।
  • क्या हतोत्साहित करना आवश्यक है ?
  • क्या अपमानित करना जरूरी है ?
  • यदि किसी गलती की तरफ ध्यान दिला रहे हैं , तो क्या सम्मानित भाषा नहीं प्रयोग कर सकते । क्या नीचा दिखाना जरूरी है ?
  • चर्चा और विमर्श में तरह-तरह के विचार आते हैं, जो हमारे विचारों से सर्वथा भिन्न भी हो सकते हैं, तो क्या हमें बुरा मानकर उसके ब्लॉग पर जाना छोड़ देना चाहिए ?
  • यदि पाठक के विचार लेखक से न मिलें तो क्या लेखक को कन्फ्यूज्ड कहना उचित है ?
  • पाठक को अपने विचार शालीनता से रखना चाहिए अथवा थोपना चाहिए ?
  • क्या मत-वैभिन्न होने से हमें एक दुसरे से नाराज होना शोभा देता है ?
  • एक विषय पर विचार नहीं मिलते तो किसी न विषय पर तो विचार मिलेंगे ही । तो दूर जाने की आवश्यकता है क्या ? क्या थोड़ी दूर साथ नहीं चल सकते ?
  • क्या दिये और बाती की तरह , पाठक और लेखक सदा -सर्वदा साथ नहीं रह सकते ?

मेरे कुछ पाठक जो मेल ते टिपण्णी भेजते हैं और अक्सर ये लिखते हैं की पब्लिश नहीं करियेगा । उनसे ये पूछना है की ऐसा क्यूँ है आखिर ? उनकी टिप्पणियां तो इतनी खूबसूरत होती हैं की लिखने वाले की उँगलियों को चूम लेने का दिल करता है।

आभार।