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Saturday, June 18, 2011

लेखक और क्रांति

क्या अकेला चना कभी भाड़ फोड़ सकता है ?

जब भी कहीं किसी देश में , किसी मुद्दे पर क्रांति आती है तो यह बिना जन-चेतना के संभव नहीं है। हर क्रान्ति के पहले वैचारिक-क्रांति का मस्तिष्क में होना सबसे जरूरी है। इसी को जागरूकता कहते हैं यह जागरूकता कैसे आती है ? संवाद से , मीडिया से , पठन से विमर्श आदि से

आज कम्पूटर द्वारा , अनेकों वेब-साईट्स पर , फेस-बुक पर , ट्विट्टर पर , ब्लॉगिंग द्वारा करोड़ों लोगों तक पहुंचा जा सकता है। अपने विचारों को अनेक लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। लोगों की आवाज़ में आवाज़ मिलाना संभव हुआ है । Information और technology की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

संचार के माध्यम से हिंसा-रहित , बिना खून-खराबे के , विचारों का आदान-प्रदान संभव हो सका है जन चेतना जगाने में आधुनिक तकनीक की महती भूमिका है।

व्यस्तता के इस दौर में जहाँ रोजी-रोटी के लिए व्यक्ति हड्डी-तोड़ मेहनत कर रहा है , और उसके पास आन्दोलनों में सड़क पर उतरने का वक़्त नहीं है , वहाँ पर संचार माध्यम से अपनी बात को लिखकर अपना योगदान कर पा रहा है बच्चा-बच्चा। और यही लिखित शब्दों की ताकत ही है जो समाज को , क्रांति की नयी ऊर्जा से भर रहा है

कितने ही लोग सड़क पर उतरकर आन्दोलन का हिस्सा नहीं बन पाते , अनशन पर भी नहीं बैठ पाते , लेकिन वे लेखन के माध्यम से अपना योगदान करना चाहते हैं , अपनी आवाज़ क्रांतिकारियों की आवाज़ में मिलाना चाहते हैं और हर क्रान्ति को सफल बनाने के लिए वैचारिक क्रांति लाना चाहते हैं। तो क्या लेखन में समय देना व्यर्थ है??

कोई भी क्रान्ति किसी एक के लाने से नहीं होती , जन-जन का सहयोग जब विभिन्न स्तर पर होता है , और लोग जी-जान से समर्पित होते हैं , वैचारिक क्रांति उन पर पूरी तरह छा जाती है , तभी कोई क्रांति अपना रंग लाती है।

क्या लेखक जो अपने लेखन से विचारों के बीज बोता है और विचारों को पैदा करता है , उसे आयाम देता है , और समय के साथ उसमें से क्रांति के अंकुर फूटते हैं , क्या यह भूमिका नगण्य है ?

Zeal

Friday, October 15, 2010

टिप्पणियों की आचार संहिता कैसी हो ? -- एक विमर्श !

तीन मॉस पूर्व ब्लॉग लेखन प्रारंभ किया। बहुत कुछ सीखा है यहाँ । एक बात ये भी सीखी की सब-कुछ सीखने के लिए एक उम्र बहुत छोटी है।

यहाँ पर विभिन्न विषयों पर , अनेकानेक विद्वान् मित्रों के लेख पढ़कर तथा विचार जानकार , मन के बहुत से अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर मिला है। ऐसे ही एक अनुत्तरित प्रश्न को आप सबके सामने रख रही हूँ , शायद इसका भी कोई बेहतर उत्तर आज मुझे मिल जाए।

प्रश्न
है -
  • टिप्पणियां कैसी होनी चाहिए ?
  • क्या टिपण्णी लिखते वक़्त किसी प्रकार के पूर्वाग्रह होने चाहिए ?
  • क्या टिपण्णी में व्यक्तिगत आक्षेप होना चाहिए ?
  • क्या लेखक ने जिस भावना को लेकर लेख लिखा है , पाठक को उसकी मूल भावना को समझना चाहिए ?
  • क्या लेख को पूरी तरह खारिज कर देना ही पाठक का उद्देश्य होना चाहिए ?
  • क्या अपनी टिपण्णी में लेखक को थोडा सा प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए।
  • क्या हतोत्साहित करना आवश्यक है ?
  • क्या अपमानित करना जरूरी है ?
  • यदि किसी गलती की तरफ ध्यान दिला रहे हैं , तो क्या सम्मानित भाषा नहीं प्रयोग कर सकते । क्या नीचा दिखाना जरूरी है ?
  • चर्चा और विमर्श में तरह-तरह के विचार आते हैं, जो हमारे विचारों से सर्वथा भिन्न भी हो सकते हैं, तो क्या हमें बुरा मानकर उसके ब्लॉग पर जाना छोड़ देना चाहिए ?
  • यदि पाठक के विचार लेखक से न मिलें तो क्या लेखक को कन्फ्यूज्ड कहना उचित है ?
  • पाठक को अपने विचार शालीनता से रखना चाहिए अथवा थोपना चाहिए ?
  • क्या मत-वैभिन्न होने से हमें एक दुसरे से नाराज होना शोभा देता है ?
  • एक विषय पर विचार नहीं मिलते तो किसी न विषय पर तो विचार मिलेंगे ही । तो दूर जाने की आवश्यकता है क्या ? क्या थोड़ी दूर साथ नहीं चल सकते ?
  • क्या दिये और बाती की तरह , पाठक और लेखक सदा -सर्वदा साथ नहीं रह सकते ?

मेरे कुछ पाठक जो मेल ते टिपण्णी भेजते हैं और अक्सर ये लिखते हैं की पब्लिश नहीं करियेगा । उनसे ये पूछना है की ऐसा क्यूँ है आखिर ? उनकी टिप्पणियां तो इतनी खूबसूरत होती हैं की लिखने वाले की उँगलियों को चूम लेने का दिल करता है।

आभार।