डॉक्टर, इंजिनियर , वकील , पाईलट तो शिक्षा और ट्रेनिंग के तहत बनते हैं , लेकिन एक लेखक का 'जन्म' होता है, जो , जीवन के किस पड़ाव पर होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। आज हर प्रांत, भाषा , व्यवसाय , और वय के लोगों को लिखते हुए देखती हूँ यही लगता है सृजन की एक अद्भुत क्षमता और नैसर्गिक इच्छा सभी में होती है।
लेखन के लिए एक प्रेरणा अवश्य चाहिए जो हमें परिवेश और परिस्थितियों से मिलती है। लेखक, विभिन्न स्तरों पर परिस्थितिजन्य , शौक के अनुसार , पीड़ा की गहनता के प्रेरित होकर अथवा समाज में व्याप्त अनियमितताओं से विचलित होकर लिखते हैं।
जब हम अपने परिवेश में हो रही घटनाओं से व्यथित होते हैं और उसमें बदलाव लाना चाहते हैं , लेकिन कहीं न कहीं उस बदलाव को लाने में अशक्त भी रहते हैं तो एक 'लेखक का जन्म' होता है। शायद अपनी बात ज्यादा लोगों तक लेखनी के माध्यम से पहुंचाकर समान विचारों वालों की एक जागरूक फ़ौज तैयार करता है और वैचारिक आदान-प्रदान की जो एक लहर चलती है , उससे बहुत से मकाम हासिल भी होते हैं।
सिक्के के दो पहलू होते हैं लेकिन आज किसी भी विषय के अनेक पहलू होते हैं इसलिए हर विषय को लेखक अपने नज़रिए से लिखता है और उसी विषय पर जब पाठकों के विचार शामिल होते हैं, तो अनेक अन्य पक्ष भी उजागर होते हैं , जो विषय को विस्तार एवं सार्थकता प्रदान करते हैं।
विभिन्न वय और परिवेश के लेखों द्वारा विभिन्न विचार और रचनायें पढने को मिलती हैं , कम उम्र लेखकों में 'कच्ची और गुनगुनी घूप' जैसे कोमल एहसास , और व्यस्क लेखकों द्वारा उनके जीवन के अमूल्य अनुभव और वैचारिक परिपक्वता के दर्शन होते हैं।
किन्ही रचनाओं में प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति तो कहीं वेदना से भरी गागर, कहीं देशप्रेम से लबरेज़ लेखन तो कहीं भारत-स्वाभिमान जगाती रचनायें, कहीं ह्रदय को मथती हुयी यादें तो कहीं मस्तिष्क को मथते हुए वैचारिक आन्दोलन। लेखक को लिखने की प्रेरणा अपने परिवेश से मिलती है लेकिन उसका लेखन बहुत से लोगों के लिए अनेक क्षेत्रों में एक प्रेरणा का स्रोत भी बन जाता है। इसलिए निरंतर लेखन से धीरे-धीरे एक जिम्मेदारी का एहसास भी होने लगता है। लोगों की अपेक्षाएं बढती जाती हैं और उसके साथ ही एक लेखक की जिम्मेदारी भी ।
७-८ वर्ष पहले मैंने एक पुस्तक लिखने की सोची । विषय था 'AIDS"। मैंने सोचा सरल भाषा में एक पुस्तक होनी चाहिए , जिसमें हर तरह के छोटे-बड़े प्रश्नों के उत्तर होने चाहिए जिसे आम जनता समझ सके और जागरूक हो सके। मेरे साथ बहुत से लोग मेरे इस महा-अभियान में शामिल होगये। बहुत से अस्पताल और संस्थानों में विभिन्न प्रकार की जानकारी हासिल की। एक नए अंदाज़ में पुस्तक लिखने का विचार था। जब पुस्तक लिखना शुरू किया तो मन में विचार आया देख लूँ कहीं इस तरह की कोई पुस्तक पहले से तो नहीं उपलब्ध है । फिर क्या था , बनारस में 'FRIENDS' नाम की एक दूकान है जहाँ मेडिकल की पुस्तकें मिलती हैं। वहाँ पहुंची तो देखा हर विषय पर अनगिनत पुस्तकें उपलब्ध हैं । लिखने वाले बहुत हैं लेकिन पढने का शौक रखने वाले कम हैं। फिर लिखने का विचार त्याग दिया , सोचा पहले पढ़ा जाए फिर कुछ लिखा जाएगा। लिखने से ज्यादा पढना श्रेष्ठ लगा जो सीखने का अवसर देता है। बाद में लिखना शुरू किया जब महसूस किया की समाज को कुछ दे सकती हूँ। अपने अनुभव, विषयगत ज्ञान या फिर वैचारिक आन्दोलन ।
लेकिन एक बात सच है की लिखने के लिए एक 'पीड़ा' बहुत जरूरी है जो प्रेरणा का काम करती है। कभी कभी रचनाओं में व्यक्ति कि निज-व्यथा झलकती है, तो कभी समाज कि पीड़ा का वृहद् रूप दृष्टिगोचर होता है। जितनी असीम पीड़ा होगी उतना ही बेहतर लेखन होगा। जैसे-जैसे हमारा परिवार बड़ा होता जाता है हम पूरे समाज को अपने परिवार का अंग मानने लगते हैं , तभी उसके रिसते घावों कि पीड़ा को महसूस कर पाते हैं फिर स्वतः ही लेखनी उन पर मरहम कि तरह चलती है।
लेखन यदि स्वान्तः सुखाय है तो निसंदेह लेखक को खुश एवं प्रसन्नचित रखता है , लेकिन यदि परहित में समाज के कष्ट निवारण के उद्देश्य से किया गया है तो कहीं अधिक श्रेष्ठ है। लेखन प्रेरक हो , अनुकरणीय हो , वैचारिक मंथन कराने वाला हो , किसी को दुःख देने के उद्देश्य से न किया गया हो , तथा समाज को दिशा देने वाला हो तो बेहतर है।
लेखन एक 'महाकुम्भ' है , और इस गंगा में गोते लगाने में एक स्वर्गिक आनंद है। ये लेखकों से बेहतर कौन जान सकेगा भला।
आभार।
लेखन के लिए एक प्रेरणा अवश्य चाहिए जो हमें परिवेश और परिस्थितियों से मिलती है। लेखक, विभिन्न स्तरों पर परिस्थितिजन्य , शौक के अनुसार , पीड़ा की गहनता के प्रेरित होकर अथवा समाज में व्याप्त अनियमितताओं से विचलित होकर लिखते हैं।
जब हम अपने परिवेश में हो रही घटनाओं से व्यथित होते हैं और उसमें बदलाव लाना चाहते हैं , लेकिन कहीं न कहीं उस बदलाव को लाने में अशक्त भी रहते हैं तो एक 'लेखक का जन्म' होता है। शायद अपनी बात ज्यादा लोगों तक लेखनी के माध्यम से पहुंचाकर समान विचारों वालों की एक जागरूक फ़ौज तैयार करता है और वैचारिक आदान-प्रदान की जो एक लहर चलती है , उससे बहुत से मकाम हासिल भी होते हैं।
सिक्के के दो पहलू होते हैं लेकिन आज किसी भी विषय के अनेक पहलू होते हैं इसलिए हर विषय को लेखक अपने नज़रिए से लिखता है और उसी विषय पर जब पाठकों के विचार शामिल होते हैं, तो अनेक अन्य पक्ष भी उजागर होते हैं , जो विषय को विस्तार एवं सार्थकता प्रदान करते हैं।
विभिन्न वय और परिवेश के लेखों द्वारा विभिन्न विचार और रचनायें पढने को मिलती हैं , कम उम्र लेखकों में 'कच्ची और गुनगुनी घूप' जैसे कोमल एहसास , और व्यस्क लेखकों द्वारा उनके जीवन के अमूल्य अनुभव और वैचारिक परिपक्वता के दर्शन होते हैं।
किन्ही रचनाओं में प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति तो कहीं वेदना से भरी गागर, कहीं देशप्रेम से लबरेज़ लेखन तो कहीं भारत-स्वाभिमान जगाती रचनायें, कहीं ह्रदय को मथती हुयी यादें तो कहीं मस्तिष्क को मथते हुए वैचारिक आन्दोलन। लेखक को लिखने की प्रेरणा अपने परिवेश से मिलती है लेकिन उसका लेखन बहुत से लोगों के लिए अनेक क्षेत्रों में एक प्रेरणा का स्रोत भी बन जाता है। इसलिए निरंतर लेखन से धीरे-धीरे एक जिम्मेदारी का एहसास भी होने लगता है। लोगों की अपेक्षाएं बढती जाती हैं और उसके साथ ही एक लेखक की जिम्मेदारी भी ।
७-८ वर्ष पहले मैंने एक पुस्तक लिखने की सोची । विषय था 'AIDS"। मैंने सोचा सरल भाषा में एक पुस्तक होनी चाहिए , जिसमें हर तरह के छोटे-बड़े प्रश्नों के उत्तर होने चाहिए जिसे आम जनता समझ सके और जागरूक हो सके। मेरे साथ बहुत से लोग मेरे इस महा-अभियान में शामिल होगये। बहुत से अस्पताल और संस्थानों में विभिन्न प्रकार की जानकारी हासिल की। एक नए अंदाज़ में पुस्तक लिखने का विचार था। जब पुस्तक लिखना शुरू किया तो मन में विचार आया देख लूँ कहीं इस तरह की कोई पुस्तक पहले से तो नहीं उपलब्ध है । फिर क्या था , बनारस में 'FRIENDS' नाम की एक दूकान है जहाँ मेडिकल की पुस्तकें मिलती हैं। वहाँ पहुंची तो देखा हर विषय पर अनगिनत पुस्तकें उपलब्ध हैं । लिखने वाले बहुत हैं लेकिन पढने का शौक रखने वाले कम हैं। फिर लिखने का विचार त्याग दिया , सोचा पहले पढ़ा जाए फिर कुछ लिखा जाएगा। लिखने से ज्यादा पढना श्रेष्ठ लगा जो सीखने का अवसर देता है। बाद में लिखना शुरू किया जब महसूस किया की समाज को कुछ दे सकती हूँ। अपने अनुभव, विषयगत ज्ञान या फिर वैचारिक आन्दोलन ।
लेकिन एक बात सच है की लिखने के लिए एक 'पीड़ा' बहुत जरूरी है जो प्रेरणा का काम करती है। कभी कभी रचनाओं में व्यक्ति कि निज-व्यथा झलकती है, तो कभी समाज कि पीड़ा का वृहद् रूप दृष्टिगोचर होता है। जितनी असीम पीड़ा होगी उतना ही बेहतर लेखन होगा। जैसे-जैसे हमारा परिवार बड़ा होता जाता है हम पूरे समाज को अपने परिवार का अंग मानने लगते हैं , तभी उसके रिसते घावों कि पीड़ा को महसूस कर पाते हैं फिर स्वतः ही लेखनी उन पर मरहम कि तरह चलती है।
लेखन यदि स्वान्तः सुखाय है तो निसंदेह लेखक को खुश एवं प्रसन्नचित रखता है , लेकिन यदि परहित में समाज के कष्ट निवारण के उद्देश्य से किया गया है तो कहीं अधिक श्रेष्ठ है। लेखन प्रेरक हो , अनुकरणीय हो , वैचारिक मंथन कराने वाला हो , किसी को दुःख देने के उद्देश्य से न किया गया हो , तथा समाज को दिशा देने वाला हो तो बेहतर है।
लेखन एक 'महाकुम्भ' है , और इस गंगा में गोते लगाने में एक स्वर्गिक आनंद है। ये लेखकों से बेहतर कौन जान सकेगा भला।
आभार।