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Friday, May 18, 2012

दशक का चिट्ठाकार-- एक समीक्षा.

सर्व-प्रथम ब्लॉग-सम्मान आयोजित करने वाले ब्लॉगर श्री रवीन्द्र जी को बधाई एवं शुभकामनाएं इस आयोजन के लिए।

आजकल ब्लॉगजगत में गहमा-गहमी है। हर तरफ दशक का ब्लॉगर और दशक का चिट्ठा ही चर्चा का विषय बने हुए हैं। असंख्य आलेख आ चुके हैं इस पर। लेखकों में संतोष कम और असंतोष ज्यादा दिख रहा है। अतः यह ध्यान देने की ज़रुरत है की ऐसा क्यों है।

जज अथवा निर्णायक बनना एक अति-दुरूह कार्य है। इसके लिए "निष्पक्ष" होना पहली शर्त होती है। अर्थात निर्णायक मंडल को दोस्तीदारी और निज-हित से ऊपर उठकर इस सम्मान का सम्मान करना होगा , निर्णय और चयन प्रक्रिया के दौरान।

आचार्य चाणक्य के अनुसार , किसी भी कार्य को करने से पूर्व बहुत भली प्रकार से सोच बिचार लेना चाहिए की हम ये काम क्यों शुरू करने जा रहे हैं और इस कार्य से समाज को कितना लाभ हो रहा है।

चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता होना बहुत ज़रूरी है। जैसे चुनाव के दौरान EVM मशीन में घोटाले होते हैं , उस प्रकार नाम के आगे बने गोलों में मतदान करने और सही परिणाम के उल्लिखित होने पर संशय बना रहता है।

निज कटुता के चलते कुछ ब्लॉगर्स की टिप्पणियां हटा दी जा रही हैं और मोडरेट भी कर दी जा रही हैं। सूचना मिली है की कुछ लोगों द्वारा अपनी पसंद का नाम देने पर उसे दर्शाया तो गया लेकिन २४ घंटों के अन्दर उस नाम को हटा भी दिया गया। इस प्रकार की हरकतों से आयोजक की मंशा संशय के दायरे में आ जाती है। और उनकी निष्पक्षता पर संदेह भी होता है।

चुनाव प्रक्रिया बेहद पारदर्शी होनी चाहिए। इसके लिए सर्वप्रथम एक नामों की सूची जारी करनी चाहिए । उसमें नामांकन , ब्लॉगर द्वारा स्वयं होना चाहिए। फिर उन नामों पर अन्य ब्लॉगर्स द्वारा वोटों के मिलने पर उनकी गणना होनी चाहिए। ब्लॉगर से ये अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए की वह अपना मत , अपने लिए इस्तेमाल कर सके। कभी-कभी यही एक मत निर्णायक साबित होता है।

जो संख्या अभी , दर्शायी जा रही है उस पर भी लोगों को संदेह है। अतः किसी के भी मन में आयोजक के प्रति कोई शक न आये इसके लिए मतदान कमेन्ट के माध्यम से होना चाहिए। जिसे सभी लोग देख सकें और अपने मन में किसी प्रकार का संशय न पालें।

बहुत से लोगों को यह भी आपत्ति है की इस सम्मान का नाम दशक का ब्लॉगर नहीं होना चाहिए, क्यों जो नाम सामने आये हैं उनमें से शायद ही किसी ने एक दशक पूरा किया हो। और कोई भी सम्मान उसके कार्य-काल की अवधी से नहीं अपितु उसकी योग्यता के आधार पर मिलता है। अतः मेरे विचार से इस समान का नाम " दशक का ब्लॉगर" न होकर "ब्लॉगर सम्मान--2011 हो तो बेहतर होगा। इससे एक लाभ यह भी होगा बुज़ुर्ग के साथ युवा ब्लॉगर्स को भी मौक़ा मिल सकेगा।

चूँकि मतदान करने वालों में युवा भी शामिल है और नवोदित भी शामिल है , जिसने दशक के चिट्ठाकारों को एक दशक तक पढ़ा ही नहीं है , अतः वे उनकी योग्यता से पूरी तरह परिचित ही नहीं हैं, फिर वे पूरे दशक में किये गए योगदान को जाने बगैर मतदान कैसे करेंगे? इस परिस्थिति में भी इसे दशक का नहीं बल्कि 2011 का सम्मान कहना ही ज्यादा उचित प्रतीत हो रहा है।

आयोजक को यदि अपने आयोजन को त्रुटी-रहित बनाना है तो आलोचनाओं को संज्ञान में लेना ही होगा। त्रुटियों को दूर करना होगा। चयन-प्रक्रिया पारदर्शी करनी होगी और इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि किसी के भी मन में द्वेष और वैमनस्य और निराशा न स्थान लेने पाये। क्योंकि हमारा उद्देश्य तो लेखकों को प्रोत्साहित करना है, उन्हें हतोत्साहित करना नहीं।

कुछ लेखक अपनी मर्यादाओं को लांघ रहे हैं । खुद को बेहतर और सुझाव देने वालों को लघुतर समझ , उनसे अपमान जनक भाषा में बात , दोषारोपण और कीचड उछाल रहे हैं । जो लेखनी का अपमान है। माँ सरस्वती का अपमान है। अक्षम्य है।

मेरे विचार से इस चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी एवं सफल बनाने के लिए इसे पुनः शुरू करना चाहिए, जिसमें आयोजन के नियम वा शर्तों का स्पष्ट उल्लेख करके ब्लॉगर्स द्वारा टिप्पणी के माध्यम से नामांकन आमंत्रित करना चाहिए।

एक निश्चित अवधी के बाद जब नामांकन-प्रक्रिया पूरी हो जाए तो चयन हेतू लोगों को मतदान के लिए आमंत्रित कीजिये ।

एक से ज्यादा वोटों को और बोगस वोटों को रोकने कि समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।


मैं अपनी पसंद के कुछ ब्लॉगर्स का नाम लिख रही हूँ। मेरी इच्छा है इन लेखक/लेखिकाओं के नामों को भी उस सूची में शामिल किया जाए।


१-वंदना गुप्ता
२-रचना
३-प्रतिभा सक्सेना
४-माहेश्वरी कनेरी,
५-जेन्नी शबनम,
६-फिरदौस,
७-शिल्पा मेहता,
८-अंशुमाला,
९-पल्लवी
१०-घुघूती बासूती,
११-पारुल,
१२-संगीता स्वरुप,
१३ संगीता पुरी,
१४- राजेश कुमारी,
१५-अदा
१६-रश्मि प्रभा
१७- सदा
१८-रश्मि रवीजा,
१९-विभा रानी श्रीवास्तव
२०-अंजू चौधरी
२१-मृदुला
२२-डॉ अरुणा कपूर
२३-सोनल रस्तोगी
२४- अनीता
२५-निर्मला कपिला
२५-रेखा श्रीवास्तव
२६-वाणी गीत
२७-अराधना
२८-निवेदिता
२९-वंदना अवस्थी दूबे
३०- कविता रावत
३१-क्षमा
३२- सुनीता शानू

३३-शोभना चौरे
आशा सक्सेना
आशा
जोगलेकर
साधना
वैद्य
रंजू भाटिया
मृदुला
प्रधान ,
-----------------------------------------

१- श्री भारत भूषण
२- पी सी गोदियाल
३-लोकेन्द्र सिंह राजपूत,
४ -महेंद्र वर्मा
५- प्रतुल वशिष्ठ
६- दिवस गौड़
७- दिनेश ( रविकर)
८- वाणभट्ट
९- वीरू भाई
१० संजय कटानवरे
११- अनूप शुक्ल
१२ रवि रतलामी
१३-अरविन्द मिश्र,
१४-अनवर जमाल,
१५-मंसूर अली
१६- अली
१७-ए एस मासूम।
१८-अमित श्रीवास्तव
१९-अरुण साथी
२०- कुंवर जी
२१-कुंवर कुसुमेश
२२ - अजय कुमार झा
२३ -रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
२४- चंद्रभूषण - गाफिल
२५- डॉ दराल,
२६- केवल राम
२७- संजय मो सम कौन
२८- कुश्वंश
२९- डॉ भोला-कृष्णा
३०-उन्मुक्त
३१-मनोज भारती
३२-मनोज ( विचार)
३३-सतीश पंचम
३४ -सुरेश चिपलुनकर
३५- संजय बोंगाडी
३६ -खुशदीप
३७- दिनेश राय दिवेदी
३८-सतीश सक्सेना
३९-राजेश उत्साही
४० -राकेश कुमार
४१- मुकेश पांडे (चन्दन)
४२-प्रवीण पण्डे
४३-प्रवीण शाह
४४-दीर्घतमा,
४५-पी एन सुब्रमन्यन
४६-जय कृष्ण तुषार
४७-सुरेन्द्र झंझट
४८-राहुल सिंह
४९-हंसराज सुज्ञ
५०-कैलाश शर्मा
५१-अलबेला खत्री
५२- डॉ श्याम गुप्त
५३-गिरीश बिल्लोरे
५४ -फिलिप शास्त्री
५५-दीपक बाबा
५६-अंतर सोहिल,
५७-महेंद्र श्रीवास्तव
५८- राजेन्द्र स्वर्णकार।

५९-कौशलेन्द्र।
६०- समीर लाल
६१- रजनीश झा।
६२-डॉ राजेंद्र तेला

६३-ललित शर्मा
६४-दीप पाण्डेय,
६५-विचार शून्य
६६
- अमित शर्मा
६७-हरदीप राणा 'कुंवर जी'
६८
-अविनाश चंद्र
६९-मुकेश कुमार सिन्हा,
७०
-आशीष राय
७१-रतन सिंह शेखावत
७२-यशवंत,
७३
-हिंदी ब्लॉग टिप्स,
७४
-चंद्रमौलेश्वर।
७५
-गिरधारी लाल खंकरियाल
७६-भारतीय नागरिक
अविनाश वाचस्पति
अरुण चन्द्र राय
हिमांशु,
अमरेन्द्र
त्रिपाठी।
सुनील
दत्त,
विश्वजीत
,
मान
सिंह पवार,
विनीत
कुमार सिंह
काजल
कुमार।
उदयवीर सिंह
सुबीर रावत।
दिलबाग विर्क
डॉ आशुतोष मिश्र।

मरणोपरांत भी ब्लॉगर्स को सम्मानित किया जाए--

१- डॉ अमर कुमार,
२- डॉ रूपेश श्रीवास्तव
३-हिमांशु मोहन

मुझसे अनजाने में कहीं कोई त्रुटी रह गयी हो तो क्षमा अपेक्षित है ।
सम्मान समारोह को बेहतर बनाने के लिए विद्वान् पाठकों कि राय आमंत्रित है।

Zeal

Friday, August 5, 2011

दिलों में सम्मान क्या मुलाक़ात के बाद उपजता है ?


आजकल ब्लॉगर्स एक दुसरे से मुलाक़ात कर रहे हैं ! देश-विदेश, शहरों और राज्यों की दूरियां छोटी हो रही हैं ! दिल मिल रहे हैं ! परस्पर प्रेम वर्षा हो रही है और मुलाकातियों के हृदयों में एक-दूजे के लिय सम्मान उफान पर है ! उनके ब्लौग पर आलेख आ रहे हैं एक दुसरे की शान में ! प्रसन्नता की बात है , लेकिन ऐसा प्रतीत होता है जैसे जो लोग मुलाकातों से वंचित रह जाते हैं उनका अस्तित्व ही नहीं ! मुलाकातियों का गुट बन जाता है , जिसमें अन्य ब्लॉगर्स उपेक्षित रहते हैं ! उनके लेखन का कोई सम्मान नहीं और उनसे किंचित द्वेषपूर्ण व्यवहार भी होता है !

  • प्रश्न यह है की क्या सम्मान लेखन को मिलना चाहिए या व्यक्ति को ?
  • आत्मीयता सिर्फ मुलाकातों पर निर्भर है क्या ?
  • क्या यह गुटबाजी को तो बढ़ावा नहीं दे रहा ?
  • क्या यह अन्य ब्लॉगर्स की उपेक्षा का कारण तो नहीं बन रहा ?
  • क्या इसके कारण लेखक का फोकस बेहतर विषयों से हटकर गैर जरूरी सोशल-नेटवर्किंग पर तो नहीं केन्द्रित हो रहा ?

ऐसी मुलाकातों से ब्लॉगर्स की स्वतंत्रता छिन जाती है , वे एक दुसरे की प्रशंसा करने को बाध्य हो जाते हैं ! टिप्पणियों और आलेखों से इमानदारी लुप्त हो जाती है ! प्रायः वे एक दुसरे को महिमामंडित करते हुए दिखाई देते हैं ! समझ भी नहीं आता की ऐसे आलेखों पर टिपण्णी क्या लिखी जाए !

मुझे लगता है , मेल-मिलाप हो, प्रेम रहे , सम्मान रहे लेकिन अन्य ब्लॉगर्स को उपेक्षित होने का अहसास न करायें , गुटबाजी न करें और बेहतर लेखन के लिए सम्मान बना रहे!

ब्लॉगर्स मीट में हिंदी ब्लौगिंग के विकास और स्थापना से जुड़े विषयों पर चर्चा होनी चाहिए और उसके क्या परिणाम और सुझाव आये इनकी चर्चा होनी चाहिए आलेखों पर !

Zeal

Monday, March 14, 2011

इक्यावन बुके , पच्चीस हज़ार टिशू-पेपर के पैकट -stand in queue please !

सब तरफ उत्सव की तैय्यारियाँ दिख रही थीं। फिजा में उल्लास के साथ कसक भी बिखरी हुई थी । बसंत के सुर्ख रंगों में होली के अनंत रंग घुले हुए थे। वातावरण में संगीत की सुन्दर धुन बज रही थी ...

तुम इतना जो मुस्कुरा रही हो ...
क्या गम है जिसको छुपा रही हो ...

हमने एक सतरंगी टोकरे में इक्यावन बुके सजाये हुए थे और एक ट्रक भर के पचीस हज़ार ब्लॉगर्स के लिए टिशू पेपर की व्यवस्था की थी । पंक्तिबद्ध होकर सभी ब्लॉगर अपने-अपने लिए निर्धारित वस्तुएं ग्रहण करते जा रहे थे और मुझे शिष्टाचारवश धन्यवाद भी दे रहे थे । मैं भावुक नयनों से सभी को भीनी-भीनी विदाई दे रही थी।

तभी कोने में बैठी राधिका पर मेरी नज़र पड़ी । रोने के कारण उसकी नाक सुड-सूड़ कर रही थी पूछा "क्या हुआ ?, कुछ लेती क्यूँ नहीं "। उसने कहा - "एक से मेरा क्या होगा "......हमने कहा - "आप दो लीजिये".....बोली- " इतने ब्लॉग लिखे कि सूख कर छुहारा हो गयी , लेकिन मुझे कोई भी ब्लॉगर-सम्मान नहीं मिला" , मेरे दिल के छालों के लिए एक बरनौल मिल जाये तो कुछ राहत आये"

पाठकों से निवेदन है जाते जाते अपने पैकट से मेरे लिए भी एक टिशू पेपर देते जाइए। न हो तो रुमाल ही दे दीजिये और मेरी सखी राधिका के लिए बरनौल भिजवा दीजियेगा।

फिजां में गाने की धुन बदल चुकी थी ...

मुबारक हो सबको समां ये सुहाना ..
मैं तो दीवाना , दीवाना , दीवाना ..
मैं खुश हूँ मेरे आंसुओं पे न जाना ..
मैं तो दीवाना , दीवाना , दीवाना ...

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Friday, September 3, 2010

इन्द्रधनुषी दिव्या. !

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इस पोस्ट में पिछले एक हफ्ते में हुए अनुभवों को शेयर कर रही हूँ। जो सबके नहीं तो कुछ लोगों के काम अवश्य आयेंगे ऐसा विश्वास है।

पिछले दो-तीन दिनों में ज्यादातर पाठकों ने लिखा की आपकी सार्थक पोस्ट का इंतज़ार है..

मैंने सोचा सार्थक पोस्ट कैसी होती है भाई ? अंतर्मन ने जवाब दिया - " तुम्हारी हर पोस्ट सार्थक होती है , क्यूंकि हर पोस्ट समाज के सुधार के लिए लिखी गयी होती है। " यदि कुछ लोग शशि थुरुर, ललित मोदी और माधुरी गुप्ता जैसे लोगों को बेनकाब कर देश को लुटने से बचा रहे हैं, तो फिर अरविन्द मिश्र और अमरेंद्र जैसे लोगों को बेनाकाब का समाज के आधे बड़े हिस्से , जो की नारियों से बना है , की अस्मिता को बचाने की खातिर लिखी गयी पोस्ट साथक क्यूँ नहीं है ? अगर अरविन्द मिश्र मुझे कटही कुतिया कहें और अमरेन्द्र मुझे कहें की मैं " डॉक्टर के नाम पे कलंक हूँ ", तो यदि मैं अपनी आवाज़ बुलंद करूँ , तो वह पोस्ट सार्थक क्यूँ नहीं है ?

अरविन्द मिश्र का कहना है की " अभी तो मैं जवान हूँ , और महिला पाठक मरे ब्लॉग पर आना बंद नहीं कारेंगी"... सही कहा आपने अरविन्द जी...कुछ लोग देख- सुन कर सीखते हैं, लेकिन कुछ लोग गड्ढे में गिरने के बाद ही सीखते हैं।

महोदया अदा जी ने मेरे खिलाफ पोस्ट लगायी और आक्षेप लगाया की डाक्टर्स को नैतिक मूल्यों का ख़याल रखना चाहिए। महोदया अदा जी से मेरा कहना है कृपया पूरा प्रकरण [ द्विपक्षीय ] जान लिया करें , तभी कुछ लिखें। अदा मुझे जानती भी नहीं फिर भी जाने किन पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर इसने ऐसा किया। वो भी उस अमरेन्द्र के लिए जिसने मुझे links दे-दे कर दिखाया था की देखो अदा और महफूज़ के बीच क्या- क्या चलता है।
बहुत सी पोस्टों पर महफूज़ महोदय लिखते हैं। ' आई लव यू "। इन बातों से मेरा कोई लेना-देना नहीं , फिर भी महोदय अदा को ये बताना जरूरी है की, जिनको वो मरहम लगा रही हैं , और डॉक्टर्स को बदनाम कर रही हैं, वो महोदय इनके बारे में क्या ख़याल रखते हैं। और महफूज़ को तो सभ्य कहना , सभ्यता की तौहीन होगी। जो मुझे
जानता तक नहीं ठीक से उसने बहुत ही असभ्य लहजे में मेरे व्यक्तित्व पर प्रहार किया ।

अदा जी , डॉक्टर्स को मानवीय मूल्य मत सिखाइए ।

एक बार मेरी एक पोस्ट [Eleven days] पर डॉ दाराल ने पुछा, दिव्या तुम अपने नाम के डॉ ना नहीं लिखती हो ? कारण है , मैं यहाँ सिर्फ एक ब्लॉगर हूँ। अन्यथा थाईलैंड आने के पहले लखनऊ और इंदौर में छेह वर्ष तक प्रक्टिस कर चुकी हूँ। सन २००६ में डॉक्टर्स दे पर सम्मान भी पा चुकी हूँ , कभी हिम्मत कर सकी तो अपनी तस्वीरों के साथ उस शुभ दिन की भी चर्चा यहाँ करुँगी।

अमरेंद्र जी , पिछले २४ घंटों में जो तीन पत्र आपने मुझे लिखे हैं, आप मुझे चाहे जितनी बार लिखें , आप मुझे प्यार करते हैं , और मुझे अपनी बेहेन और माँ नहीं समझ सकते। तो मैं ये बता दूँ आपको , एक स्त्री सिर्फ ऐसे पुरुष को प्यार करती है जो स्त्री को अपने से कमतर नहीं समझता , उसके मान-सम्मान की रक्षा करता है, तथा उससे इर्ष्या नहीं करता है। आपने मुझे डॉक्टर के नाम पर कलंक लिखकर , अपने जिंदगी की सबसे बड़ी भूल की है। रही बात आप के भाई होने की , तो वो भी आप नहीं हो सकते , क्यूंकि आजकल तो भाइयों द्वारा "ऑनर किलिंग " का फैशन है और मेरे ऑनर को आप बखूबी किल कर ही चुके हैं।

चलिए बात करते हैं श्रीमान ज्ञानदत्त जी की, इनको आदरणीय समझती थी, बहुत छोटी हूँ इनसे, मन में ख्वाहिश थी एक बार ये मेरे ब्लॉग पर आयें और आशीर्वाद दें। ज्ञान जी नहीं आये, एक निराश , नवोदित ब्लोगर [ दिव्या ] ने लिख दिया 'अंतिम प्रणाम ' । इस अंतिम प्रणाम को ज्ञान जी ने मौत का फरमान समझ लिया, और ठोक दी एक पोस्ट दिव्या के नाम। जब एक सैकड़ा सहानुभूति मिल गयी और मित्रों ने दिव्या को कंडेम कर दिया , तब जाके मेरे पूज्य ज्ञान जी के कलेजे को ठंडक मिली। तिल को ताड़ बनाना कोई ज्ञान जी से सीखे ।

अरे दिव्या , तुम भी कितनी मुर्ख हो, शिकायत अपनों से की जाती है, गैरों से नहीं।

एक प्रश्न है...महाराष्ट्र के लाटूर, २००५ की सुनामी , हेती के तूफ़ान में मरने वालों को क्या दिव्या ने " अंतिम प्रणाम कहा था ?

अगर मेरे.. 'अंतिम प्रणाम' ..इतने ही इफेक्टिव हैं तो ... कसाब ...नक्सलवादी .. और ..आतंकवादियों.. को मेरा अंतिम प्रणाम ।

[फैशन के दौर में गारेंटी की कामना न करें ]

इस कठिन घडी में अनेक शुभचिंतकों ने मेरा साथ भी दिया , जिसमें सम्मानीय पुरुष एवं महिला ब्लोगर्स दोनों हैं। आप सभी को ह्रदय से आभार।

शोभना चौरे जी ने मेरी कठिन मानसिक अवस्था को समझा , उनके शब्द मरे लिए अमृत बूंद की तरह थे। माँ तो सभी की अच्छी होती है, लेकिन शोभना चौरे जी में तो ..." इश्वरत्व " हैं। शोभना जी आपका एक बार पुनः अभिनन्दन। आपने मुझे नया जीवन-दान दिया है।

एक पाठक ने लिखा , आशा है तीन पोस्ट पहले वाली दिव्या को वापस देख सकूँगा। ..प्रिय राजन, मैं तो ऐसी ही हूँ, ऐसी पोस्टों को भी देखो, इसमें निहित चेतना जगाती सार्थकता को देखो, इस तरह की पोस्टें भी दिव्या का एक रंग है। जब तक सारे रंग नहीं होंगे, इन्द्रधनुष अधुरा रहेगा।

उन्मुक्त जी के शब्दों से बहुत हिम्मत मिली । उन्होंने आग्रह किया है की रोग और उनके निदान पर भी पोस्ट्स लिखूं। मेरी सभी पोस्ट , जो मेडिकल से रिलेटेड होंगी , वो सभी आदरणीय उन्मुक्त जी को समर्पित होंगी।

राजेश उत्साही जी , महक जी , अर्थ जी, राजन जी , उन्मुक्त जी, अनूप जी,आशीष जी एवं विश्वनाथ जी ने इस कठिन घडी में मेरा मनोबल बनाये रखने में बहुत मदद की। सदैव आभारी रहूंगी।

मरे ब्लॉग पर moderation naa होने से , कुछ लोग असभ्य और अशिष्ट भाषा का प्रयोग कर टिपण्णी कर रहे थे , इसके लिए आदरणीय अनूप शुक्ल जी की राय से moderation लगा रही हूँ। पाठकों की असुविधा के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ । संभवतः आप लोग मेरी मजबूरी समझेंगे।

अंत में एक बार फिर अपने शुभचिंतकों की कर्जदार हो गयी हूँ, जिसके लिए आभार शब्द छोटा लग रहा है ।

ये थे मेरे मन के विचार जो , पिछले तीन दिनों में आये...
जो अच्छा लगे , उसे अपना लो, जो बुरा लगे, उसे जाने दो....

PS-

1- Arvind Mishra has commented in a foul language on all my blog-posts with a fake name of -Ajit

2-Amrendra has commented with a fake name of Ravi.

So readers are requested to be careful .