Monday, October 24, 2011

क्या साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर जिन्दा हैं ?

जी हाँ, जीवित ही नहीं अमर भी हैं । देश और धर्म की रक्षा करने वाली वीरांगनायें हर दिल में जीवित रहती हैं और अपनी सशक्त क्रांतिकारी आवाज़ से करोड़ों लोगों को उद्वेलित करती हैं। ऐसे लोगों के मन में अपने देश को ऊँचाइयों की और ले जाने का जो जज्बा होता है वह विरले ही किसी में होता है। धन्य है इस भारत की माटी जहाँ कुटिल राजनीतिज्ञों को ललकारने वाली वीरांगनायें भी जन्म लेती हैं।

आइये हम इस वीरांगना के अच्छे स्वास्थ के लिए प्रार्थना करें और इन्हें सरकार के चंगुल से बचाने के लिए प्रयत्न करें। आज देश को ऐसी ही देशभक्त नारियों और वीर पुरुषों की ज़रुरत है जो राष्ट्र की रक्षा करने के लिए अपनी जान की परवाह किये बिना सतत प्रयत्नशील हैं और कटिबद्ध हैं।

जो लोग कुत्सित विचारों को धारण किये हुए हैं और अजमल कसाब को बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं उन पर थू है। इस देश को आतंकवादियों का शरण स्थल नहीं बनने दिया जाएगा। यहाँ सिर्फ सच्चे , इमानदार और देशभक्त लोगों को जन्मने और जीने का अधिकार दिया जाएगा।

साध्वी प्रज्ञा जैसी वीरांगनाओं के अस्तित्व को कभी मिटाया नहीं जा सकता । करोड़ों दिलों में इस जज्बे की मशाल है। एक नहीं अनेक साध्वी प्रज्ञायें हैं इस धरती पर । किस-किस को मिटायेंगे ये ? हर दिन इस विशाल भारत भूमि पर एक साध्वी का , एक वीरांगना का जन्म होता है।

साध्वी प्रज्ञा के अच्छे स्वास्थ्य की कामना कीजिये ताकि वे उसी दम-ख़म के साथ वापस आकर देश के लिए लडाई लड़ सकें। आज भारत को ज़रुरत है वीर सपूतों की और वीरांगनाओं की।

शहीदों की जय
जीवित देशभक्तों की जय
भारतमाता की जय
वन्देमातरम !

Zeal

Wednesday, October 19, 2011

पवित्र , पावन , कल्याणकारी क्रोध का महात्म्य --महिषासुरमर्दिनी और ईश्वर चर्चा भाग ११

बच्चों का क्रोध जिद्द होता है, यदि नहीं करेंगे तो उन्हें इच्छित वस्तु नहीं मिलेगी। कहीं प्यार भरा क्रोध होता है (माता-पिता और शिक्षकों का क्रोध)। कहीं आपस में द्वेश्जनित क्रोध होता है। कहीं अहंकार के स्वरुप अनायास ही मन में क्रोध अपना स्थान बना लेता है। कहीं ईर्ष्या क्रोध का कारण होता है जैसे पाकिस्तानी आतंवादियों का क्रोध। समाज में फैली कुरीतियों पर, दीन हीन पर हो रहे अन्याय को देखकर, भ्रष्ट आचरण को देखकर और अपने ऊपर हो रहे शोषण को देखकर भी क्रोध न करना नपुंसकता है। .

लेकिन एक क्रोध पवित्र भी होता है , जहाँ क्रोध की अग्नि में भस्म होकर समस्त दैत्य और दानवों का विनाश होता है, क्रोध करने वाले का नहीं। जब-जब जगत में दत्यों और पापियों का प्रादुर्भाव बढ़ा है, तब-तब देवों, संतों और वीरों ने क्रोध करके ही दुष्टों का संहार किया है।

चंड , मुंड, शुम्भ, निशुम्भ, और रक्तबीज जैसे दैत्यों का मर्दन करने के लिए देवी अम्बिका को क्रोध करना पड़ा। रावण की भूल के लिए राम को युद्ध और कौरवों की दृष्टता के लिए महाभारत हुयी।

अतः असुरों के विनाश के लिए और आम जनता की रक्षा के लिए संतों को क्रोध करना ही पड़ता है , कोई अन्य विकल्प नहीं है। क्रोध वीरता का भी प्रमाण है और मनुष्य के अन्दर संचारी भावों का दोत्तक भी है। देशभक्तों में देश की रक्षा के लिए जो अग्नि जलती है , वही गद्दारों को पहचान करके उनसे युद्ध करके देश की रक्षा करती है। यह आक्रोश है । देशभक्ति का जज्बा है। जो अनुकरणीय है । यह क्रोध वीरों का आभूषण है। यदि यह जज्बा नहीं होगा तो धरती वीरों से विहीन हो जायेगी। सिर्फ उपदेशक बचेंगे और श्रोता। कर्मठ लोगों का अकाल हो जाएगा।

मन करे सो प्राण दे , जो मन करे तो प्राण ले
वही तो एक सर्वशक्तिमान है
कृष्ण की पुकार है ये भागवत का सार है
की युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है
कौरवों की भीड़ हो या पांडवों का नीड हो
जो लड़ सका वही तो बस महान है।

आज भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद और नेताजी जैसे संतों के पवित्र क्रोध , जो वीरता से परिपूर्ण है , की आवश्यकता है। चंड-मुंड , रक्तबीज और महिषासुर जैसे दानवों के विनाश के लिए चामुण्डा, काली और महिषासुरमर्दिनी की ज़रुरत है।

हे देवी सर्वभूतेषु , शक्ति (क्रोध) रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नमः

Zeal

Monday, October 17, 2011

जब नेतृत्व का भार हो स्वयं पर तो अपनी जिम्मेदारी समझिये.

महात्मा गांधी ने निसंदेह राष्ट्र के लिए एक पिता की भूमिका निभायी लेकिन उनकी कुछ भूलों का दुष्परिणाम आज भारत की निर्दोष जनता भुगत रही है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के लिए ह्रदय में अपार सम्मान होते हुए भी मन में एक प्रश्न आता है .....आखिर क्यूँ किया उन्होंने ऐसा ? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के अनुकरणीय हिस्से को धारण करिए , लेकिन उनसे हुयी भूलों की पुनरावृत्ति मत कीजिये। सिक्के के दोनों पहलुओं को जानिये और स्वविवेक से आने वाले समय में राष्ट्रहित के लिए निर्णय लीजिये। एक नज़र यहाँ और यहाँ भी ...
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1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में
थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए।
गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।

2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व
गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं,
किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग
को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों
को आतंकवादी कहा जाता है।

3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम
लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते
हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी
केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग
1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस
हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में
वर्णन किया।

5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी
श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी
प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को
उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम
एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

6.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द
सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

7.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम
बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं
दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा
अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर
दिया गया।

10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से
कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर
रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।

11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु
गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक
में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ
पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था
कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की
सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।

14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय
पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के
सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त
करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की
मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब
अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व
बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर
किया गया।

16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व
माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का
परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने
को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के
लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे
दी गयी।

17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया

18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार
उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया , जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है

.19. क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़ ?????
विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू
ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी…मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५
टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस
समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को
मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा….फिर पुलिस ने मजबूर
हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया…. और वो हिंदू— गाँधी
मरता है तो मरने दो —- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे…,,,
रिपोर्ट — जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट….. फॉर गाँधी वध क्यो ?

२०. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह
करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी
लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे
जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह
अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी
थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी
लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी।
उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी
दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के
सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद
दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी
राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधी ने दबाव बनाया
होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर
उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा
नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता

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Friday, October 14, 2011

मेरे देश की धरती गद्दार उगले , उगले रोज़ मक्कार .....

प्रशांत भूषण ने देश को शर्मसार किया , देशद्रोह किया , हमवतनों के साथ गद्दारी की । अखंड भारत को खंड -खंड करने का आवाहन किया। ये बुद्धजीवी अपनी बुद्धि क्या दरिया में बहा आते हैं? भारत का हित किसमें है , क्या यह भी नहीं जानते । ज्वर से पीड़ित होकर जैसे प्रलाप होता है , वैसे ही प्रशांत भूषण और अरुंधती आदि का अनर्गल प्रलाप होता रहता है समय-समय पर।

देश को दीमक की तरह चाट रही कांग्रेस ही इन अनर्गल प्रलापों की जिम्मेदार है। कांग्रेस से ज्यादा खतरनाक हैं कांग्रेसी मानसिकता वाले भारतीय। दोहरा चरित्र इनकी पहचान है। मासूम , निर्दोष और भोली जनता का समर्थन प्राप्त करने के बाद ये पूरी ताकत के साथ आम जनता के विश्वास का गला घोंटते हैं।

हमारे देश की अकर्मण्य और भीरु सरकार कसाब जैसे आतंकवादियों को पालती पोसती है , लेकिन साध्वी प्रज्ञा जैसे देशभक्तों को सरकारी अस्पताल में तिल-तिल मरने को मजबूर करती है। यहाँ संतों और जनता को आधी रात में मरवाया जाता है। बहिन राजबाला , निगमानंद और अरुण दास जैसे देशभक्त रोज़ ही शहीद होंगे जब तब तक बिना रीढ़ की हड्डी वाले भूषण हमारे देश का आभूषण बनेंगे।

जिन वीरों ने प्रशांत भूषण को उनके गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य के लिए पिटाई की , उनको नमन। उन्होंने भारत की मिटटी में जन्म लेने का ऋण अदा कर दिया। जिन्दा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं। दुष्टों, भ्रष्टों, गद्दारों और मक्कारों को सजा तुरंत दे देनी चाहिए। सरकार और अदालतों से न्याय की उम्मीद व्यर्थ है।

आज देश को ज़रुरत है शहीद भगत सिंह जैसे वीरों की नयी खेप की। वतन पर मर मिटने वालों देशभक्तों की । अखंड भारत का स्वप्न देखने वालों की । दुश्मन मुल्कों के नापाक इरादों को धूल चटाने वालों की, देश के साथ गद्दारी करने वालों की नाक सड़क पर रगड़ देने वालों की ।

आज ज़रुरत है नेताजी जैसे वीरों की और एक ऐसी फ़ौज की जो गद्दारों के हौसले पस्त कर दे और अकर्मण्य सरकार को उखाड़ फेंके। एक ऐसी फ़ौज जिसमें सिर्फ इमानदार , निस्वार्थ , निडर , निर्भीक और देशभक्त नागरिक हों।

जय हिंद !
जय भारत !

भारत का स्वाभिमान बचा रहे।
भारत की अखंडता बनी रहे।
भारतवासियों का विश्वास बना रहे ।

Zeal

Monday, October 10, 2011

तटस्थता और सुकून ....

मेरी चिर-परिचित सहेली राधिका ने कहा- "दिव्या यदि मैं तुम्हारा साथ दूँगी तो रेवती मुझसे दूर हो जाएगी और इस तरह तो मैं अकेले पड़ जाउंगी । आखिर मैं भी तो एक सामाजिक प्राणी हूँ। इसी समाज में रहना है , तो हर किसी के साथ निभाना ही होगा वर्ना मैं अकेले कैसे जी सकुंगी ...और फिर मुझे तो किसी ने कुछ कहा नहीं है, मुझे तो किसी ने गाली नहीं दी , फिर मैं क्यूँ खुद को मुसीबत में डालूँ। और फिर मेरे आलेख तो हमेशा ऐसे होते हैं की लोग वाह-वाह ही करेंगे, फिर मैं क्यूँ तुम्हारी खातिर अपनों को खो दूँ ? "

राधिका की बात तो सही है। गैरों के कष्ट से खुद को क्यूँ व्यथित किया जाए। सही तो किया राधिका ने तटस्थ रहकर। आजकल सामाजिकता और औपचारिकता ही तो निभाई जाई है। जब तक सब ठीक हो तो 'बतरस' लो , प्रेम लो , स्नेह लो और जब कोई कष्ट में हो तो तटस्थ रहो।

वाह रे दोस्ती ! धन्य हो राधिका !

खैर ऐसी समस्या बहुतों के सामने आती होगी अतः इस विषय पर भी लिख देना उचित ही समझा । मन में आये विचारों को स्थान मिलना ही चाहिए ब्लॉग में।

मेरे विचार से कभी भी किसी का सगा बनने का दावा नहीं करना चाहिए । और यदि सगे बनते हैं तो आड़े वक़्त पर साथ भी देना चाहिए। वरना सब दिखावा है , मौकापरस्ती है । भावनाओं के साथ खिलवाड़ है ।

यदि निभाने की ताकत न हो तो रिश्तों को औपचारिक ही रखना चाहिए , तटस्थ बने रहने में ही भलाई है ।

लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूँ। तटस्थता इंसान की कमजोरी ज़ाहिर करती है। तटस्थ रहकर आप अपने मित्र को तो खो ही देते हैं । आप इस मनभरोसे में रहते हैं की चलो अच्छा हुआ दोनों से सेटिंग कर रखी है। लेकिन यकीन जानिये आप दोनों के साथ कभी नहीं निभा सकते। आपका मित्र चुपचाप बिना आपसे शिकायत करे आपसे दूर चला जाएगा।

और जब तक आपकी तटस्थ बने रहने की आदत बनी रहेगी आपका कोई भी मित्र नहीं बन सकेगा। आप अकेले ही रहेंगे । मात्र औपचारिक और सामाजिक। सब ऊपर-ऊपर का बचा रहेगा। अन्दर कुछ भी शेष न रहेगा।

तटस्थता कभी भी सुकून नहीं देती । वह अपनों के साथ घात करने का अपराध बोध कराती है। तटस्थ व्यक्ति केवल एक स्थिति में ही सुकून से जीता है , जब की वह दोनों के ही साथ घात कर रहा हो।

दुनिया में प्रतिक्षण घट रही घटनाओं में जहाँ दो पक्ष होते हैं , वहां दोनों ही सही अथवा दोनों ही गलत नहीं हो सकते । एक की गलती तो स्पष्ट दिखती है। फिर दुविधा कैसी ? जो सही लगे उसका साथ दीजिये ...निडर और निर्भय होकर।

तटस्थता कोई विकल्प नहीं । और तटस्थता को निष्पक्षता का नाम कदापि मत दीजिये। ऐसे भ्रम पालकर आप खुद को भुलावे में रख रहे हैं।

खैर मुझे तो तटस्थ रहने से बड़ा अपराध दूसरा कोई नहीं लगता। अपने विवेक से नीर-क्षीर विभाजन करके सही गलत को देखकर , सप्रयास जो सही है उसका साथ देती हूँ और जो गलत है उसका विरोध करती हूँ। इस प्रक्रिया में यदि कोई दूर हो जाए तो कोई गम नहीं। अकेले रह जाऊँगी , इसका कोई भय नहीं है मन में। अकेले ही इस पृथ्वी पर जन्म लिया है और अकेले ही प्रयाण भी होगा। फिर भय किस बात का ?

सत्य की राह पर अक्सर अकेले ही चलना पड़ता है। एक बार चल पड़ो तो फिर आदत सी पड़ जाती है , उसी में सुकून भी आने लगता है । वही जीवन का मकसद भी बन जाता है। जो कमज़ोर होते हैं वे एक एक करके साथ छोड़ देते हैं, लेकिन सत्यवादी आगे ही बढ़ता रहता है ...अकेले नहीं , अपनी आस्था और आत्मविश्वास के साथ ....Link
सत्यमेव जयते।

Zeal

Sunday, October 9, 2011

ब्लॉगरीय मानसिकता - (खरी-खरी)

ब्लॉगर होकर ब्लॉगरीय मानसिकता को न समझा जाए तो ब्लॉगिंग करना व्यर्थ है। एक वर्ष, चार माह के लेखन के दौरान अनेक अनुभव किये , जिसमें यथार्थ के दर्शन करने का अवसर मिला। सत्य इतनी परतों में दबा-छुपा होता है की उसका अनावरण आसानी से नहीं हो पाता है । ऐसे में आवश्यकता है इस बात की ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हों जिनसे भेंड की खाल में छुपे भेड़ियों की पहचान की जा सके।

लेखन कार्य भी समाज का एक आम नागरिक ही करता है। अतः लेखकों और टिप्पणीकारों के विचार ही हमारे समाज का दर्पण हैं। जो चुप रहते हैं और तटस्थ रहते हैं , वे सबसे बड़े अपराधी हैं और तटस्थ रहने का गुनाह अक्षम्य है। वे स्वयं को शांतिप्रिय की श्रेणी में रखते हैं , लेकिन सच तो यह है वे भीरु हैं। सत्य की परख करने की क्षमता ही नहीं है उनमें। सत्य को जान लेने बाद भी किसी को खो देने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। इनसे भी बना के रखो , उनसे भी बना के रखो । कहीं कोई टिप्पणीकार खो न जाए, इसी उलझन में रहते हैं।

एक साधे सब सधै , सब साधे सब जाए।

  • ब्लॉगजगत में कुछ लोग विचारों के न मिल पाने की दशा में लेखक के साथ व्यक्तिगत द्वेष पाल लेते हैं। अनायास ईर्ष्या करने लगते हैं और अनावश्यक आलोचना में लिप्त हो जाते हैं। ऐसी मानसिकता कमज़ोर चरित्र को इंगित करती है। उनके विष-वमन से उनका ही भेद खुलता है , अन्य किसी की कोई हानि नहीं होती।
  • दुसरे वे जो अपने अन्दर की ईर्ष्या और द्वेष को मार नहीं पाते और निरंतर उसे पोषित करते रहते हैं। जैसे ही कोई मौका मिलता है , सूंघते हुए वहां पहुँच जाते हैं और संचित द्वेष का विष-वमन कर आते हैं । ऐसे लोग 'भाड़े के टट्टू' श्रेणी में आते हैं। इनका कोई चरित्र नहीं होता। ऐसे लोग टिप्पणी विषय पर नहीं करते अपितु व्यक्तिगत भड़ास निकालकर अपने अहम् की पुष्टि करते हैं।
  • कुछ महान लेखकों के पास जब विषय चुक जाते हैं तो वे दूसरों के ऊपर आलेख लिखते हैं, जैसे-- " टंकी आरोहण" अथवा बिना सन्दर्भ के दूसरों को तिरस्कृत करने के तुच्छ उद्देश्य से आलेख लिखकर टिप्पणी पाने की लालसा रखते हैं। ऐसे लोग सिर्फ 'मसाला' ढूंढते हैं और औने-पौने में लेख लिखकर instant popularity पा जाना चाहते हैं।
  • कुछ लोग संतों पर लघु कथा अनुवादित करते-करते खुद को ही संत समझ बैठते हैं। प्रवचन करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए बहुत ज़रूरी है की वे इस झूठे भुलावे से बाहर निकलें।
  • कुछ लोग अपनी टिप्पणियों में बेशर्मी से भड़ास निकालते हैं और अपेक्षा रखते हैं की उनकी टिप्पणी प्रकाशित कर दी जाए। ऐसे लोग स्नेह के पात्र ही नहीं होते। सच्चाई सामने आने पर इनसे दूरी बना लेना ही बेहतर विकल्प है।
  • कुछ लोग बेहद छुई-मुई टाइप के होते हैं । हर दूसरी पोस्ट के बाद बुरा मानकर नाराज़ हो जाते हैं और आपके आलेखों पर आना बंद कर देते हैं। बस चोरी-चोरी पढ़ते रहते हैं आपको। ऐसे लोगों की संवेदनशीलता का सम्मान किया जाना चाहिए , और उनका नाज़ुक दिल कहीं दुःख न जाए , इसलिए उनके आलेखों पर आपको भी अनुपस्थित ही रहना चाहिए। ताकि वे शान्ति से जी सकें।
  • दूल्हा बिकता है बोलो खरीदोगे? -- SORRY , SORRY -- ब्लॉगर बिकता है बोलो खरीदोगे ? ......एक-एक टिप्पणी से ब्लॉगर्स की खरीद-फरोख्त आसानी से की जा सकती है। ( बेहद अफसोसजनक है ये)
  • कुछ उम्रदराज़ ब्लॉगर्स को अनायास ही अपना सिंघासन डोलता हुआ लगता है और वे अपने से कमउम्र लेखकों को लेखन छोड़ने के लिए बाध्य करके अपनी कलुषित मानसिकता को उजागर करते हैं। ऐसे लोगों के लिए बस इतना ही की थोडा सा बडप्पन लायें खुद में। इनके 'भय' का कोई इलाज नहीं।
  • कुछ लोग पल में तोला , पल में माशा ...क्या कहें ऐसों को ?
  • कुछ लोग ( so called शांतिप्रिय) , इतने confused रहते हैं की कभी सत्य के आस-पास फटकते ही नहीं , उन्हें डर होता है की वे कहीं इस अग्नि में भस्म ही ना हो जाएँ। अजी जनाब , हवन करने में उँगलियाँ तो जलती ही हैं। वे सोचते हैं, टिप्पणी करूँ की न करूँ ?अच्छा चलो कोई चाँद -सितारे वाला आलेख आएगा तो टिप्पणी कर देंगे ताकि अमुक ब्लॉगर मेरे आलेखों पर आता रहे। धिक्कार है !...हो सके तो सत्य को पहचान कर अच्छाई की रक्षा के लिए आवाज़ बुलंद कीजिये। किसी को खो देने के फेर में मत पड़िए। कुछ भी शाश्वत नहीं है । जन्म देने वाले माता-पिता भी छोड़ कर चले जाते हैं , इस कर्मभूमि पर संघर्षरत रहने के लिए।
  • कुछ लोग एक अलग ही दुनिया में रहते हैं। आस-पास देश और समाज में क्या घट रहा है इससे कोई सरोकार नहीं होता है उन्हें। वे बस लिखे जा रहे हैं । ऐसे आलेखों में विचारों की शून्यता होती है। दिल और दिमाग को जो मथ दे , उसका अभाव दिखता है वहां।
  • अंत में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सत्य ही बोलते हैं , सत्य ही लिखते हैं और सत्य की पहचान करने में सक्षम होते हैं। ऐसे व्यक्तियों में विशिष्ट चारित्रिक दृढ़ता होती है । ऐसे लोग निर्भय और निर्भीक होते हैं । ऐसे लोग सत्य के मार्ग पर चलते हुए अच्छाई का ही साथ देते हैं।

सीने में एक आग जलनी चाहिए। ये आग ही हमें मन से , वचन से और कर्म से शुद्द करती है। यदि ह्रदय में कोई आंच ही न होगी तो तप कर कुंदन होने का अवसर नहीं मिलेगा। यही आग हमें सत्य के मार्ग पर आगे ले जाती है। यही आग सत्य जैसे कठिनतम मार्ग पर हमारी मुलाक़ात सत्यवादियों से करवाती है।

कमज़ोर पड़ना, व्यथित होना , पलायन के विचारों से घिर जाना आदि मानवीय कमजोरियां हैं । यही हमें मनुष्य बने रहने का अवसर प्रदान करती है। लेकिन ऐसे पलों में हमारे शुभचिंतक और हमारे अराध्य हमारे साथ होते हैं । हमें उसी ऊर्जा से वापस बुलाते हैं और अपने बड़प्पन का परिचय देते हैं।

गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में ,
जो उठकर खड़ा हो जाए उसे "ब्लॉगर" कहते हैं।

Zeal

Sunday, October 2, 2011

सारथि जिसके बने श्रीकृष्ण भारत पार्थ की

अथ श्री महाभारत कथा ...
कथा है पुरुषार्थ की ,ये स्वार्थ की , परमार्थ की
सारथि जिसके बने श्रीकृष्ण भारत पार्थ की
शब्द दिग्घोषित हुआ...
जब सत्य सार्थक सर्वथा

यदा-यदा हिधर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारता
अभ्युत्थानं अधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम
परित्राणाय साधुनाम
विनाशाय च दुष्कृताम
धर्म्संस्थाप्नाय
संभवामि युगे युगे

भारत की है कहानी , सदियों से भी पुरानी
है ज्ञान की ये गंगा , ऋषियों की अमर कहानी
ये विश्व भारती है ,वीरों की आरती है
है नित नयी पुरानी ,भारत की ये कहनी

Zeal