ये राधिका भी ! जब देखो तब कहती है - " क्या दिव्या भारी भरकम पोस्ट लगा दी , पका देती हो तुम तो । तुम्हारे लेख पढ़कर तो नींद ही नहीं आती , Diazepam की गोली खाकर नींद बुलानी पड़ती है " । तो समर्पित है आज की हलकी-फुलकी पोस्ट राधिका के नाम ।
जैसे जैसे उम्र बढती है , बुढापा घेर लेता है । लोग खाना कम कर देते है , सोचते हैं , पचा नहीं पाऊंगा । चटक-मटक कपडे कम पहनता है , सोचता है लोग क्या कहेंगे । पार्टीज़ में कम जाता है , डरता है कहीं समाज हँसे न मुझ पर । घर में बूढी कुर्सी पर खुद ही बैठने लगता है , डरता है कहीं कोई टोक न दे मुख्य सोफे पर बैठने से।
न भाई ना! डरिये नहीं । जीने के यही चार दिना , जिंदगी न चले प्यार बिना । धन-दौलत बिना चले मगर , जिंदगी ना चले यार बिना । इसलिए खुद कों , खुद ही अकेला मत कीजिये । मिल कर रहिये । बुज़ुर्ग कम हों तो युवाओं के साथ हाथ मिलाइए। फिर देखिये ज़िन्दगी आप पर किस तरह मेहरबान होती है। उनकी ऊर्जा से खुद कों चिर-युवा बनाइये। अपने अहम् कों ताख पर रखकर युवाओं और बच्चों की मस्ती भरी अटखेलियों का आनंद उठाइए और निरंतर ऊर्जान्वित रहिये।
अरे हम तो भटक गए , बात हो रही ब्लॉगर्स की । हाँ तो जनाब जैसे जैसे एक ब्लॉगर बड़ा होता जाता है , उसकी टिप्पणियां छोटी हो जाती हैं । ऐसा क्यों ? अरे भाई वो डरने लगता है -
जैसे जैसे उम्र बढती है , बुढापा घेर लेता है । लोग खाना कम कर देते है , सोचते हैं , पचा नहीं पाऊंगा । चटक-मटक कपडे कम पहनता है , सोचता है लोग क्या कहेंगे । पार्टीज़ में कम जाता है , डरता है कहीं समाज हँसे न मुझ पर । घर में बूढी कुर्सी पर खुद ही बैठने लगता है , डरता है कहीं कोई टोक न दे मुख्य सोफे पर बैठने से।
न भाई ना! डरिये नहीं । जीने के यही चार दिना , जिंदगी न चले प्यार बिना । धन-दौलत बिना चले मगर , जिंदगी ना चले यार बिना । इसलिए खुद कों , खुद ही अकेला मत कीजिये । मिल कर रहिये । बुज़ुर्ग कम हों तो युवाओं के साथ हाथ मिलाइए। फिर देखिये ज़िन्दगी आप पर किस तरह मेहरबान होती है। उनकी ऊर्जा से खुद कों चिर-युवा बनाइये। अपने अहम् कों ताख पर रखकर युवाओं और बच्चों की मस्ती भरी अटखेलियों का आनंद उठाइए और निरंतर ऊर्जान्वित रहिये।
अरे हम तो भटक गए , बात हो रही ब्लॉगर्स की । हाँ तो जनाब जैसे जैसे एक ब्लॉगर बड़ा होता जाता है , उसकी टिप्पणियां छोटी हो जाती हैं । ऐसा क्यों ? अरे भाई वो डरने लगता है -
- कहीं कुछ कम ज्यादा न लिख दे
- कहीं कोई विवाद न हो जाए
- कहीं कोई छुटके ब्लॉगर का मान न बढ़ जाए ।
- कहीं छुटंकू का TRP न बढ़ जाए
- कहीं छुटकू ज्यादा भाव न खाने लगे
- कहीं मेरी महिमा घटने न लगे .
- सबको पता चल जाएगा की मैं इसे पढता हूँ
- मैं दूसरों कों तो टिप्पणी करने से नहीं रोक सकता , लेकिन अपनी एक टिप्पणी से तो इसको वंचित कर ही डालूँ
- बडके बिलागर की चार पोस्ट पर टिपण्णी करो , तब आयेंगे गरीबों की एक पोस्ट पर । ४: १ का रेशिओ । और छुटकू उसी में हो जायेंगे मगन कि तारनहार आये हमरे द्वार । लगेंगे गाने , आभार , आभार , आभार ।
- कभी कभी तो राधिका जैसे बडके ब्लॉगर दांत भींचे लौट जाते हैं , और छुटकी टिप्पणी भी नहीं देते । धत तेरे की , ऐसा भी क्या गुमान ।
- कभी-कभी तो बडके ब्लॉगर इतनी microscopic टिप्पणी देते हैं की हम उतने micro ( सूक्ष्म) स्तर तक सोच ही नहीं पाते और उनके monosyllable ( इकलौते शब्द) में व्यक्त अनेकार्थों कों समझ ही नहीं पाते ।
- कभी-कभी वो invisible ink में लिखते हैं , जो कमेन्ट बॉक्स में नज़र ही नहीं आती । वो आते हैं , पढ़ते हैं, होठों ही होठों में बुदबुदाते हैं और बिना चाय-पानी , दुआ-सलाम के चले जाते हैं।
- कभी-कभी बड़का ब्लॉगर घबराते हैं की कहीं उनकी टिप्पणी भीड-भाड़ में खुवाय न जाए , इसलिए भी खुदकों अलग थलग ही रखते हैं।
- जाने कौन कौन से डर पाले हैं , मन में । डरिये मत ! लिख डालिए ! दर्दे दिल। हाले मन। मन की हलचल ! याँ फिर भड़ास । टिप्पणी तो आखिर टिप्पणी है लेखक का मनोबल ही बढ़ाएगी , घटाएगी नहीं । और यकीन मानिए टिप्पणी लिखकर आप बडके से छुटके ब्लॉगर कदापि नहीं बनेंगे । बल्कि आपकी शान में एक और feather बढ़ जाएगा ।
थोडा सा प्रवचन झेलेंगे क्या ?
Food chain का नाम तो सुना ही होगा । एक सीधा खड़ा हुआ शंकु ( upright pyramid)होता है , जिसमें ढेरों टिड्डे एक साथ दल बनाकर जीवन का मज़ा लेते हैं , लेकिन शिखर पर बैठा शेर अकेला होता है । वो राजा है , उसकी जी-हुजूरी करने वाले असंख्य होते हैं , लेकिन दोस्त कोई नहीं होता ।
Food chain का नाम तो सुना ही होगा । एक सीधा खड़ा हुआ शंकु ( upright pyramid)होता है , जिसमें ढेरों टिड्डे एक साथ दल बनाकर जीवन का मज़ा लेते हैं , लेकिन शिखर पर बैठा शेर अकेला होता है । वो राजा है , उसकी जी-हुजूरी करने वाले असंख्य होते हैं , लेकिन दोस्त कोई नहीं होता ।
corporate world की बात करें तो शीर्ष पर बैठा CEO , नितांत अकेला पड़ जाता है । जीवन की हलकी-फुलकी बात किससे करे ? अरे बड़ा होने का खामियाजा तो बड़े लोग ही जानते है ।
तनहा-तनहा हम रो लेंगे , महफ़िल-महफ़िल गायेंगे ..
मुई राधिका मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी । पूछती है - " दिव्या तुम छुटकी हो या बडकी बिलागर ?
हमने कहा -"अरी मूरख , इतनी बड़ी-बड़ी टिपण्णी लिखती हूँ की पढने वाला भी पक जाए ।" दिल से लिखती हूँ दिल से। "एक हाथ से लेती हूँ दोनों हाथ से देती हूँ" ( सौजन्य IDBI Bank )। इसलिए छुटकी बिलागर हूँ छुटकी ! और हमेशा छोटे ही बने रहना चाहती हूँ।
"कल और आयेंगे नगमों की , खिलती कलियाँ चुनने वाले ,
मुझसे बेहतर लिखने वाले , तुमसे बेहतर पढने वाले ....
इसलिए जी भर के लिखो , लेख भी और टिपण्णी भी । आपके शब्द ही आपकी पहचान हैं।
वैसे कोशिश करती हूँ - "कम खर्च बालानशीं " की तर्ज पर संक्षेप में लिखकर काम चलाया करूँ पर क्या करूँ ये निगोड़ी उंगलियाँ मानती ही नहीं । कहती हैं - "ये दिल मांगे मोर "
आभार ।