ईर्ष्या एक घातक मानसिक रोग है, इसका उदाहण ब्लॉग-जगत में भी मौजूद है।
अब मुझसे ईर्ष्या करने वाले एक अत्यंत बुद्धिजीवी ब्लोगर ने मेरे ही नाम की एक फर्जी 'ZEAL '- ID बनायीं है । जिससे वो हर एक ब्लॉग पर जाकर मेरे नाम से उलटी-सीधी टिप्पणियां कर रहा/रही है।
पाठकों को सचेत करना मेरा फर्ज था , इसलिए कर दिया।
अपनी हिफाज़त करना अब आपके ही हाथ में है।
उस फर्जी ZEAL - ID se संवाद अथवा पत्राचार सोच समझकर कीजियेगा।
और उस फर्जी ZEAL - ID...द्वारा की गयी अभद्र टिप्पणियों की जिम्मेदार मैं नहीं होउंगी।
शुभकामनाओं सहित ,
दिव्या
Sunday, October 24, 2010
आपके निमंत्रण का शुक्रिया राजीव जी..
invitation for 30th oct. meeting on ayodhya judgement - in hindi & english
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| show details Oct 22 (2 days ago) ![]() |
Dated: 20th October, 2010
Dear friends,
We feel that a debate is necessary on the
recent UP High Court judgement on the Ayodhya dispute. While most of
the middle class, political parties and media feel that judgement is
quite good from the point of view of motivating the parties in the
case to arrive at a solution by settlement and that the country
remained peaceful after the pronouncement of judgement is being
considered a major achievement, we feel that this judgement has raised
questions over the future of India as a secular democracy and whether
the rule of law will prevail or not.
You’re cordially invited to a national discussion on the
Ayodhya judgement scheduled to be held in Lucknow.
Date: 30th October, 2010
Venue: Karna Bhai Sabhagar, Gandhi Bhawan, opposite
Residency and Shaheed Smarak, Lucknow (enter from Gate No. 6)
Time: 10 am to 5 pm
Professor Roop Rekha Verma (9335905337), Professor Ramesh Dixit
(9415103162), Veerendra Yadav (9415371872), Shakeel Siddiqui
(9839123525), Advocate Mohammad Shoaib (9415012666), Advocate Randhir
Singh Suman (9450195427), Dr. Naseem Iqtadar Ali (9451175349), Shehla
Ghanim (9235669557), Rajeev Yadav (9452800752), Shahnawaz Alam
(9415254919), Sandeep Pandey (0522 2347365)
Note: For participants coming from outside Lucknow, if you’ll require
stay arrangement please let us know in advance.
RAJEEV YADAV
Organization Secretary, U.P.
Peoples Union for Civil Liberties (PUCL)
०९४५२८००७५२
--------------------------------------------------------
प्रिय मित्र राजीव ,
आपने निमंत्रण देकर जो सम्मान दिया है , उसके लिए ह्रदय से आभारी हूँ।
लेकिन मेरा मानना है , इस प्रकार की मीटिंग्स में प्रतिभागी इमानदार नहीं रह पाता है । जान बचाने के लिए कब किस दिशा में बहना शुरू करेगा , उसे खुद ही नहीं मालूम होता। मेरी पिछली पोस्ट को ही मेरी बेबाक राय मानी जाये। मीटिंग में उपस्थिति न होते हुए भी मेरे विचार , मेरे ब्लॉग के माध्यम से आप लोगों तक जरूर पहुंचेंगे।
कुछ अवगुण हैं मुझमें, जिसके कारण मैं स्वयं को इस प्रकार की मीटिंग्स का प्रतिभागी बनने के लायक नहीं समझती।
- पहली बात तो ये की मैं धर्म-निरपेक्षता में यकीन नहीं रखती। इस फर्जी शब्द से घृणा है मुझे । इस्लाम के ठेकेदार , सुप्रीम कोर्ट में धर्म के नाम पर हक मांगने जा रहे हैं। कायर हिन्दू डटे हुए हैं उनका तलवा चाटने में। ऐसे में मुझसे अपेक्षा मत कीजिये धर्म निरपेक्षता की ।
- कश्मीर में मुसलमान झंडा जला रहे हैं और नपुंसक बने हिन्दू , पहले एक तिहाई का स्वागत कर रहे हैं, फिर पूरा लुटने की दिवाली मनायेंगे। ऐसी स्थिति में कायर हिन्दू तथा लालची मुसलमान के साथ मीटिंग्स का कोई औचित्य नहीं है।
- तीसरी बात मुझे संतई करना नहीं आता।
- चापलूसी करना नहीं आता
- शक्कर में लपेट कर बोलना नहीं आता
- थाली के बैगन की तरह और मौकापरस्त दोगले हिन्दुओं की तरह दल बदलना नहीं आता
आपका आयोजन सफल हो, इन्ही शुभकामनाओं के साथ,
दिव्या.
Saturday, October 23, 2010
क्या हिन्दुस्तान आजाद है ? पहले मुग़ल , फिर अंग्रेज़ और अब कांग्रेसी मानसिकता के गुलाम हैं हम
सदियों पहले मुगलों ने भारत पर आक्रमण किया और कई वर्षों तक हमारे ऊपर राज किया। फिर अंग्रेज आये और उन्होंने हमें लूटना शुरू किया । हम गरीब तो थे ही , कायर भी निकले। गुलामी में जकड़े रहना शायद हमें सुकून देता है। जैसे सुवर को कीचड में रहने का जो आनंद है , वो उसे कहीं नहीं मिलता।
फिर देश के कुछ सपूत- सरदार भगत सिंह , वल्लभ भाई पटेल, चन्द्र शेखर आजाद , सुभाष चन्द्र बोस , महात्मा गाँधी और अनेकानेक स्त्री-पुरुष , जिन्होंने अपने प्राणों की कुर्बानी देकर इस देश को आजाद कराया ।
देश के आजाद होने के साथ ही , गद्दारों ने अपने लिए एक पृथक राष्ट्र की मांग की और १४ अगस्त की रात को भारत माता के दो टुकड़े कर दिए गए। गद्दारों को फिर भी चैन नहीं आया और पिछले ६३ वर्षों से काश्मीर की मांग कर रहे हैं। जगह-जगह मंदिरों को ध्वस्त करके हिन्दुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। सोमनाथ का मंदिर और रामकोट का मंदिर ढहाना इसके ज्वलंत उदाहरण हैं ।
वो मुसलमान क्या भारतीय नहीं थे जिन्होंने भारत विभाजन की मांग की थी ? और जो मुसलमान आज भारत में रह रहे हैं क्या वो किसी भी कोण से भारतीय हैं ? क्या बाबरी मस्जिद के लिए सतत मांग उनकी काश्मीर के लिए पृथक मांग उनके भारतीय होने को दर्शाती है ?
क्या वो अपने जीवन में एक बार भी भारतीय होने का दायित्व नहीं निभा सकते । क्या एक बार ये जिहाद नहीं कर सकते की काश्मीर भारत का अभिन्न अंग है । काश्मीर का मुसलमान बच्चा -बच्चा भी आज सड़कों पर आन्दोलन कर रहा है की काश्मीर पकिस्तान को मिलना चाहिए। हमारे जवान अपनी जान देकर उनकी रक्षा कर रहे हैं और वो उन पर ही पत्थर बरसाकर विद्रोह कर रहे हैं। क्या ये मुसलमान भारतीय कहलाने के योग्य हैं ?
मुसलमानों का परचम आज इसलिए लहरा रहा है क्यूंकि वो कायर नहीं हैं। अपने मजहब का सम्मान करते हैं तथा अपना ईमान बेच कर खा नहीं गए हैं। बल्कि इनके पास हिन्दुओं का ईमान खरीदने की बेशुमार ताकत और दौलत है । ये जिस देश में रहते वहीँ की थाली में छेद करते हैं। हिन्दुस्तान में रहकर इस्लाम का प्रचार करते हैं। हिन्दू ग्रंथों और संहिताओं का आधा अधूरा अध्यन कर , तथ्यों को तोड़ मरोड़ का पेश करना इनका प्रिय शगल हो गया है।
इस्लाम के कट्टर प्रचारकों से मेरा ये कहना है की जब तक श्रद्धा न हो , दुसरे धर्म के ग्रन्थ न पढ़ा करें। क्यूंकि किसी धर्म के ग्रन्थ पढ़कर उसे अपमानित करके , आप स्वयं अपनी मानसिकता का परिचय देते हैं और अपने धर्म इस्लाम को बट्टा लगा रहे होते हैं। किसी को नीचा दिखाकर आप कभी ऊपर नहीं उठ सकेंगे। ईर्ष्या की अग्नि से आप जल रहे हैं, खुद को भस्म कर रहे हैं और मानवता को त्रस्त कर रहे हैं। भारतीय होने का फर्ज निभाइए । भारत विभाजन के बाद आप हमारे घर में एक मेहमान की तरह रह रहे है। इसलिए अनाधिकार चेष्टाओं से बचिए। उछल-कूद करने का शौक ज्यादा हो तो पड़ोस में [ पकिस्तान] में अपने बंधू-बांधवों के साथ रहिये।
कांग्रेस का अर्थ हैं- 'सभा' जहाँ पूर्वाग्रहों से रहित विचार विमर्श हो सके। लेकिन आज कांग्रेस , सिर्फ एक मानसिकता बनके रह गयी है । यहाँ लोग सेक्युलेरिज्म को भुना रहे हैं ! आखिर कब तक धर्म-निरपेक्षता के नाम पर बेच कर खाते रहेंगे अपने देश को ? यहाँ लोग अपने निजी हितों के लिए एक जुट होकर पापड बेल रहे हैं । देश के हित से इन्हें कोई लेना देना नहीं है। नेहरु से लेकर प्रपौत्र राहुल तक सभी इसी मानसिकता के गुलाम हैं। क्यूंकि शोहरत और कुर्सी पाने का सबसे आसान रास्ता है , मुसलामानों के फेवर में बोलो और गद्दी हथियाओ । फिर मुसलामानों से वोट बैंक छिन न जाये , इसलिए मुसलामानों की हर जायज और नाजायज मांगों को मानते चलो और उनकी आतंकवादी सरगर्मियों को भुलाते चलो जैसे शहीदों को भुला दिया है।
ये कांग्रेसी मानसिकता जो हिंदुत्व को ख़तम करेगी और देश को तीसरी बार गुलाम करेगी , बहुत तेजी से , एक संक्रामक रोग की तरह बढ़ रही है। हर तीसरा हिन्दू , मुसलमान की गौरव-गाथा में लिप्त दिखाई दे रहा है। बहुत शीघ्र ही इसकी भी जरूरत नहीं पड़ेगी क्यूंकि हमारी कायरता हमें उनका गुलाम बना देगी और फिर हम आरती की हिन्दू-थाली सजाकर उनका तिलक करते मिलेंगे।
बाबरी मस्जिद विवाद पर निर्णय से मसलमानों का तो रक्त खौल गया। उन्होंने १०, ००० पृष्ठों के निर्णय को बिना पढ़े ही एलान कर दिया की ये बईमानी है और वो सुप्रीम कोर्ट से पूरा का पूरा लेकर ही दम लेंगे। अरे आधे हिन्दुस्तान से दिल नहीं भरा तो आधे जन्मस्थान से उनका क्या होगा । उन्हें तो दो चाहिए एक से उनका क्या होगा ।
जनाब आप दो लीजिये। पकिस्तान के साथ हिन्दुस्तान फ्री लीजिये।
आभार ।
फिर देश के कुछ सपूत- सरदार भगत सिंह , वल्लभ भाई पटेल, चन्द्र शेखर आजाद , सुभाष चन्द्र बोस , महात्मा गाँधी और अनेकानेक स्त्री-पुरुष , जिन्होंने अपने प्राणों की कुर्बानी देकर इस देश को आजाद कराया ।
देश के आजाद होने के साथ ही , गद्दारों ने अपने लिए एक पृथक राष्ट्र की मांग की और १४ अगस्त की रात को भारत माता के दो टुकड़े कर दिए गए। गद्दारों को फिर भी चैन नहीं आया और पिछले ६३ वर्षों से काश्मीर की मांग कर रहे हैं। जगह-जगह मंदिरों को ध्वस्त करके हिन्दुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। सोमनाथ का मंदिर और रामकोट का मंदिर ढहाना इसके ज्वलंत उदाहरण हैं ।
वो मुसलमान क्या भारतीय नहीं थे जिन्होंने भारत विभाजन की मांग की थी ? और जो मुसलमान आज भारत में रह रहे हैं क्या वो किसी भी कोण से भारतीय हैं ? क्या बाबरी मस्जिद के लिए सतत मांग उनकी काश्मीर के लिए पृथक मांग उनके भारतीय होने को दर्शाती है ?
क्या वो अपने जीवन में एक बार भी भारतीय होने का दायित्व नहीं निभा सकते । क्या एक बार ये जिहाद नहीं कर सकते की काश्मीर भारत का अभिन्न अंग है । काश्मीर का मुसलमान बच्चा -बच्चा भी आज सड़कों पर आन्दोलन कर रहा है की काश्मीर पकिस्तान को मिलना चाहिए। हमारे जवान अपनी जान देकर उनकी रक्षा कर रहे हैं और वो उन पर ही पत्थर बरसाकर विद्रोह कर रहे हैं। क्या ये मुसलमान भारतीय कहलाने के योग्य हैं ?
मुसलमानों का परचम आज इसलिए लहरा रहा है क्यूंकि वो कायर नहीं हैं। अपने मजहब का सम्मान करते हैं तथा अपना ईमान बेच कर खा नहीं गए हैं। बल्कि इनके पास हिन्दुओं का ईमान खरीदने की बेशुमार ताकत और दौलत है । ये जिस देश में रहते वहीँ की थाली में छेद करते हैं। हिन्दुस्तान में रहकर इस्लाम का प्रचार करते हैं। हिन्दू ग्रंथों और संहिताओं का आधा अधूरा अध्यन कर , तथ्यों को तोड़ मरोड़ का पेश करना इनका प्रिय शगल हो गया है।
इस्लाम के कट्टर प्रचारकों से मेरा ये कहना है की जब तक श्रद्धा न हो , दुसरे धर्म के ग्रन्थ न पढ़ा करें। क्यूंकि किसी धर्म के ग्रन्थ पढ़कर उसे अपमानित करके , आप स्वयं अपनी मानसिकता का परिचय देते हैं और अपने धर्म इस्लाम को बट्टा लगा रहे होते हैं। किसी को नीचा दिखाकर आप कभी ऊपर नहीं उठ सकेंगे। ईर्ष्या की अग्नि से आप जल रहे हैं, खुद को भस्म कर रहे हैं और मानवता को त्रस्त कर रहे हैं। भारतीय होने का फर्ज निभाइए । भारत विभाजन के बाद आप हमारे घर में एक मेहमान की तरह रह रहे है। इसलिए अनाधिकार चेष्टाओं से बचिए। उछल-कूद करने का शौक ज्यादा हो तो पड़ोस में [ पकिस्तान] में अपने बंधू-बांधवों के साथ रहिये।
कांग्रेस का अर्थ हैं- 'सभा' जहाँ पूर्वाग्रहों से रहित विचार विमर्श हो सके। लेकिन आज कांग्रेस , सिर्फ एक मानसिकता बनके रह गयी है । यहाँ लोग सेक्युलेरिज्म को भुना रहे हैं ! आखिर कब तक धर्म-निरपेक्षता के नाम पर बेच कर खाते रहेंगे अपने देश को ? यहाँ लोग अपने निजी हितों के लिए एक जुट होकर पापड बेल रहे हैं । देश के हित से इन्हें कोई लेना देना नहीं है। नेहरु से लेकर प्रपौत्र राहुल तक सभी इसी मानसिकता के गुलाम हैं। क्यूंकि शोहरत और कुर्सी पाने का सबसे आसान रास्ता है , मुसलामानों के फेवर में बोलो और गद्दी हथियाओ । फिर मुसलामानों से वोट बैंक छिन न जाये , इसलिए मुसलामानों की हर जायज और नाजायज मांगों को मानते चलो और उनकी आतंकवादी सरगर्मियों को भुलाते चलो जैसे शहीदों को भुला दिया है।
ये कांग्रेसी मानसिकता जो हिंदुत्व को ख़तम करेगी और देश को तीसरी बार गुलाम करेगी , बहुत तेजी से , एक संक्रामक रोग की तरह बढ़ रही है। हर तीसरा हिन्दू , मुसलमान की गौरव-गाथा में लिप्त दिखाई दे रहा है। बहुत शीघ्र ही इसकी भी जरूरत नहीं पड़ेगी क्यूंकि हमारी कायरता हमें उनका गुलाम बना देगी और फिर हम आरती की हिन्दू-थाली सजाकर उनका तिलक करते मिलेंगे।
बाबरी मस्जिद विवाद पर निर्णय से मसलमानों का तो रक्त खौल गया। उन्होंने १०, ००० पृष्ठों के निर्णय को बिना पढ़े ही एलान कर दिया की ये बईमानी है और वो सुप्रीम कोर्ट से पूरा का पूरा लेकर ही दम लेंगे। अरे आधे हिन्दुस्तान से दिल नहीं भरा तो आधे जन्मस्थान से उनका क्या होगा । उन्हें तो दो चाहिए एक से उनका क्या होगा ।
जनाब आप दो लीजिये। पकिस्तान के साथ हिन्दुस्तान फ्री लीजिये।
आभार ।
Thursday, October 21, 2010
इन्द्रिय निग्रहण --- ईर्ष्या एक घातक मानसिक विकार --- Jealousy-A malignant cancer !
वेदों , उपनिषदों , संहिताओं और ग्रंथों में भी यह कहा गया है कि - काम , क्रोध, लोभ , मोह, मद और मत्सर से बचिए। हमें अपने मन में आये इन वेगों को धारण करना चाहिए अर्थात इन पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। जब तक हमारी इन्द्रियों पर हमारा नियंत्रण नहीं होगा , तब तक हम अनेकानेक मानसिक विकारों से ग्रस्त होते रहेंगे।
ईर्ष्या एक ऐसा ही घातक मानसिक विकार है , जिसकी परिणति अक्सर भयानक होती है। लोगों को पता भी नहीं चलता कि कब वो ईर्ष्या से ग्रस्त हो गए हैं। यह एक ऐसा मानसिक विकार है जो व्यक्ति को अति-दयनीय स्थिति में पहुंचा देता है ईर्ष्या का मन में प्रादुर्भाव अक्सर कुछ खो देने अथवा दूर हो जाने के एहसास के कारण होता है।
ईर्ष्या में अक्सर एक त्रिकोण होता हैं । त्रिकोण के दो सिरों पर खतरा मंडराता रहता है। और ईर्ष्यालु व्यक्ति खुद को तो नष्ट कर ही रहा होता है। अर्थात तीनों कि ही हानि होती है।
प्यार जब अप्राप्य हो जाता है तो भी व्यक्ति ईर्ष्या से ग्रस्त हो जाता है , तीसरे व्यक्ति से द्वेष रखने लगता है कि इसने मेरा प्यार छीन लिया। वह उस तीसरे व्यक्ति को अपना प्रतिद्वंदी समझने कगता है। ऐसी स्थिति में अक्सर स्त्री का जीवन खतरे में होता है। ईर्ष्या बढ़ने के साथ साथ वह व्यक्ति उन दोनों कि मृत्यु का कारण भी बन सकता है।
आफिस में एक कर्मचारी को दुसरे से इर्ष्या हो सकती है, कि यह बौस का ज्यादा प्रिय है। प्रायः सास को बहू से ईर्ष्या होती है कि यह मेरे पुत्र को मुझसे छीन रही है। जबकि वास्तविकता यह नहीं होती। विवाह के बाद पुरुष का प्यार तो बंटना ही है। समझदार माएं कभी बहू से ईर्ष्या नहीं रखती और उनके घर में बहू , एक बेटी कि तरह शान से रहती है।
अक्सर ये ईर्ष्या बच्चों और उन टीनेजर्स में भी देखने को मिलती है , जिनमें आत्मविश्वास तथा आत्म सम्मान [ self esteem ] कम होता है। तथा उनमें ये ईर्ष्या ऐग्रेसिव [ आक्रामक ] रूप धारण कर लेती है । यही कारण है आज बच्चों में बढ़ते क्राइम का। बच्चों में अक्सर गहरी दोस्ती , उनके अन्दर भावनात्मक असुरक्षा तथा एकाकीपन पैदा करती है । वो यह नहीं बर्दाश्त कर पाते कि उनका दोस्त किसी दुसरे से बात करे।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि , छेह महीने वाले नवजात शिशु भी ईर्ष्या से ग्रस्त हो सकते हैं। यदि माँ किसी दूसरे बच्चे पर ज्यादा ध्यान दे रही है, तो शिशु डिस्ट्रेस के लक्षण व्यक्त करता है। इसी कारण से सिबलिंग- राइवेलरी भी होती है।
ईर्ष्या एक ऐसी प्रतिक्रिया है , जिसमें ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य , किसी के बारे में मनमाना रिश्ता बनाकर सोचने लगता है , जो कभी सच , कभी आभासी तो कभी पूर्णतया काल्पनिक होता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति सदैव अपने को एक अनजाने खतरे से घिरा हुआ पाता है । उसका आत्मविश्वास कम होने लगता है और वो भावनात्मक रूप से टूटने लगता है । भय और शंका से ग्रस्त होकर वो अक्सर अजीबोगरीब हरकतें करता है और खुद को बहुत ही दयनीय स्थिति में पहुंचा देता है।
वह जहाँ भी जाता है , उस व्यक्ति कि निंदा अपने साथियों के साथ करता है। उसके इस कृत्य में उसके ' लो सेल्फ-इस्टीम ' वाले साथी , उसका साथ देते हैं , और उसको बर्बादी कि ओर अग्रसर करते हैं । इन मौका परस्त दोस्तों के साथ जब वह निदा करके अपनी भड़ास निकाल लेता है तो थोडा सा संयत महसूस करता है और तब ही भोजन ग्रहण करने कि अवस्था में आ पाता है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वह व्यक्ति अपनी निजी गांठें खोल चुका होता है तथा समाज के सामने नंगा हो चुका होता है।
एक ईर्ष्यालु व्यक्ति , अपनी ईर्ष्या कि बढती हुई भावना के चलते , लगातार अपने आस पास वालों से ये आश्वासन मांगता रहता है कि वह बेहतर है , और धीरे-धीरे वह इसी भ्रम में अपनी जिंदगी गुजारने लगता है।
एक ईर्ष्या से ग्रस्त व्यक्ति में निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं--
ईर्ष्या में व्यक्ति , दुसरे से ज्यादा खुद को ही नुकसान पहुंचाता है । यह एक घातक मानसिक विकार है। इसपर नियंत्रण रखिये।
ईर्ष्या से बचने का उपाय -
ईर्ष्या से बचने के लिए , उसकी प्रशंसा कीजिये जिससे आप ईर्ष्या रखते हैं और अपने मन को निर्मल रखिये।
एक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा मुझे ,
जब खुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा ....
आभार।
ईर्ष्या एक ऐसा ही घातक मानसिक विकार है , जिसकी परिणति अक्सर भयानक होती है। लोगों को पता भी नहीं चलता कि कब वो ईर्ष्या से ग्रस्त हो गए हैं। यह एक ऐसा मानसिक विकार है जो व्यक्ति को अति-दयनीय स्थिति में पहुंचा देता है ईर्ष्या का मन में प्रादुर्भाव अक्सर कुछ खो देने अथवा दूर हो जाने के एहसास के कारण होता है।
ईर्ष्या में अक्सर एक त्रिकोण होता हैं । त्रिकोण के दो सिरों पर खतरा मंडराता रहता है। और ईर्ष्यालु व्यक्ति खुद को तो नष्ट कर ही रहा होता है। अर्थात तीनों कि ही हानि होती है।
प्यार जब अप्राप्य हो जाता है तो भी व्यक्ति ईर्ष्या से ग्रस्त हो जाता है , तीसरे व्यक्ति से द्वेष रखने लगता है कि इसने मेरा प्यार छीन लिया। वह उस तीसरे व्यक्ति को अपना प्रतिद्वंदी समझने कगता है। ऐसी स्थिति में अक्सर स्त्री का जीवन खतरे में होता है। ईर्ष्या बढ़ने के साथ साथ वह व्यक्ति उन दोनों कि मृत्यु का कारण भी बन सकता है।
आफिस में एक कर्मचारी को दुसरे से इर्ष्या हो सकती है, कि यह बौस का ज्यादा प्रिय है। प्रायः सास को बहू से ईर्ष्या होती है कि यह मेरे पुत्र को मुझसे छीन रही है। जबकि वास्तविकता यह नहीं होती। विवाह के बाद पुरुष का प्यार तो बंटना ही है। समझदार माएं कभी बहू से ईर्ष्या नहीं रखती और उनके घर में बहू , एक बेटी कि तरह शान से रहती है।
अक्सर ये ईर्ष्या बच्चों और उन टीनेजर्स में भी देखने को मिलती है , जिनमें आत्मविश्वास तथा आत्म सम्मान [ self esteem ] कम होता है। तथा उनमें ये ईर्ष्या ऐग्रेसिव [ आक्रामक ] रूप धारण कर लेती है । यही कारण है आज बच्चों में बढ़ते क्राइम का। बच्चों में अक्सर गहरी दोस्ती , उनके अन्दर भावनात्मक असुरक्षा तथा एकाकीपन पैदा करती है । वो यह नहीं बर्दाश्त कर पाते कि उनका दोस्त किसी दुसरे से बात करे।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि , छेह महीने वाले नवजात शिशु भी ईर्ष्या से ग्रस्त हो सकते हैं। यदि माँ किसी दूसरे बच्चे पर ज्यादा ध्यान दे रही है, तो शिशु डिस्ट्रेस के लक्षण व्यक्त करता है। इसी कारण से सिबलिंग- राइवेलरी भी होती है।
ईर्ष्या एक ऐसी प्रतिक्रिया है , जिसमें ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य , किसी के बारे में मनमाना रिश्ता बनाकर सोचने लगता है , जो कभी सच , कभी आभासी तो कभी पूर्णतया काल्पनिक होता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति सदैव अपने को एक अनजाने खतरे से घिरा हुआ पाता है । उसका आत्मविश्वास कम होने लगता है और वो भावनात्मक रूप से टूटने लगता है । भय और शंका से ग्रस्त होकर वो अक्सर अजीबोगरीब हरकतें करता है और खुद को बहुत ही दयनीय स्थिति में पहुंचा देता है।
वह जहाँ भी जाता है , उस व्यक्ति कि निंदा अपने साथियों के साथ करता है। उसके इस कृत्य में उसके ' लो सेल्फ-इस्टीम ' वाले साथी , उसका साथ देते हैं , और उसको बर्बादी कि ओर अग्रसर करते हैं । इन मौका परस्त दोस्तों के साथ जब वह निदा करके अपनी भड़ास निकाल लेता है तो थोडा सा संयत महसूस करता है और तब ही भोजन ग्रहण करने कि अवस्था में आ पाता है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वह व्यक्ति अपनी निजी गांठें खोल चुका होता है तथा समाज के सामने नंगा हो चुका होता है।
एक ईर्ष्यालु व्यक्ति , अपनी ईर्ष्या कि बढती हुई भावना के चलते , लगातार अपने आस पास वालों से ये आश्वासन मांगता रहता है कि वह बेहतर है , और धीरे-धीरे वह इसी भ्रम में अपनी जिंदगी गुजारने लगता है।
एक ईर्ष्या से ग्रस्त व्यक्ति में निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं--
- कुछ खो देने का भय
- किसी के धोखा देने का संशय अथवा गुस्सा
- अनिश्चितता तथा जिंदगी में खालीपन
- अपने किसी ख़ास व्यक्ति या मित्र को किसी दुसरे प्रभावी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के हाथों खो देने का भय
- खुद पर अविश्वास
- हीन भावना से ग्रस्त होना।
- खोई हुई वास्तु या मित्र को पाने के लिए छटपटाना
- परिस्थियों से द्वेष रखना [ रिसेंटमेंट ]
- जिससे इर्ष्या करता है उसका निरंतर बुरा सोचना तथा उसको नुक्सान पहुंचाने कि योजना में लिप्त
- अक्सर अपने निंदनीय कार्यों के कारण , आत्मग्लानि के बोझ तले दबा रहता है
- अपने प्रतिद्वंदी कि खूबियों को पा जाने कि लालसा रखना
- अपनी भावनाओं [ इर्ष्या ] को स्वीकार करने से इनकार करना
- ऐसे लोग बहुत ही पजेसिव प्रवित्ति के होते हैं.
ईर्ष्या में व्यक्ति , दुसरे से ज्यादा खुद को ही नुकसान पहुंचाता है । यह एक घातक मानसिक विकार है। इसपर नियंत्रण रखिये।
ईर्ष्या से बचने का उपाय -
ईर्ष्या से बचने के लिए , उसकी प्रशंसा कीजिये जिससे आप ईर्ष्या रखते हैं और अपने मन को निर्मल रखिये।
एक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा मुझे ,
जब खुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा ....
आभार।
Tuesday, October 19, 2010
आत्मा की उत्पत्ति तथा विनाश--आत्मा की संख्या कितनी है पृथ्वी पर ? -- Our Soul !
आत्मा अजर अमर है अथवा आत्मा का विनाश होता है ?
आत्मा का अस्तित्व शरीर के साथ होता है । जब पंचतत्वात्मक , नाशवान शरीर , मृत्यु के उपरान्त , मिटटी में मिल जाता है तो आत्मा की सत्ता भी समाप्त हो जाती है। यदि आत्मा मरती नहीं तो , शरीर के नष्ट होने के बाद से नया शरीर प्राप्त होने तक आत्मा कहाँ रहती है ?
अब बात करते हैं , आत्मा की संख्याओं की । इस पृथ्वी पर कुल कितनी आत्माएं हैं। जनसंख्या लगातार बढ़ रही है । इस वृद्धि को देखकर ये नहीं समझ आता की नयी आत्माएं कहाँ से आ रही हैं । जो पहले से विद्यमान हैं वो तो नया शरीर धारण कर लेंगी , लेकिन बढती जनसँख्या के लिए नयी आत्मा कहाँ से आयेंगी ।
यदि यह मान भी लें की बहुत सी आत्माएं एक्स्ट्रा हैं , तो चिंता की कोई बात नहीं है। बढती हुई आबादी में जन्म लेने वाले प्रत्येक शिशु के लिए एक आत्मा की व्यवस्था हो सकेगी।
अब मन में एक प्रश्न है की मोक्ष क्या है ? और मोक्ष किसे मिलता है ? चूँकि शरीर तो नाशवान है, इसलिए निश्चित ही मोक्ष आत्मा को मिलता होगा। अब समस्या ये है की मोक्ष मिलने के कारण , आत्माओं की संख्या पृथ्वी पर निश्चित ही कम होती जायेगी । एक बात यह भी की , मोक्ष यदि अच्छी और पवित्र आत्माओं को ही मिलता है तो निश्चय ही पृथ्वी पर शेष आत्माएं कलुषित अथवा कम अच्छी होंगी। फिर रामराज्य कैसे आएगा। भ्रष्टाचार तथा कलियुग तो होगा ही न।
वापस आते हैं अपनी समस्या पर। मोक्ष के चलते आत्माओं की संख्या में कमी होने पर , बढती जनसँख्या के लिए नयी आत्माएं कहाँ से आयेंगी। क्या आत्मा की भी उत्पत्ति संभव है ? यदि हाँ तो बेहतर गुणवत्ता वाली , तथा मोक्ष के योग्य आत्मा की उत्पत्ति कैसे की जाये ?
क्या आत्माओं का भी कोई धर्म होता है ? क्या एक हिन्दू आत्मा मुस्लिम परिवार में जन्म ले सकती है । यही हाँ तो फिर उस मासूम बच्चे का विचार अपने परिवेश से पृथक क्यूँ नहीं हो पता।
क्या आत्माएं नास्तिक होती हैं ? यदि नहीं , तो नास्तिक व्यक्ति के अंतरात्मा की आवाज कैसी होती है । क्या नास्तिक व्यक्ति के साथ उसकी आत्मा संवाद करती है ।
मेरे विचार से आत्मा एक शक्तिपुंज है , जिसका निरंतर क्षय होता रहता है तथा यह भी नाशवान है। आपका क्या विचार है कृपया प्रकाश डालें।
यदि नास्तिकों और महिलाओं में भी आत्मा है और वो अपनी आत्मा की आवाज़ सुन सकते हैं तो कृपया अपने मस्तिष्क में आने वाली विचारों की आंधी को साझा करें।
नोट- पोस्ट की गुणवत्ता आपकी बहुमूल्य टिप्पणियों से द्विगुणित होती है, इसलिए आपके विचारों का स्वागत है।
आभार।
Sunday, October 17, 2010
प्रति प्रसव -- पूर्व जन्म पुनरागमन -- past life regression.
प्रायः ऐसा देखा गया है की कुछ लोगों में कुछ मानसिक रोग ऐसे होते हैं जो किसी भी प्रकार की चिकित्सा से नहीं ठीक हो पाते हैं। इसके लिए चिकित्सकों ने सम्मोहन का सहारा लिया। सम्मोहन के द्वारा व्यक्ति को उसके पूर्व जन्म में लेजाकर उसके साथ हुई घटनाओं का विश्लेषण करते हैं और उसके अनुसार , वर्तमान जन्म की समस्या का निदान ढूंढते हैं। इस चिकित्सा पद्धति से बहुत ही आंशिक सफलता मिली है आज तक ।
अनेकानेक जन्म लेने के साथ कभी कभी आत्मा भी बोझ तले दब जाती है । ओवर-बर्डएंड हो जाती है । जिसके कारण मनुष्य के वर्तमान जीवन में कुछ अनसुलझी सी उलझने हो जाती हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए मनोवैज्ञानिक , मनोचिकित्सक तथा माध्यमों ने इसका उपयोग करना शुरू किया।
सम्मोहन से पूर्व जन्म में ले जाने को प्रति प्रसव भी कह सकते हैं। इसमें जाकर व्यक्ति , कुछ धुंधली सी , अस्पष्ट सी, बातों का विवरण देता है। जो सत्य कम होती हैं, बल्कि उसकी पूर्व की यादें, बचपन की , तथा टी वी पे दखा हुआ कुछ या सुना हुआ कुछ , जो उसके मष्तिक पटल पर अंकित है , उसे बतलाता है।
व्यक्ति के द्वारा दिए गए विवरण सत्य न होने के कारण इसका चिकित्सकीय लाभ भी नहीं मिल पता। उलटे इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद व्यक्ति को कुछ और भी परेशानियों का सामना कर पड़ सकता है।
सम्मोहन द्वारा प्राप्त निष्कर्ष यही है की व्यक्ति , अपने अवचेतन मन में बैठे हुए विचार , श्रुत एवं अनुभूत धारणाओं को ही मूर्त रूप देता है। उसके बताये हुए विवरण की जांच करने पर ये पाया गया की , ज्यादातर बातें सत्य नहीं हैं।
इसलिए यदि कोई इस प्रक्रिया से चिकित्सा की उत्सुकता रखता है , तो वो उपचार की उम्मीद कम रखे , बल्कि अनजानी मुश्किलें उसके गले पड़ सकती हैं।
आभार।
अनेकानेक जन्म लेने के साथ कभी कभी आत्मा भी बोझ तले दब जाती है । ओवर-बर्डएंड हो जाती है । जिसके कारण मनुष्य के वर्तमान जीवन में कुछ अनसुलझी सी उलझने हो जाती हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए मनोवैज्ञानिक , मनोचिकित्सक तथा माध्यमों ने इसका उपयोग करना शुरू किया।
सम्मोहन से पूर्व जन्म में ले जाने को प्रति प्रसव भी कह सकते हैं। इसमें जाकर व्यक्ति , कुछ धुंधली सी , अस्पष्ट सी, बातों का विवरण देता है। जो सत्य कम होती हैं, बल्कि उसकी पूर्व की यादें, बचपन की , तथा टी वी पे दखा हुआ कुछ या सुना हुआ कुछ , जो उसके मष्तिक पटल पर अंकित है , उसे बतलाता है।
व्यक्ति के द्वारा दिए गए विवरण सत्य न होने के कारण इसका चिकित्सकीय लाभ भी नहीं मिल पता। उलटे इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद व्यक्ति को कुछ और भी परेशानियों का सामना कर पड़ सकता है।
सम्मोहन द्वारा प्राप्त निष्कर्ष यही है की व्यक्ति , अपने अवचेतन मन में बैठे हुए विचार , श्रुत एवं अनुभूत धारणाओं को ही मूर्त रूप देता है। उसके बताये हुए विवरण की जांच करने पर ये पाया गया की , ज्यादातर बातें सत्य नहीं हैं।
इसलिए यदि कोई इस प्रक्रिया से चिकित्सा की उत्सुकता रखता है , तो वो उपचार की उम्मीद कम रखे , बल्कि अनजानी मुश्किलें उसके गले पड़ सकती हैं।
आभार।
Saturday, October 16, 2010
निराश हूँ इस जेंडर-बायस से !
मेरी पिछली पोस्ट पर आई टिप्पणियों में से आदरणीय मनोज भारती जी ने बहुत अच्छी टिपण्णी की लेकिन उनकी अंतिम पंक्ति ने एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया है मन में । वे लिखते हैं कि --
" महिला ब्लॉगरों को, किसी भी विषय पर लिखने पर, प्राय: टिप्पणियाँ अधिक मिलती हैं । कहीं न कहीं यह महिला ब्लॉगरों के प्रति आकर्षण को भी सूचित करता है । "
मैं मनोज जी कि बात से सहमत नहीं हूँ। मुझे नहीं लगता कि एक गंभीर पाठक को इस बात से कोई सरोकार है कि लेख महिला ने लिखा है अथवा पुरुष ने। जो लोग गंभीर लेखन में विश्वास रखते हैं , वो जेंडर -बायस में विश्वास नहीं रखते।
एक पुरुष यदि अच्छी एवं सार्थक टिप्पणियां पाता है तो वह उसकी मेरिट है। और यदि किसी महिला ब्लोगर को सार्थक टिप्पणियां मिलती हैं तो वह उस लेखिका कि मेरिट है। इसमें लिंग-विभेद क्यूँ ?
यदि पुरुष आकर्षित होकर महिला ब्लोगर्स के लेखों पर लिखते हैं , तो फिर शायद महिला ब्लोगर्स भी पुरुष ब्लोगर्स के लेखों पर ज्यादा लिखती होंगी । फिर टिप्पणियों का तराजू तो बराबर ही रहेगा न ?
मेरा अनुरोध है कि कृपया इस तरह के विचारों को मन में स्थान न दें। ये स्वयं में एक पूर्वाग्रह है और महिला ब्लोगर्स के लिए निराशाजनक है।
यदि महिलाएं किसी क्षत्र में आगे आती हैं तो ये कहकर उनका मनोबल मत तोडिये कि जो कुछ उन्हें मिल रहा है वो सिर्फ उनके महिला होने के कारण है। महिलाओं में भी थोड़ी बहुत काबिलियत गलती से आ ही जाती है। और विद्वान् पुरुष अच्छे-बुरे लेखों को परखने कि भरपूर क्षमता रखते हैं।
यदि लेख पढ़कर मन में विचारों का मंथन हो तभी टिपण्णी कीजिये , केवल मैं या वो एक महिला है, इसलिए मत कीजिये। ये एक महिला के अस्तित्व का सर्वथा अपमान है। भूख नहीं ऐसी टिप्पणियों कि।
आभार।
" महिला ब्लॉगरों को, किसी भी विषय पर लिखने पर, प्राय: टिप्पणियाँ अधिक मिलती हैं । कहीं न कहीं यह महिला ब्लॉगरों के प्रति आकर्षण को भी सूचित करता है । "
मैं मनोज जी कि बात से सहमत नहीं हूँ। मुझे नहीं लगता कि एक गंभीर पाठक को इस बात से कोई सरोकार है कि लेख महिला ने लिखा है अथवा पुरुष ने। जो लोग गंभीर लेखन में विश्वास रखते हैं , वो जेंडर -बायस में विश्वास नहीं रखते।
एक पुरुष यदि अच्छी एवं सार्थक टिप्पणियां पाता है तो वह उसकी मेरिट है। और यदि किसी महिला ब्लोगर को सार्थक टिप्पणियां मिलती हैं तो वह उस लेखिका कि मेरिट है। इसमें लिंग-विभेद क्यूँ ?
यदि पुरुष आकर्षित होकर महिला ब्लोगर्स के लेखों पर लिखते हैं , तो फिर शायद महिला ब्लोगर्स भी पुरुष ब्लोगर्स के लेखों पर ज्यादा लिखती होंगी । फिर टिप्पणियों का तराजू तो बराबर ही रहेगा न ?
मेरा अनुरोध है कि कृपया इस तरह के विचारों को मन में स्थान न दें। ये स्वयं में एक पूर्वाग्रह है और महिला ब्लोगर्स के लिए निराशाजनक है।
यदि महिलाएं किसी क्षत्र में आगे आती हैं तो ये कहकर उनका मनोबल मत तोडिये कि जो कुछ उन्हें मिल रहा है वो सिर्फ उनके महिला होने के कारण है। महिलाओं में भी थोड़ी बहुत काबिलियत गलती से आ ही जाती है। और विद्वान् पुरुष अच्छे-बुरे लेखों को परखने कि भरपूर क्षमता रखते हैं।
पाठकों से एक अनुरोध -
यदि लेख पढ़कर मन में विचारों का मंथन हो तभी टिपण्णी कीजिये , केवल मैं या वो एक महिला है, इसलिए मत कीजिये। ये एक महिला के अस्तित्व का सर्वथा अपमान है। भूख नहीं ऐसी टिप्पणियों कि।
आभार।
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