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Sunday, August 9, 2015

सोशल मीडिया पर आतंकवाद

समाचार पत्रों पर निगाह दौड़ाते हुए पाया की किस तरह ब्लॉगरों और लेखकों की हत्या की जा रही रही है ! बांग्लादेश में अब तक चार ब्लॉगरों की हत्या की जा चुकी है ! हमारे फेसबुक मित्र संजय चौहान को जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं !
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ये एक विकट होती समस्या है ! सोशल मिडिया पर लिखने वाले वाले अब सुरक्षित नहीं हैं ! अनेक कुत्सित और कलुषित विचारों वाले खूंखार प्रकृति के लोग सोशल मिडिया पर सक्रीय हैं ! इनमें से कुछ सरकार के गुंडे हैं, तो कुछ अन्य पार्टियों के ! कुछ धर्म विशेष के गुंडे हैं तो कोई दलित समूह के ! कोई यादव समाज का, कोई जाट समाज का, कोई ब्राम्हण तो कोई कायस्थ समाज का !अलग अलग वर्ग, जाती , धर्म और संगठनों के ठेकेदार सोशल मिडिया पर गुंडागर्दी की जड़ें जमायें बैठे हैं ! चूँकि समाज इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटा हुआ है और कोई भी किसी दुसरे का वर्चस्व नहीं चाहता !
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सहअस्तित्व में कोई जीना ही नहीं चाहता ! हर वर्ग यही चाहता है की सिर्फ उसके समर्थन में ही लिखा जाये , किसी अन्य समुदाय अथवा दल को समर्थन न दिया जाए ! आलोचना सिर्फ विरोधी दलों की जाए , उनके द्वारा समर्थित दलों की आलोचना तक न हो ! कितनी कुत्सित और तुच्छ सोच बढ़ रही है समाज में जो सोशल मिडिया के माध्यम से उजागर हो रही है !
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सोशल मिडिया पर एक से बढ़कर एक गुंडे बैठे हैं जो शराफत का चोगा ओढ़े हुए हैं ! पूरे पूरे गिरोह के साथ बैठकर दलगत राजनीति करते हैं ये लोग ! समूह में आकर उत्पीड़ित करते हैं लेखकों को ! पता नहीं इन प्रायोजित लोगों को पैसा किन संगठनों के ज़रिये से आता है लेकिन ये लोग सामान्य जनता के बीच सफेदपोश बने बैठे हैं और वाचिक आतंकवाद से शुरू करके , खुनी आतंकवाद से सोशल-मीडिया को रक्त-रंजीत कर रहे हैं !
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एक नए तरह के आतंकवाद की और बढ़ती अत्यंत खेदजनक और भयावह प्रगति जहाँ लोग एक दुसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं ! विरोधी विचारों को पचा नहीं पा रहे ! अहम इतना बड़ा ! धैर्य एकदम नगण्य ! बात-बात पर तिलमिलाना और लेखक के खून का प्यासा हो जाना ! कहाँ जा रहा है ये समाज ? कितना पतन देखना बाकी है अभी?

Thursday, November 15, 2012

फेसबुक क्यों पसंद है ?





फेसबुक मुझे इसलिए पसंद है क्योंकि इस पर उन्माद के रोगियों को ब्लॉक करने की सुविधा है , और ब्लॉग मुझे इसलिए पसंद है क्योंकी इस पर उन्मादियों के कमेन्ट मॉडरेट करने की सुविधा है !

जय हिन्द !
वन्दे
मातरम् !

Sunday, November 4, 2012

ब्लोगिंग और फेसबुक को बदनाम करते लोग


कुछ लोग अंतरजाल पर हुयी तरक्की को नकारात्मक मानते हैं !  विज्ञान की इतनी बड़ी देन को वरदान न मानकर उसका अपमान करते हैं !  लोगों का कहना है की अंतरजाल और फेसबुक का उपयोग करने वाले संवादहीनता रखने लगते हैं ! इसे बड़ी भ्रान्ति और क्या हो सकती है भला?

  • टेक्नोलोजी और इंटरनेट के उपयोग से पिछले एक दशक में समाज में हर क्षेत्र में क्रान्ति की लहर दौड़ गयी है
  • कविता कहानी लिखने वालों को एक मंच मिल गया है
  • लोगों का संपर्क संसाधन बढ़ा है , अपने स्वभाव और रूचि के अनुरूप मित्र एवं संपर्क बनते हैं
  • एक नयी और इमानदार मीडिया का इजाद हुआ है !
  • आम आदमी की आवाज़ बुलंद हुयी है !
  • फेसबुक ने तो लडखडाते लोकतंत्र को ही थाम रखा है !
  • कहीं भी कोई अनियमितता हुयी नहीं कि जंगल में आग की तरह फेसबुक पर जनता की आवाज़ बुलंद हो जाती है !
  • सत्ताधारी तानाशाह भी डर-डर कर थोडा अनुशासन में रहने को बाध्य हुए हैं !
  • गृहणियों की भी आवाज़ मुखर हुयी है , व्यर्थ प्रपंच से बेहतर उन्होंने लिखना समझा
  • लेखकों में ज्ञान और विश्वास बढ़ा !
  • जानकारियों से ओत-प्रोत इस  अंतरजाल ने लोगों का बौद्धिक स्तर ऊपर किया है !
  • लोगों के व्यक्तित्व का विकास हुआ है !
  • हमारा सामान्य ज्ञान समृद्ध हुआ है !

अतः निवेदन है व्यर्थ ही अंतरजाल के उपयोग , ब्लौगिंग और फेसबुक अपडेट्स को बदनाम मत कीजिये !
मैं तो टेक्नोलोजी के इस अद्भुत वरदान के लिए स्वयं को बहुत भाग्यशाली समझती हूँ ! शुक्रगुजार हूँ कि मैं इस  सुविधा का उपयोग कर रही हूँ!

Zeal

Thursday, September 6, 2012

दशक का ब्लॉगर सम्मान--एक समीक्षा

नज़ाकत और नफासत की नगरी लखनऊ में हुए ब्लॉगर सम्मान पर असंख्य पोस्टें आ चुकी हैं अब तक ! मैंने तटस्थ रहने की बहुत कोशिश की लेकिन डॉ शास्त्री की पोस्ट आज पढने के बाद बेहद दुःख हुआ इसलिए तटस्थ रहना एक गुनाह समझा और अपने मन में आये विचारों को शब्द देना ज़रूरी समझा !

कहते हैं कि -"मुस्कुराईये की आप लखनऊ में हैं "--लेकिन ये क्या , नवाबों के शहर से लौटे अधिकाँश ब्लॉगर्स के चेहरे से मुस्कान मानो उड़नछू हो गयी हो !

आखिर ऐसा क्यों हुआ ?

सबसे पहले तो आयोजकों के अथक प्रयास के लिए अनेकों बधाईयाँ ! उसके बाद सभी सम्मानित लेखक और लेखिकाओं को ढेरों बधाई एवं शुभकामनाएं !

मेरे विचार से किसी भी प्रकार का ब्लॉगर सम्मलेन हो , ब्लॉगर्स को सबसे ज्यादा उत्सुकता एक दुसरे से मिलने और परिचय प्राप्त करने कि होती है , लेकिन जैसा कि मैंने जाना और पढ़ा , दूर-दराज़ से आये ज्यादातर ब्लॉगर बिना किसी परिचय के ही लौट गए , जिससे उनमें काफी निराशा देखने को मिली !

अतिथि देवो भव-- सबसे पहला कार्य तो आने वाले प्रत्येक ब्लॉगर को यथोचित सम्मान के साथ वार्म-वेलकम दिया जाना चाहिए था ताकि लौटने के बाद ब्लॉगर कि स्मृति में वो सुखद यादगार हमेशा बनी रहे !

डॉ रूपचन्द्र शास्त्री जी के आलेख पर जो पढ़ा वह अत्यंत खेदजनक है ! एक वरिष्ठ ब्लॉगर अपमानित और ठगा सा महसूस करे यह हम सभी कनिष्ठ ब्लॉगर्स के लिए दुर्भाग्य कि बात है ! डॉ शास्त्री को समुचित सम्मान मिलना चाहिए था !

डॉ पवन मिश्र, कानपुर जी ने कुछ प्रश्न पूछे जो बेहद विनम्रता से पूछे गए थे , उसका उत्तर भी विनम्रता से दिया जाना चाहिए था , लेकिन अफ़सोस कि ऐसा नहीं हुआ ! आपस में ही एक दुसरे पर कानूनी कार्यवाई किये जाने कि धमकी कुछ अशोभनीय एवं खेदजनक लगी !

मंगलायतन पर मनोज जी ने , पवन जी को जो उत्तर दिए वे बहुत कटुता से भरे हुए थे ! यही वही उत्तर थोड़ी मिठास लिए हुए होते तो ब्लॉगर्स कि गरिमा बढती !

वो कहते हैं न कि -"फल आने पर डालियाँ विनम्रता से झुक जाती हैं "

महेंद्र श्रीवास्तव जी के आलेख से शत प्रतिशत सहमत हूँ ! उस पर आई टिपण्णी और प्रति टिप्पणियां भी सार्थक लगीं, बस एक ही बात खेद जनक लगी कि ज्यादातर टिप्पणीकारों ने महेंद्र जी के शिखा का नाम लिखने पर आपत्ति जताई , जो अनुचित लगी मुझे !

महेंद्र जी कि आपत्ति जायज़ है ! मंच पर आसीन शिखा हो अथवा वहां आसीन कोई अन्य कनिष्ठ ब्लॉगर, उसे शिष्टाचारवश अपने से वरिष्ठ ब्लॉगर को सम्मान देना चाहिए था ! मंच पर अपनी कुर्सी छोड़कर अपने से बड़े को आदर देने से कोई छोटा नहीं हो जाता ! यदि आयोजक से कोई भूल-चूक हो भी रही थी तो वह उपस्थित अन्य सम्मानित समूह अपने बडप्पन का परिचय दे सकता था !

आयोजक ने भले ही ब्लॉगर्स का सम्मान किया हो , लेकिन आयोजक समूह का सम्मान तो वहां शिरकत करने वाले सभी अतिथि ब्लॉगर्स के आगमन से ही हुआ ! अतः कोई भी आयोजन हो आयोजक को सम्मलेन में आने वाले प्रत्येक अतिथि का पूरे मनोयोग से स्वागत-सत्कार करना चाहिए , ताकि वे मधुर-स्मृतियाँ संजो सकें !

किसी भी आयोजन में सबसे अहम् होता है -- आयोजन का खर्चा ! इसके लिए यदि आयोजक इसका पूरा खर्चा नहीं वहन कर सकता तो उसे एक छोटी धन-राशि सभी आमंत्रित सदस्यों से लेनी चाहिए थी, ताकि किसी को भी खाने-पीने और ठहरने कि असुविधा नहीं होती ! सभी एक दुसरे से मिल-बैठकर परिचय प्राप्त कर सकते थे और नए सम्बन्ध बनते , जिससे आपसी मृदुता बढती ! और आयोजन कि सार्थकता द्विगुणित हो जाती !

कुछ आलेखों पर रश्मि प्रभा जी की अति निंदा की गयी है , जो अनुचित लगी ! अनावश्यक रूप से किसी को बदनाम करना बहुत गलत है ! यदि वे कार्यक्रम में उपस्थित न हो सकीं तो उसके बहुत से कारण हो सकते हैं ! हो सकता है वे अस्वस्थ रही हों !  किसी की उपस्थिति पर प्रश्न-चिन्ह  लगाना अशिष्ट  लगा !

अन्य कई आलेखों में चित्रों द्वारा इस आयोजन कि झलकियाँ अत्यंत मोहक लगीं !

पुनः आयोजक समूह, सम्मानित लेखक , लेखिकाओं एवं वहां उपस्थित सभी मित्र ब्लॉगर्स को ढेरो बधाई एवं शुभकामनाएं !

बस ध्यान रहे -- "भूल से भी कोई भूल हो ना"

Zeal

Wednesday, June 27, 2012

ब्लॉगर्स की दो कैटेगरी -- भैया के लाल जियें

ब्लॉगर को दो सरल समुदायों में वर्गीकृत किया गया है--एक दुखी रहने वाला, एक सदा सर्वदा मुस्कुराते रहने वाला।

अब ये आपके ऊपर है की आप खुश रहना चाहते हैं या फिर दुखित। जब इंटरनेट नहीं था तो भी दुखी थे ये लोग और जब तकनीक इतनी उन्नत हो गयी है तो भी दुखी हैं जनाब।

ब्लौगिंग तो एक वरदान की तरह है और ब्लॉगर्स हैं सबसे भाग्यशाली जो इस माध्यम से लिख, पढ़ और अभिव्यक्त कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस इस बात का है की कुछ ब्लॉगर्स , अन्य ब्लॉगर्स से अति दुखित रहते हैं। कभी उनके लम्बा लिखने पर उदास हो जाते हैं तो कभी उनके संक्षिप्त लिखने पर । कभी ज्यादा लिखने पर तो कभी न-लिखने पर। कभी टिप्पणियां अधिक होने पर तो कभी टिप्पणियों का विकल्प बंद होने पर। कभी मेल ज्यादा आने पर तो कभी मेल के ना-आने पर।

अब क्या किया जाए , इन्हें तो बस उदास होने का बहाना चाहिए। बारिश नहीं आई, तो भी उदास। आ गयी तो कहेंगे 'ओसारे' में क्यूँ बरसी। सर्दी आई तो बोले- "हांड कंपा रही है"। गर्मी आई तो बोले- "हवा नहीं चल रही"। आम दिया तो बोले- "गला है ज्यादा" । लीची दी तो बोले--"खट्टी है"।

इसके विपरीत ब्लॉगर्स के दुसरे समूह में मस्त रहने वाले खुशमिजाज ब्लॉगर्स आते हैं, जो हर-हाल में खुश ही रहते हैं, मस्त रहते हैं, जीते हैं और जीने देते हैं।

चाहे कोई सताए, चाहे गालियाँ दे, चाहे अपमानित करे, चाहे निंदा करे , चाहे सर चढ़ाये, चाहे टंकी चढ़ाये , वे तो बस- "मस्त राम मस्ती में , आग लगे बस्ती में" ।

नमन है ब्लॉगर्स की इस दूसरी कटागरी में आने वाले ब्लॉगर्स (लेखक/लेखिकाओं) को।

कुछ को तकलीफ है की वे लिखते ज्यादा हैं--

अरे यार, लिखे जाओ,
टाइम बचे तो पढ़े जाओ,
मन करे तो टिपिया दो ,
न करे तो आगे बढा दो।

दुखी और उदास रहने वाले ब्लॉगर्स के लिए मनभावन गीत समर्पित है---


मुंह छुपा के जियो, सर झुका के जियो, ग़मों का दौर भी आये तो मुस्कुरा के जियो.....

भैया के लाल जियें , हम तो सदा प्रसन्न रहने वाले ब्लॉगर हैं। आप किस समूह में आते हैं ?
Zeal

Wednesday, June 13, 2012

संयुक्त परिवार की तरह बिखरता ब्लॉगजगत।


आज ब्लॉगिंग करते हुए दो वर्ष पूरे होगये। इन दो वर्षों में बहुत कुछ देखा । सब कुछ बहुत नया लगा। महसूस भी हुआ की ज़िन्दगी के बहुत से रंग जो देखना बाकी था वो ब्लॉगिंग ने दिखा दिया।

नया-नया जब लिखना शुरू किया था तो लगा किसी रुपहली दुनिया में गए हैं। धीरे-धीरे भ्रम टूटता गया। हकीकत के धरातल पर पैर पड़ने पर एक और सुखद एहसास हुआ। लगा जयादा आत्म-निर्भर हो गए हैं। मायाजाल से छुटकारा मिल गया।

ब्लॉगिंग में लेखकों के मध्य बिखराव को जानने की कोशिश की तो पाया, लोगों को तकलीफ थी, इसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज्यादा उजली कैसे है? बस फिर क्या था, कुछ गैरजिम्मेदार लेखकों ने विष-वमन द्वारा सम्पूर्ण ब्लॉगजगत को विषाक्त करना आरम्भ कर दिया। और भी इस बढ़ते विष ने बहुत जल्दी लेखकों को अपनी चपेट में ले लिया। बहुतों को संक्रमित और व्याधिग्रस्त होते देखा। इस व्याधि से पीड़ित लोगों को खेमेबाजी का चस्का लग गया। अनेक खेमों को बनते और फिर से उजड़ते देखा।

निर्विकार आखों से देखते हुए पाया की हर लेखक कितना मासूम है , ब्लॉगिंग की मृग मारीचिका में बार-बार फंसता और निकलता है। लेकिन यही तो नियम है प्रकृति का। कीचड से गुजरेगा नहीं तो परिचित कैसे होगा जीवन की तल्खियों से।

ब्लॉगजगत के इन उतार-चढ़ाव से गुज़र कर बहुतों को तप कर कुंदन होते भी देखा।

आपको लगता है की आप बदलते नहीं हैं। तो ये आपका भरम है। लीजिये आईना देखिये और पहचानिए खुद को । आप खुद ही पायेंगे की आप कितने बदल गए हैं इन बारह महीनों में।

मैं खुश हूँ की आज मैंने ब्लॉगिंग में दो वर्ष पूरे कर लिए। इस सफ़र में कुछ अपनों का बहुत सुन्दर साथ और सहयोग रहा।

ह्रदय से आभार के साथ,

Zeal

Thursday, May 24, 2012

पलायमान ब्लॉगर्स

कोई भी क्षेत्र हो,पलायन तभी होता है जब व्यक्ति उस संस्था से, पद्धति से, अनियमितताओं से , गुटबाजियों से अथवा पक्षपाती रवैय्ये से निराश हो चुका होता है।

ब्लोगजगत में भी बहुत कुछ ऐसा घट रहा है , जिसके कारण अनेक अच्छे ब्लॉगर्स लेखन के प्रति उदासीन हो चुके हैं। बहुतों ने लेखन छोड़ दिया है और अनेक हैं जो पलायन के कगार पर हैं।

कुछ लोग हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं किसी एक ही ब्लॉगर के और उसे इतना हतोत्साहित करते हैं की वह यहाँ से पलायन करने को विवश हो जाए।

फिर उस ब्लॉगर की उस समय की कमज़ोर मनः स्थिति को भांपकर ये लोग उसके ताबूत में अंतिम कील भी ठोंक देते हैं उस पर अपमान जनक "टंकी चढ़ने" जैसा आलेख लिखकर।

कई ब्लॉग्स पर तो अश्लीलता और अभद्रता अपनी दुर्गन्ध से पूरा वातावरण दूषित कर रही है। फिर भी उस पर उमड़ने वाले तथा टिप्पणी करने को लालायित ब्लॉगर्स , विषय की गन्दगी को नज़र अंदाज़ करते हुए फिकरा कसने में कोई कसर नहीं छोड़ते । कुछ तो अनावश्यक रूप से भोले बनकर टिप्पणी की हाजिरी दे आते हैं , ताकि अमुक व्यक्ति उनके यहाँ भी आता रहे। किस गन्दगी में हो आये हैं , इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं होता।

इस बढती गन्दगी ने संजीदा लेखकों को उदासीन किया है और पलायन करने को विवश।

कुछ छोड़कर चले गए, कुछ ने टिप्पणी का ऑप्शन ही बंद कर दिया तो कुछ ने अपने ब्लॉग पर चुनिन्दा लोगों के लिए ही टिप्पणी का विकल्प रखा है।

बेहतर होगा यदि ब्लॉगर्स अपनी लेखनी के प्रति संजीदा और जिम्मेदार रहे।

Zeal

Friday, May 4, 2012

फिरदौस खान का थप्पड़ , अश्लीलता के पुजारियों के मुंह पर.

हमारा एक सवाल...
इंडिया टुडे में प्रकाशित कवर स्टोरी और इसकी तस्वीर का समर्थन करने वाले इंडिया टुडे के अगले अंक के लिए अपनी मां, बहन या बेटी की 'ऐसी' तस्वीर भेजेंगे...?

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अश्लीलता के पुजारी हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति का गला बेदर्दी से घोंट रहे हैं। पहले तो फूहड़ता से फिल्म इंडस्ट्री चलती थी केवल , लेकिन अब इस फूहड़ता ने ब्लॉग-जगत को भी संक्रमित कर दिया है। नारी को इंसान समझकर , प्रोडक्ट की तरह नुमाईश करते पत्र-पत्रिका और कुछ ब्लॉग अत्यंत घ्रणित कार्य कर रहे हैं।

ऐसे लोग अश्लीलता परोसने के बहाने ढूंढते रहते हैं। कभी अरूंधती राय की गिलानी के साथ न्यूड तस्वीर को कला के नाम पर समर्थन देखर तो कभी इंडिया टुडे की अभद्र तस्वीर को तुरुप का पत्ता बनाकर , अपने ब्लॉग की दूकान चलाते हैं।

धन्य हैं ऐसी घिनौनी मानसिकता वाले जो स्त्री का पग-पग पर अपमान करते हैं। ऐसे लोग ही समाज में विकृत मानसिकता को जन्म देते हैं। युवाओं को गलत दिशा में भटकाते हैं

जिस देश में नारायण दत्त तिवारी, मदेरणा और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे 'डर्टी' लोग सत्ता में होंगे वहाँ तो 'डर्टी-फिल्में' ही राष्टीय पुरस्कार की हक़दार होंगी।

शर्म आती है विद्या बालन जैसी अभिनेत्रियों पर जो चंद पैसों और सस्ती-शोहरत के लिए अपना जिस्म बेच रही हैं।

ऐसा ही कर रही है एक और महिला ब्लॉगर जो अश्लील साहित्य लिखने वाले ब्लौगरों के समर्थन में फिरदौस के एक वाजिब और अहम् सवाल का विरोध कर रही है। शर्म आनी चाहिए इस महिला को जो स्त्रियों की अस्मिता की रक्षा के लिए नहीं लडती बल्कि जहाँ देखो वहीँ, स्त्रियों के खिलाफ ही लडती है। यह महिला विषय से भटकाकर, व्यक्ति के विरोध में उतर आती है।

हमें पूरी ताकत से इस अश्लीलता और फूहड़पन का विरोध करना है। और स्त्री के सम्मान की रक्षा करने के साथ-साथ अपनी संस्कृति को भी बचाए रखना है।

जो भी पुरुष अपने मन को चंगा बताकर स्त्रियों की आपत्तिजनक तस्वीर लागायेगा कहीं भी , वहीँ पर उसकी माँ-बहन और बेटी की तस्वीर उसी दशा में लगाई जानी चाहिए, फिर देखेंगे इनके चंगे-मन का भूत कितनी जल्दी उतरेगा।


Zeal


Sunday, March 18, 2012

काजल कुमार और खुशदीप सहगल की रसीली बातें

ब्लौगरीय निराशा दूर करने के लिए कुछ रसीली बातें अति उपयोगी हैं...

काजल कुमार Kajal Kumar
Mar 17, 2012 04:41 AM
भगवतीचरण वर्मा जी की पंक्तियां हैं न...
हम दीवानों की क्या हस्ती,
आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले...

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नेकी कर...कुएं में डाल...​
​पोस्ट लिख...ब्लाग पर डाल...​
​​
​ये फंडा अपनाओगे तो रहोगे हमेशा ब्लागर खुशहाल...​

घन्यवाद इन उपयोगी फंडों का...Smiles...

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अविनाश जी पूछते हैं , मठाधीश हैं तो मठरानियाँ क्यों नहीं ? -- गजब का प्रश्न है , आनंद आ गया।

महिलाएं भला कब पीछे रही हैं किसी क्षेत्र में । एक से एक माफिया भी हैं और मठरानियाँ भी।

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वैसे यदि अपेक्षाओं को ख़त्म करके कोई व्यक्ति अपने तन मन धन से किसी कार्य में डूब जाए तो शेष सब कुछ गौड़ हो जाता है। कुछ भी नहीं इस पृथ्वी पर जो मन को विचलित कर सके। अपने मन के वैराग्य को बढ़ाते जाना और लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना ही सबसे सुन्दर विकल्प है।

जय श्री राम
जय महिषासुर मर्दिनी

जय हिंद
जय भारत
वन्दे मातरम्

Zeal

Thursday, December 15, 2011

ब्लॉगिंग निठल्लों का काम है क्या ?

ब्लॉग भ्रमण के दौरान कुछ नन्हे-मुन्ने बालकों को चिंतित देखा! वे कह रहे थे की वे व्यर्थ ही हिंदी ब्लॉगिंग में सेवारत हैं! न तो उन्हें कोई पढता है, न ही टिपण्णी करता है! फिर क्यूँ इस अवयस्क पाठकों के लिए अपना कीमती वक़्त जाया किया जाया ?

हे श्रेष्ठ नर-नारियों एवं मनु की संतानों , श्री कृष्ण ने कहा है, कर्म किये जाओ, फल की इच्छा मत रखो! अतः ब्लौग-लेखन अनवरत जारी रखो !

ब्लौग लेखन निठल्लों का काम नहीं है ! मुझे तो चिराग लेकर ढूँढने पर भी कोई निठल्ला न मिला! सभी लगे हुए है अपने-अपने कर्मों में यथासंभव ! यदि कोई केवल चिकित्सा करे अथवा अभियांत्रिकी अथवा वकालत अथवा टीचिंग अथवा बाल-बच्चे देखे तो वह सार्थक कहा जाएगा ? लेकिन यदि इन्हीं कामों के साथ-साथ कोई अपने विचारों द्वारा समाज को एक सकारात्मक योगदान और अपने अनुभवों द्वारा एक समाधान दे रहा है तो वह निट्ठल्ला कहलायेगा ?

ब्लॉगर्स अपने कर्तव्यों को निष्ठां से निभाने के बाद , अपना कीमती वक़्त लेखन में लगा रहे हैं , अपने खून पसीने से अपने विचारों को लोगों तक पहुंचा रहे हैं और आप हैं की ब्लॉगिंग को निठल्लों का काम कह रहे हैं ?

पशु से भिन्न है इंसान क्यूंकि वह चिंतन करता है ! ये चिंतन यदि मस्तिष्क में ही रह जाए तो व्यर्थ है अतः लेखन के माध्यम से इसे बहुत से लोगों तक पहुंचना ही चाहिए !

हर व्यक्ति अपनी रूचि और ज्ञान के अनुसार लिख रहा है! पाठक भी अपनी रूचि के अनुसार विषय ढूंढ लेते हैं ! यही विविधता ही तो ब्लॉगिंग की रोचकता बनाए रखती है ! लोग एक-क्लिक में ही देश विदेश , राजनीति और कुटिल नीति से रूबरू हो जाते हैं ! अन्य लोगों के विचार पढ़कर हमारे विचारों को भी आयाम मिलता है !

अतः ब्लॉगिंग निठल्लों का काम है ऐसा लिखकर ब्लॉगर भाई-बहनों को अपमानित न करें !

जिन्हें लगता है की ब्लॉगिंग व्यर्थ है वे शायद अपने लिखे आलेखों से ही बोर हो गए होंगे! जब स्वयं का लिखा व्यर्थ लगने लगे तो निसंदेह ब्लॉगिंग बंद कर देनी चाहिए , लेकिन साथी ब्लौगर जो एक ऊर्जा के साथ ब्लॉगिंग कर रहे हैं उन्हें निठल्ला कहकर उनका अपमान न करें ! अपितु उनके योगदान को सराहें!

हिंदी ब्लॉगिंग तो हमारे देश में एक ज़ोरदार क्रान्ति की तरह है , जिसके माध्यम से आज सरकार गिराई जा सकती है और नेताओं की नाक में नकेल डाली जा सकती है! इस ब्लॉगिंग के माध्यम से , फेसबुक आदि से , ट्विटर से सिब्बल महोदय तक घबरा गए हैं तो आप खुद ही समझिये इसकी महिमा !

मेरे विचार से ब्लॉगिंग बुद्धिजीवियों का काम है! इंसानों का काम है जो चिंतन करता है! पशु एवं निठल्ले इस महती कार्य को अंजाम नहीं दे सकते!

अपने विचारों को एक बड़े समुदाय को प्रेषित करने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ हैं ब्लॉगिंग का माध्यम ! अब हम अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के मोहताज नहीं हैं अपने विचारों को संप्रेषित करने के लिए!

बड़े-बड़े विमर्श के लिए यह एक सस्ता एवं सुलभ माध्यम बन गया है! इसके फायदे अनेक हैं ! और फिर यदि फायदों को परे रख कर निस्वार्थ ब्लॉगिंग की जाए तो हम कर्मशील भी रहेंगे और फल न लगने की अवस्था में निराश भी नहीं होंगे !

अतः निराश ब्लॉगर्स को हताश न होने की सलाह दी जाती है तथा ऊर्जावान ब्लॉगर्स के लिए "Hats off "

जय ब्लॉगर्स !
जय हिंदी-ब्लॉगिंग !

Sunday, October 9, 2011

ब्लॉगरीय मानसिकता - (खरी-खरी)

ब्लॉगर होकर ब्लॉगरीय मानसिकता को समझा जाए तो ब्लॉगिंग करना व्यर्थ है। एक वर्ष, चार माह के लेखन के दौरान अनेक अनुभव किये , जिसमें यथार्थ के दर्शन करने का अवसर मिला। सत्य इतनी परतों में दबा-छुपा होता है की उसका अनावरण आसानी से नहीं हो पाता है ऐसे में आवश्यकता है इस बात की ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हों जिनसे भेंड की खाल में छुपे भेड़ियों की पहचान की जा सके।

लेखन कार्य भी समाज का एक आम नागरिक ही करता है। अतः लेखकों और टिप्पणीकारों के विचार ही हमारे समाज का दर्पण हैं। जो चुप रहते हैं और तटस्थ रहते हैं , वे सबसे बड़े अपराधी हैं और तटस्थ रहने का गुनाह अक्षम्य है। वे स्वयं को शांतिप्रिय की श्रेणी में रखते हैं , लेकिन सच तो यह है वे भीरु हैं। सत्य की परख करने की क्षमता ही नहीं है उनमें। सत्य को जान लेने बाद भी किसी को खो देने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। इनसे भी बना के रखो , उनसे भी बना के रखो कहीं कोई टिप्पणीकार खो जाए, इसी उलझन में रहते हैं।

एक साधे सब सधै , सब साधे सब जाए

  • ब्लॉगजगत में कुछ लोग विचारों के मिल पाने की दशा में लेखक के साथ व्यक्तिगत द्वेष पाल लेते हैं। अनायास ईर्ष्या करने लगते हैं और अनावश्यक आलोचना में लिप्त हो जाते हैं। ऐसी मानसिकता कमज़ोर चरित्र को इंगित करती है। उनके विष-वमन से उनका ही भेद खुलता है , अन्य किसी की कोई हानि नहीं होती।
  • दुसरे वे जो अपने अन्दर की ईर्ष्या और द्वेष को मार नहीं पाते और निरंतर उसे पोषित करते रहते हैं। जैसे ही कोई मौका मिलता है , सूंघते हुए वहां पहुँच जाते हैं और संचित द्वेष का विष-वमन कर आते हैं ऐसे लोग 'भाड़े के टट्टू' श्रेणी में आते हैं। इनका कोई चरित्र नहीं होता। ऐसे लोग टिप्पणी विषय पर नहीं करते अपितु व्यक्तिगत भड़ास निकालकर अपने अहम् की पुष्टि करते हैं।
  • कुछ महान लेखकों के पास जब विषय चुक जाते हैं तो वे दूसरों के ऊपर आलेख लिखते हैं, जैसे-- " टंकी आरोहण" अथवा बिना सन्दर्भ के दूसरों को तिरस्कृत करने के तुच्छ उद्देश्य से आलेख लिखकर टिप्पणी पाने की लालसा रखते हैं। ऐसे लोग सिर्फ 'मसाला' ढूंढते हैं और औने-पौने में लेख लिखकर instant popularity पा जाना चाहते हैं।
  • कुछ लोग संतों पर लघु कथा अनुवादित करते-करते खुद को ही संत समझ बैठते हैं। प्रवचन करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए बहुत ज़रूरी है की वे इस झूठे भुलावे से बाहर निकलें।
  • कुछ लोग अपनी टिप्पणियों में बेशर्मी से भड़ास निकालते हैं और अपेक्षा रखते हैं की उनकी टिप्पणी प्रकाशित कर दी जाए। ऐसे लोग स्नेह के पात्र ही नहीं होते। सच्चाई सामने आने पर इनसे दूरी बना लेना ही बेहतर विकल्प है।
  • कुछ लोग बेहद छुई-मुई टाइप के होते हैं हर दूसरी पोस्ट के बाद बुरा मानकर नाराज़ हो जाते हैं और आपके आलेखों पर आना बंद कर देते हैं। बस चोरी-चोरी पढ़ते रहते हैं आपको। ऐसे लोगों की संवेदनशीलता का सम्मान किया जाना चाहिए , और उनका नाज़ुक दिल कहीं दुःख जाए , इसलिए उनके आलेखों पर आपको भी अनुपस्थित ही रहना चाहिए। ताकि वे शान्ति से जी सकें।
  • दूल्हा बिकता है बोलो खरीदोगे? -- SORRY , SORRY -- ब्लॉगर बिकता है बोलो खरीदोगे ? ......एक-एक टिप्पणी से ब्लॉगर्स की खरीद-फरोख्त आसानी से की जा सकती है। ( बेहद अफसोसजनक है ये)
  • कुछ उम्रदराज़ ब्लॉगर्स को अनायास ही अपना सिंघासन डोलता हुआ लगता है और वे अपने से कमउम्र लेखकों को लेखन छोड़ने के लिए बाध्य करके अपनी कलुषित मानसिकता को उजागर करते हैं। ऐसे लोगों के लिए बस इतना ही की थोडा सा बडप्पन लायें खुद में। इनके 'भय' का कोई इलाज नहीं।
  • कुछ लोग पल में तोला , पल में माशा ...क्या कहें ऐसों को ?
  • कुछ लोग ( so called शांतिप्रिय) , इतने confused रहते हैं की कभी सत्य के आस-पास फटकते ही नहीं , उन्हें डर होता है की वे कहीं इस अग्नि में भस्म ही ना हो जाएँ। अजी जनाब , हवन करने में उँगलियाँ तो जलती ही हैं। वे सोचते हैं, टिप्पणी करूँ की करूँ ?अच्छा चलो कोई चाँद -सितारे वाला आलेख आएगा तो टिप्पणी कर देंगे ताकि अमुक ब्लॉगर मेरे आलेखों पर आता रहे। धिक्कार है !...हो सके तो सत्य को पहचान कर अच्छाई की रक्षा के लिए आवाज़ बुलंद कीजिये। किसी को खो देने के फेर में मत पड़िए। कुछ भी शाश्वत नहीं है जन्म देने वाले माता-पिता भी छोड़ कर चले जाते हैं , इस कर्मभूमि पर संघर्षरत रहने के लिए।
  • कुछ लोग एक अलग ही दुनिया में रहते हैं। आस-पास देश और समाज में क्या घट रहा है इससे कोई सरोकार नहीं होता है उन्हें वे बस लिखे जा रहे हैं ऐसे आलेखों में विचारों की शून्यता होती है। दिल और दिमाग को जो मथ दे , उसका अभाव दिखता है वहां।
  • अंत में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सत्य ही बोलते हैं , सत्य ही लिखते हैं और सत्य की पहचान करने में सक्षम होते हैं। ऐसे व्यक्तियों में विशिष्ट चारित्रिक दृढ़ता होती है ऐसे लोग निर्भय और निर्भीक होते हैं ऐसे लोग सत्य के मार्ग पर चलते हुए अच्छाई का ही साथ देते हैं।

सीने में एक आग जलनी चाहिए। ये आग ही हमें मन से , वचन से और कर्म से शुद्द करती है। यदि ह्रदय में कोई आंच ही होगी तो तप कर कुंदन होने का अवसर नहीं मिलेगा। यही आग हमें सत्य के मार्ग पर आगे ले जाती है। यही आग सत्य जैसे कठिनतम मार्ग पर हमारी मुलाक़ात सत्यवादियों से करवाती है।

कमज़ोर पड़ना, व्यथित होना , पलायन के विचारों से घिर जाना आदि मानवीय कमजोरियां हैं यही हमें मनुष्य बने रहने का अवसर प्रदान करती है। लेकिन ऐसे पलों में हमारे शुभचिंतक और हमारे अराध्य हमारे साथ होते हैं हमें उसी ऊर्जा से वापस बुलाते हैं और अपने बड़प्पन का परिचय देते हैं।

गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में ,
जो उठकर खड़ा हो जाए उसे "ब्लॉगर" कहते हैं

Zeal

Friday, August 5, 2011

दिलों में सम्मान क्या मुलाक़ात के बाद उपजता है ?


आजकल ब्लॉगर्स एक दुसरे से मुलाक़ात कर रहे हैं ! देश-विदेश, शहरों और राज्यों की दूरियां छोटी हो रही हैं ! दिल मिल रहे हैं ! परस्पर प्रेम वर्षा हो रही है और मुलाकातियों के हृदयों में एक-दूजे के लिय सम्मान उफान पर है ! उनके ब्लौग पर आलेख आ रहे हैं एक दुसरे की शान में ! प्रसन्नता की बात है , लेकिन ऐसा प्रतीत होता है जैसे जो लोग मुलाकातों से वंचित रह जाते हैं उनका अस्तित्व ही नहीं ! मुलाकातियों का गुट बन जाता है , जिसमें अन्य ब्लॉगर्स उपेक्षित रहते हैं ! उनके लेखन का कोई सम्मान नहीं और उनसे किंचित द्वेषपूर्ण व्यवहार भी होता है !

  • प्रश्न यह है की क्या सम्मान लेखन को मिलना चाहिए या व्यक्ति को ?
  • आत्मीयता सिर्फ मुलाकातों पर निर्भर है क्या ?
  • क्या यह गुटबाजी को तो बढ़ावा नहीं दे रहा ?
  • क्या यह अन्य ब्लॉगर्स की उपेक्षा का कारण तो नहीं बन रहा ?
  • क्या इसके कारण लेखक का फोकस बेहतर विषयों से हटकर गैर जरूरी सोशल-नेटवर्किंग पर तो नहीं केन्द्रित हो रहा ?

ऐसी मुलाकातों से ब्लॉगर्स की स्वतंत्रता छिन जाती है , वे एक दुसरे की प्रशंसा करने को बाध्य हो जाते हैं ! टिप्पणियों और आलेखों से इमानदारी लुप्त हो जाती है ! प्रायः वे एक दुसरे को महिमामंडित करते हुए दिखाई देते हैं ! समझ भी नहीं आता की ऐसे आलेखों पर टिपण्णी क्या लिखी जाए !

मुझे लगता है , मेल-मिलाप हो, प्रेम रहे , सम्मान रहे लेकिन अन्य ब्लॉगर्स को उपेक्षित होने का अहसास न करायें , गुटबाजी न करें और बेहतर लेखन के लिए सम्मान बना रहे!

ब्लॉगर्स मीट में हिंदी ब्लौगिंग के विकास और स्थापना से जुड़े विषयों पर चर्चा होनी चाहिए और उसके क्या परिणाम और सुझाव आये इनकी चर्चा होनी चाहिए आलेखों पर !

Zeal

Thursday, February 17, 2011

छुटकी टिप्पणी , बडका ब्लॉगर

ये राधिका भी ! जब देखो तब कहती है - " क्या दिव्या भारी भरकम पोस्ट लगा दी , पका देती हो तुम तो तुम्हारे लेख पढ़कर तो नींद ही नहीं आती , Diazepam की गोली खाकर नींद बुलानी पड़ती है " तो समर्पित है आज की हलकी-फुलकी पोस्ट राधिका के नाम

जैसे जैसे उम्र बढती है , बुढापा घेर लेता है लोग खाना कम कर देते है , सोचते हैं , पचा नहीं पाऊंगा चटक-मटक कपडे कम पहनता है , सोचता है लोग क्या कहेंगे पार्टीज़ में कम जाता है , डरता है कहीं समाज हँसे मुझ पर घर में बूढी कुर्सी पर खुद ही बैठने लगता है , डरता है कहीं कोई टोक दे मुख्य सोफे पर बैठने से

भाई ना! डरिये नहीं जीने के यही चार दिना , जिंदगी चले प्यार बिना धन-दौलत बिना चले मगर , जिंदगी ना चले यार बिना इसलिए खुद कों , खुद ही अकेला मत कीजिये मिल कर रहिये बुज़ुर्ग कम हों तो युवाओं के साथ हाथ मिलाइएफिर देखिये ज़िन्दगी आप पर किस तरह मेहरबान होती हैउनकी ऊर्जा से खुद कों चिर-युवा बनाइयेअपने अहम् कों ताख पर रखकर युवाओं और बच्चों की मस्ती भरी अटखेलियों का आनंद उठाइए और निरंतर ऊर्जान्वित रहिये

अरे हम तो भटक गए , बात हो रही ब्लॉगर्स की हाँ तो जनाब जैसे जैसे एक ब्लॉगर बड़ा होता जाता है , उसकी टिप्पणियां छोटी हो जाती हैं ऐसा क्यों ? अरे भाई वो डरने लगता है -

  • कहीं कुछ कम ज्यादा लिख दे
  • कहीं कोई विवाद हो जाए
  • कहीं कोई छुटके ब्लॉगर का मान बढ़ जाए
  • कहीं छुटंकू का TRP बढ़ जाए
  • कहीं छुटकू ज्यादा भाव खाने लगे
  • कहीं मेरी महिमा घटने लगे .
  • सबको पता चल जाएगा की मैं इसे पढता हूँ
  • मैं दूसरों कों तो टिप्पणी करने से नहीं रोक सकता , लेकिन अपनी एक टिप्पणी से तो इसको वंचित कर ही डालूँ
  • बडके बिलागर की चार पोस्ट पर टिपण्णी करो , तब आयेंगे गरीबों की एक पोस्ट पर । ४: १ का रेशिओ । और छुटकू उसी में हो जायेंगे मगन कि तारनहार आये हमरे द्वार । लगेंगे गाने , आभार , आभार , आभार ।
  • कभी कभी तो राधिका जैसे बडके ब्लॉगर दांत भींचे लौट जाते हैं , और छुटकी टिप्पणी भी नहीं देते धत तेरे की , ऐसा भी क्या गुमान
  • कभी-कभी तो बडके ब्लॉगर इतनी microscopic टिप्पणी देते हैं की हम उतने micro ( सूक्ष्म) स्तर तक सोच ही नहीं पाते और उनके monosyllable ( इकलौते शब्द) में व्यक्त अनेकार्थों कों समझ ही नहीं पाते
  • कभी-कभी वो invisible ink में लिखते हैं , जो कमेन्ट बॉक्स में नज़र ही नहीं आती वो आते हैं , पढ़ते हैं, होठों ही होठों में बुदबुदाते हैं और बिना चाय-पानी , दुआ-सलाम के चले जाते हैं।
  • कभी-कभी बड़का ब्लॉगर घबराते हैं की कहीं उनकी टिप्पणी भीड-भाड़ में खुवाय जाए , इसलिए भी खुदकों अलग थलग ही रखते हैं।
  • जाने कौन कौन से डर पाले हैं , मन में डरिये मत ! लिख डालिए ! दर्दे दिल। हाले मन। मन की हलचल ! याँ फिर भड़ास टिप्पणी तो आखिर टिप्पणी है लेखक का मनोबल ही बढ़ाएगी , घटाएगी नहीं और यकीन मानिए टिप्पणी लिखकर आप बडके से छुटके ब्लॉगर कदापि नहीं बनेंगे बल्कि आपकी शान में एक और feather बढ़ जाएगा
थोडा सा प्रवचन झेलेंगे क्या ?

Food chain का नाम तो सुना ही होगा एक सीधा खड़ा हुआ शंकु ( upright pyramid)होता है , जिसमें ढेरों टिड्डे एक साथ दल बनाकर जीवन का मज़ा लेते हैं , लेकिन शिखर पर बैठा शेर अकेला होता है वो राजा है , उसकी जी-हुजूरी करने वाले असंख्य होते हैं , लेकिन दोस्त कोई नहीं होता

corporate world की बात करें तो शीर्ष पर बैठा CEO , नितांत अकेला पड़ जाता है जीवन की हलकी-फुलकी बात किससे करे ? अरे बड़ा होने का खामियाजा तो बड़े लोग ही जानते है

तनहा-तनहा हम रो लेंगे , महफ़िल-महफ़िल गायेंगे ..

मुई राधिका मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी पूछती है - " दिव्या तुम छुटकी हो या बडकी बिलागर ?

हमने कहा -"अरी मूरख , इतनी बड़ी-बड़ी टिपण्णी लिखती हूँ की पढने वाला भी पक जाए " दिल से लिखती हूँ दिल से। "एक हाथ से लेती हूँ दोनों हाथ से देती हूँ" ( सौजन्य IDBI Bank ) इसलिए छुटकी बिलागर हूँ छुटकी ! और हमेशा छोटे ही बने रहना चाहती हूँ।

"कल और आयेंगे नगमों की , खिलती कलियाँ चुनने वाले ,
मुझसे बेहतर लिखने वाले , तुमसे बेहतर पढने वाले ....

इसलिए जी भर के लिखो , लेख भी और टिपण्णी भी आपके शब्द ही आपकी पहचान हैं।

वैसे कोशिश करती हूँ - "कम खर्च बालानशीं " की तर्ज पर संक्षेप में लिखकर काम चलाया करूँ पर क्या करूँ ये निगोड़ी उंगलियाँ मानती ही नहीं कहती हैं - "ये दिल मांगे मोर "

आभार