Sunday, March 13, 2011

भारत देश के अनमोल रतन - सचिन तुझे सलाम


स्वभाव से संकोची सचिन तेंदुलकर जी एक बेहतरीन व्यक्तित्व के धनी हैं गर्व है की हम उस देश के नागरिक हैं जहाँ सचिन जैसे हर दिल अज़ीज़ खिलाड़ी हैं। १५ वर्ष की आयु से क्रिकेट में अपने कैरियर की शुरुवात करते हुए निरंतर कामयाबी की बुलंदियों को छूते चले गए।

आखिर इस कामयाबी का राज़ क्या है विनम्रता , गंभीरता , दायित्वों का पूर्ण एहसास , खेल के प्रति समर्पण, देशभक्ति और देशवासियों के लिए प्यार ही सचिन की कामयाबी और शोहरत का कारण है

कल साउथ अफ्रीका के खिलाफ मैच में सचिन ने अपना पसीना बहाकर भारत को एक मज़बूत मकाम पर खड़ा किया लेकिन अन्यों की लापरवाही ने जीता हुआ मैच हरवा दिया कल उनकी फील्डिंग भी देखने लायक थी इतना बेहतरीन प्रदर्शन की तारीफ़ के लिए शब्द कम पड़ें सचिन खेल में अपनी जी-जान लगा देते हैं। खेल के प्रति सचिन का समर्पण लाखों खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है।

विनम्रता तो सचिन में जैसे कूट-कूट कर भरी है जब मांजरेकर ने कहा की "सचिन को खेल से संन्यास ले लेना चाहिए" तब भी उन्होंने विनम्रता पूर्वक मौन रखा भावुक सचिन अनाथ बच्चों के लिए समाज सेवा से भी जुड़े हुए हैं

सन २०१० में ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध बेहतरीन दोहरी शतकीय पारी खेल कर तकरीबन जिता दिया था भारत को , लेकिन अंत में मात्र दो रनों से भारत की हार होने पर सचिन की आखों से आँसू निकल पड़े थे इस तरह से समर्पित होकर विरले ही खिलाड़ी खेलते हैं

कुछ लोगों का मानना है की सचिन जब शतक लगाते हैं तो भारत की हार निश्चित हो जाती है अब ऐसे अंधविश्वासों का क्या मतलब है क्या सचिन शतक लगाना छोड़ दें ?

सचिन का अपने देश के लिए जज्बा अनुकरणीय है जब मुंबई में मराठी भाषा का मुद्दा गरमाया हुआ था तो सचिन का वक्तव्य था - "मुझे महाराष्ट्रीयन होने पर गर्व है , लेकिन मैं सबसे पहले भारतीय हूँ " देश का नाम ऊँचा करने वाले ऐसे खिलाडी को 'भारत-रत्न' से पुरस्कृत होना चाहिए।

सुना है सचिन को सी-फ़ूड बहुत पसंद है , खासकर झींगा (Shrimp) सचिन का थाईलैंड में स्वागत है यहाँ झींगा का बोलबाला है।

सचिन तुम खेलो हज़ारों साल ,
खेल के रन हों पचास हज़ार

आभार ।

Saturday, March 12, 2011

विमर्श में प्रति-टिप्पणियों की उपादेयता .

कुछ विषय ऐसे होते हैं , जिन पर विमर्श आमंत्रित होता है विमर्श के दौरान लोग अपने विचार रखते हैं , उनके विचारों पर अन्य पाठक अथवा लेखक अपने विचारों को पुनः रखते हैं इस प्रकार विचारों के आदान-प्रदान से व्यक्ति के विचारों को आयाम मिलता है , ज्ञानवृद्धि होती है तथा एक दुसरे को बेहतर समझने में मदद भी मिलती है। और सबसे बड़ी बात , विषय के साथ न्याय भी होता है

कभी-कभी कुछ लोग प्रति-टिपण्णी मिलने पर नाराज़ हो जाते हैं। इसलिए प्रति-टिपण्णी लिखने में डर सा लगता है।

मेरा आप सभी से ये प्रश्न है की क्या -
  • लेख लिखने के बाद लेखक अथवा लेखिका को मौन धारण कर लेना चाहिए ?
  • क्या विषय को विस्तार देने के लिए यदि कोई नयी बात मस्तिष्क में है तो भी नहीं लिखनी चाहिए?
  • क्या प्रति-टिपण्णी मिलने पर टिप्पणीकार का बुरा मानना उचित है ?
  • क्या लेखक को ये अधिकार है की वो अपने ऊपर आई व्यक्तिगत टिपण्णी पर आपत्ति करे ?
  • क्या प्रति-टिपण्णी में सिर्फ यही उचित है की ....आपका आभार , पुनः आइयेगा , स्नेह बनाए रखियेगा , आदि-आदि ....

मेरे विचार से किसी भी विषय पर विमर्श के दौरान लेखक अथवा प्रतिभागियों को एक से ज्यादा बार अपनी बात लिखने अथवा कहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। टिप्पणियां जितनी अहम् हैं , प्रति-टिप्पणियां भी उतनी ही उपादेय हैं बस इतना ध्यान रखें की अपने विचार रखते समय किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करें , तथा अपनी शैली को शिष्ट एवं शालीन रखें

इस विषय पर आपके विचार जानने की उत्कंठा है

आभार।

Thursday, March 10, 2011

कला को कलंकित करते उन्मादी चित्रकार


कलाकार अपनी कलाकृतियों से अव्यक्त भावों को चित्रित करते हैं। कूची और रंगों के अद्भुत संयोजन से लोगों के दिलों दिमाग पर छा जाने वाले बेहतरीन चित्र उकेरते हैं , जो युगों तक अमिट छाप छोड़ जाते हैं हमारे स्मृति पटल पर अपनी कलाकृतियों द्वारा ही कलाकार राज करते हैं कलाप्रेमियों के दिलों में एक उत्कृष्ट कलाकृति की मिसाल है 'मोनालिसा' की मुस्कान युगों-युगों तक वो मुस्कान ह्रदय को आह्लादित करती रहेगी और एक चित्रकार को करोड़ों दिलों में सदा जीवित रखेगी

लेकिन आज किस वस्तु का दुरुपयोग नहीं हो रहा है ? अश्लील साहित्य लिखे जा रहे हैं अश्लील फिल्में बन रही है , और अब तो कला जगत भी संक्रमित हो गया है अश्लीलता और अभद्रता से

जहाँ इस्लाम में परदा-प्रथा पर इतना जोर दिया जाता है वही हुसैन साहब ने हिन्दू देवी-देवताओं को नग्न चित्रित किया अपनी कलाकृतियों में अब बुद्धिजीवी वर्ग के चित्रकार श्री प्रणव प्रकाश भी कला को कलंकित कर रहे हैं। MBBS और MBA की डिग्री रखने वाले श्री प्रणव प्रकाश जी ने एक स्त्री 'अरुंधती रॉय' का विरोध जताने के लिए उन्हें दो पुरुषों के मध्य निर्वसन चित्रित किया

इस तरह के चित्र , कलाकार की विकृत मानसिकता को दर्शाते हैं लोगों को अपने क्रोध पर काबू होना चाहिए आवेश में आकर किसी स्त्री का अपमान करने के उद्देश्य से उसका निर्वसन चित्र बनाना अत्यंत निंदनीय है। प्रत्युत्तर में अरुंधती की तरफ से भी ऐसे ही चित्र बनें तो फिर अराजकता का एक अंतहीन सिलसिला चल पड़ेगा

यदि अदालत में न्याय मिलने पर हताशा की अवस्था में निर्वसन हुई निशाप्रिया भाटिया को मानसिक चिकित्सालय जाने का आदेश दिया जा सकता है तो फिर प्रणव प्रकाश जैसे चित्रकारों को भी मानसिक चिकित्सालय में ही होना चाहिए।

कुछ खोखले तर्क -- चाहे शराबी हो , कातिल हो , बलात्कारी अथवा आतंकवादी , हर कोई अपने कृत्य को येन-केन प्रकारेण , न्यायोचित ठहरा ही लेता है वैसा ही कुछ अब ये कलाकार भी कर रहे हैं संस्कारों और मानव मूल्यों को अपनी थोथी दलीलों द्वारा लज्जित कर रहे हैं , और समाज को एक गलत दिशा दे रहे हैं।

पहली दलील मल्लिका शेरावत की -- फिल्म 'हिस ' पर इनके interview को टीवी पर सुना इनका कहना था "जब 'सर्प' अपनी केंचुल छोड़ता है तो वह नग्न होता है , इसलिए फिल्म में जब सर्प कन्या का जन्म हो रहा है तो जन्म के समय तो व्यक्ति नग्न ही होता है" --अतः मल्लिका भी निर्वसन हैं फिल्म में। अब व्यस्क लोग इनकी दलीलों से सीखेंगे जन्म का सिद्धांत।

दूसरी दलील एक महिला शिक्षिका की -

"
जयशंकर प्रसाद की कामायनी में प्रलय के पश्चात का चित्रण है, अब बताइये कि प्रलय में सब नष्ट हो गया हो तो वस्त्र दिखाना कहां तक उचित है। श्रद्धा और मनु को वस्त्र विहीन दिखाना ही ठीक है। अब श्रद्धा का सौंदर्य दिखाना आसाना हो जाता है और मनु का शरीर सौष्ठव "

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लेकिन मैडम अभी कौन सी प्रलय आई है जो स्त्री को निर्वसन दिखाना पड़ा ? जब प्रलय होगी और लोग भूखे मरेंगे तो वस्त्र के साथ-साथ कूची और रंग भी नहीं बचेंगे चित्रकार के पास पेट की ज्वाला शांत करने में व्यस्त होंगे उस समय क्रोध , लोभ , मोह सब नष्ट हो जाएगा , स्त्री और पुरुष का भेद मिट जाएगा वसन और निर्वसन को सोचने समझने की बुद्धि नहीं बचेगी सिर्फ अपने जीवन को बचाने का भय शेष होगा।


तीसरी दलील एक पुरुष कलाप्रेमी की -

"
चित्र निहारने की वस्तु है , विचार-विमर्श की नहीं "

ज़रूर निहारिये जनाब , लेकिन जब उस चित्र के साथ किसी का नाम जोड़ा गया हो


मुझे लगता है , कलाकारों को तथा चित्रकारों को अपनी कलाकृतियों में किसी भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए स्त्री को निर्वसन चित्रित करना , चित्रकार की विकृत मानसिकता की परिचायक है

बुद्धिजीवी वर्ग अपनी गैरजिम्मेदाराना दलीलों से ऐसे कृत्यों को उचित ना ठहराएं तथा अपनी संस्कृति और मानव मूल्यों को शर्मसार करें । कला को सौन्दर्यबोध का माध्यम होना चाहिए , वीभत्स नहीं ।

आभार

Wednesday, March 9, 2011

मिलिये ब्लॉगजगत की भावुक और संवेदनशील हस्ती से

आज अचानक श्री अशोक सलूजा जी के ब्लॉग 'यादें' पर पहुंचना हुआ तो उनकी पोस्ट पढ़कर आँख में आँसू गए एक पुरुष के ह्रदय में पिता का प्यार होता है , भाई का स्नेह और मित्र की शुभकामनायें होती हैं।

आज हमारे समाज को श्री अशोक सलूजा जैसे नागरिक की आवश्यकता है , जिसका संवेदनशील ह्रदय , लोगों पर हो रहे अत्याचार से दुखी हो जाता है , छटपटाता है और समाज में एक सुखद बदलाव की कामना रखता है

समाज में स्त्रियों की दुर्दशा देखते हुए अशोक जी ने ये इच्छा जताई की मैं उनके एहसास को अपने शब्दों में ढालूँ लेकिन अशोक जी की पोस्ट स्वयं ही पूरी तरह से सक्षम है उनके दिल का दर्द बयाँ करने में

यदि समाज में पुरुष वर्ग बस थोडा सा स्नेहिल हो जाए और स्त्रियाँ थोड़ी सी हिम्मत कर लें तो एक सकारात्मक संतुलन बन जाएगा। समस्याएं जड़ से समाप्त हो जायेंगी।

पिछले माह जब 'निशाप्रिया भाटिया ' की खबर सुनी थी की न्याय पाने के लिए , लाचारी और हताशा से ग्रस्त होकर उसने निर्वस्त्र होने का सहारा लिया , तो मन दुःख से भर गया मन में आया की न्याय क्या माँगना जब मिलना ही नहीं है तो ? न्याय के दरबार में लज्जित ही होना था तो क्यूँ नहीं उस हैवान को सबक सिखाने के बाद गयी हमारे यहाँ कोर्ट केसेज़ तो वर्षों तक चलते हैं , इसलिए न्याय मांगने के लिए नहीं बल्कि गुनाहगार को सजा देने के बाद अदालत में शान से तारीखों पर तारीखें पडवानी चाहिए थीं। और मजबूर होकर वो शख्स अपने सर के बाल नोचता और अपने ही कपडे फाड़ता

पिछले माह एक महिला ने एक लम्बी अवधी तक विधायक के हाथों का खिलौना बने रहने के बाद , मजबूर होकर और जीवन के प्रति मोह त्यागकर , उस विधायक का खून कर दिया। पीछे सदियों तक केस चलता रहे क्या फरक पड़ता है अपना न्याय उसने अपने हाथों से कर लिया।

गत माह एक मजदूर महिला ने अपने पति द्वारा २४ वर्षों तक सताए जाने के बाद , जीवन से हारकर , पति को टुकड़ों में काटकर अपने ही घर की दीवार में चुन दिया।

पुरुषों की प्रताड़ना का शिकार महिलाएं या तो ख़ुदकुशी कर रही हैं , या फिर क़त्ल। न्यायालयों पर से भरोसा उठ चुका है । क्या महिलाओं को इंसान समझकर हम उन्हें जीने का एक अवसर नहीं दे सकते ?

कल महिला दिवस के अवसर पर महिलाओं को क्या-क्या नसीब हुआ , जानने के लिए पढ़िए 'यादें' पर

आभार

Tuesday, March 8, 2011

महिला दिवस या फिर पाखण्ड ?

मन चंगा तो कठौती में गंगा यदि मन में प्रेम है , विश्वास है , संवेदनाएं हैं तो इश्वर भी हर किसी में दिखता है। अन्यथा रोज हरि नाम जपने से भी कुछ नहीं होने वाला

इसी तरह माँ के लिए हर दिन होता है , पिता के लिए हर दिन होता है , प्रेम के लिए भी हर दिन और हर क्षण होता है , फिर एक दिन के लिए Mother's day , father's day , valentine's day मनाने का क्या औचित्य ? माता-पिता से प्रेम भी मात्र एक दिन के लिए , बाकि दिन व्यस्त ? और valentine's day ?...३६३ दिनों के गुलाब का हिसाब कौन रखेगा ? बस १४ फरवरी का गुलाब अमर हो गया? बाकि जो रात-दिन धड़का उसका क्या ? अरे valentine तो मुमताज़ थीं शाहजहाँ की , जिसकी याद में बना ताजमहल सूरज की रौशनी में दमकता है और रात की चांदनी में जगमगाता है हर दिन

अब इन सबसे बढ़कर आया है 'महिला दिवस' महिलाओं को मूर्ख बनाने के लिए इस दिवस की भी रचना कर दी गयी कौन से सुर्ख -पर निकल आते हैं इस दिन ? कौन सी ताजपोशी कर दी जाती है किसी महिला की इस दिन ? अरे विवाह में तो सोने चांदी से तौलकर विदा कर ही देते हैं , की खुश रहेगी सारी जिंदगी इसी में , शिकायत भी नहीं करेगी अब एक महिला दिवस बनाकर कौन सा तमगा मिलने वाला है किसी महिला को समानता का ज़माना है , जब पुरुष दिवस नहीं है तो ये महिला-दिवस का पाखण्ड क्यूँ ?

आज ब्लॉग भ्रमण के दौरान एक पुरुष की टिपण्णी पढ़ी जिसमें महिलाओं का सम्मान करने की बात कही गयी थी। और पुरुषों से स्वयं को बदलने की अपील की गयी थी हँसी गयी पढ़कर की ये जनाब तो मौका पाते ही महिला ब्लॉगर्स का अपमान करते हैं और यहाँ शराफत का मुखौटा लगाये प्रवचन मुद्रा में हैं। अरे भाई इस दोहरे चरित्र की क्या जरूरत है

हम सभी स्त्री और पुरुष होने के पहले , इंसान हैं और हम सभी में मानवीय गुण और अवगुण दोनों हैं झूठा दिखावा करने से कोई लाभ नहीं है मन में इज्ज़त नहीं है तो महिला दिवस के नाम पर जबरदस्ती इज्ज़त करो भाई , ही घडियाली सहानुभूति दिखाओ। जो पुरुष अपनी माँ की इज्ज़त करना जानते हैं , वो अपनी पत्नी को भी पूरा सम्मान देते हैं और जो पुरुष , अपने घर की स्त्री को सम्मान देना जानते हैं वो पराई स्त्री का भी सम्मान करते हैं

इसलिए महिला-दिवस के नाम पर महिलाओं को सम्मान देना मात्र एक पाखण्ड है कृपया अपनी ऊर्जा बर्बाद करें इस प्रकार के अनावश्यक दिवसों में आठ मार्च की जगह वर्ष के ३६४ दिनों में से किसी भी दिन यदि ज़रुरत के वक़्त आप किसी महिला के काम सकें और उसके लिए मन में आदर और स्नेह का भाव रख सकें तो वही सच्चे अर्थों में एक स्त्री को सम्मान देना हुआ , अन्यथा सब दिखावा है।

कन्या-भ्रूण हत्या , दहेज का चलन , बढ़ते बलात्कार की घटनाएं बता रही हैं , महिला-दिवस के पाखण्ड को


आभार

Monday, March 7, 2011

गजब की मानसिकता --The Indian crab mentality .

लेख के प्रारम्भ में एक छोटी सी कहानी है

एक बार १० ट्रक , अलग-अलग देशों के केंकड़ों से भरे हुए जा रहे थे सभी ट्रक ऊपर से बंद थे ताकि कोई केंकड़ा बाहर निकल जाए लेकिन भारतीय-केंकड़ों से भरा ट्रक खुला हुआ था मार्ग में इंस्पेक्टर ने जांच के दौरान पूछा , इसको खुला क्यूँ रखा है , कहीं कोई ऊपर से निकल गया तो ? ड्राईवर ने जवाब दिया - " नहीं जनाब , ऐसा नहीं हो सकता , ये भारतीय केंकड़े हैं जैसे ही कोई ऊंचाई तक पहुंचेगा , नीचे वाले उसकी टांग पकड़कर खींच लेंगे"

हर जगह ऐसा ही देखने को मिलता है अक्सर। आज बाबा रामदेव के पीछे पड़े हैं सभी क्यूँ ? यदि कोई इमानदारी के रास्ते पर चलकर , देश हित में कुछ करना चाहता है तो सारे असामाजिक तत्व इतना विचलित क्यूँ हो रहे हैं।क्या बाबा रामदेव ने कोई गुनाह किया है , घोटाला किया है , जो लोग उनके विरोध में सर उठा रहे हैं ?

सच तो ये है की लोग डरते हैं , सत्यवादियों से , इमानदार लोगों से , देश भक्तों से , अन्याय और अनाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों से ऐसा इसलिए है क्यूंकि उनकी बईमानी से चल रही दूकान बंद जो हो जायेगी।लोग स्वयं तो कुछ करना नहीं चाहते , लेकिन अच्छे लोगों की राह में रोड़ा अटकाना , निंदा करना आदि उनका प्रिय शगल बन जाता है ईर्ष्या का इलाज नहीं है

आज बाबा रामदेव के साथ करोड़ों लोग हैं इसका कारण है की करोड़ों लोगों के दिल में भ्रष्टाचार दूर करने की चाहत है लेकिन सबके पास इतना वक़्त , हिम्मत और परिस्थियाँ नहीं हैं लेकिन बाबा रामदेव सच्चे लोगों की एक बुलंद आवाज़ बन गए हैं , लोगों को उनमें एक आशा की किरण दिखने लगी है , इसीलिए करोड़ों लोग बाबा के साथ जुड़ गए हैं और जुड़ना चाहते हैं गुंडों के गिरोह में गुंडे जुड़ते चले जाते हैं , और इमानदार लोगों के साथ सच्चे और अच्छे लोग आज बाबा रामदेव के साथ , किरण बेदी , अन्ना हजारे और जेठमलानी जैसी हस्तियाँ जुड़ रही हैं

बाबा रामदेव का कहना है की काला धन वापस लाओ इसमें गलत क्या है ? अगर विदेशों में रखा काला धन वापस लाया जा सके तो इसमें देश की भलाई है इतनी बड़ी मात्रा में धनराशी विदेशों में क्यूँ है यदि इसे वापस लाया जा सके तो , आगामी ३० वर्षों तक भारतवासियों को टैक्स ही नहीं भरना पड़ेगा देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी तथा देश का काया-कल्प हो सकेगा

कुछ लोग डर क्यूँ रहे हैं ? क्या उनका नाम जाहिर हो जाएगा की काला धन उन्होंने जमा किया है ? पहले घर को लूटते हैं , फिर करोड़ों रूपए विदेशों में जमा करते हैं . चोरी करके डरने की क्या जरूरत है ? दिग्विजय सिंह जैसे लोगों को देश की फिकर कम , इसकी ज्यादा है की बाबा अमीर क्यूँ है , सशक्त क्यूँ है , लोकप्रिय क्यूँ है , देशभक्त क्यूँ है और लालू जी को तकलीफ है बाबा तो सन्यासी है फिर देशभक्ति क्यूँ कर रहे हैं बैमानों को चैन से जीने क्यूँ नहीं देते अरे ! देश के बारे में सोचना किसी की बपौती है क्या ? हर नागरिक को अधिकार है की वो देश के हित में सोचे देश के नाम पर कलंक तो वो लोग हैं , जिनकी विचारधारा अति संकुचित है , अपने परिवार के आगे कभी सोचते ही नहीं देश के हित में सोचने के लिए समय ही नहीं निकाल पाते

एक सार्वजनिक अपील -
  • एक बार सोचिये ये काला धन विदेशों में पहुँचता कैसे है
  • कितने लोग इस गिरोह में शामिल हैं
  • कैश जाता है या फिर किसी और तरह से
  • किसके मार्फ़त पहुँचता है
  • क्या कस्टम अधकारी सोते रहते हैं , जांच नहीं होती , या फिर ये भी मिले हुए हैं।
  • देश का एक पैसा भी विदेशों में आसानी से ट्रांसफर नहीं हो सकता पहचान बतानी होती है बैंक कार्यरत होते हैं
  • आखिर जाता कैसे है ये काला धन विदेशों में
  • इन सब में बड़ी-बड़ी हस्तियों की मिली-भगत है।

यदि सत्ता में बैठे लोग चाहें तो अन्य देश से बात करके , उन्हें हमारा पैसा वापस करने पर मजबूर कर सकते हैं विदेशों में जमा काला धन वापस आना ही चाहिए इस मुहीम में , मैं भी बाबा रामदेव के साथ हूँ। जो लोग भ्रष्ट हैं वो बाबा रामदेव से ईर्ष्या रखते हैं और ईर्ष्या का कोई इलाज नहीं है।

जय हिंद !

Saturday, March 5, 2011

सभी ब्लॉगर सादर आमंत्रित हैं हमारे घर ..




आज अदिति के जन्मदिन पर सभी ब्लॉगर , सपरिवार , सादर आमंत्रित हैं । अपनी पोलो-टीम (बच्चों) को ज़रूर लाइयेगा। बच्चे करेंगे मस्ती और ब्लॉगर्स की हो जायेगी मीटिंग। मिल बैठेंगे ब्लोगर्स चार , घर में आ जायेगी बहार।

कहते हैं कश्यप ऋषि की दो पुत्रियाँ थीं - दिति और अदिति । जिसमें से 'अदिति' देवताओं की माता थीं । अब देवताओं की क्या कहें , मेरी जरूर माता हैं । दिन भर मुझे समझाती हैं क्या करना चाहिए और क्या नहीं ।

अदिति ने , १० फ़रवरी को Bangkok में Drama-fest में पांच अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों के मध्य प्रतियोगिता में अपने स्कूल को represent किया । नाटक "Hoodwinked" में उसका लीड रोल था , जिसमें 'Sheriff" की भूमिका के साथ अदिति ने पूरा न्याय किया । नाटक के समापन के बाद , परेंट्स , टीचर्स , और अन्य गणमान्य लोगों द्वारा मिली प्रशंसा से मन ख़ुशी से झूम उठा । अदिति के शब्दों में --- " जब सब लोग तारीफ़ कर रहे थे और बधाई दे रहे थे , तो मैं सिर्फ 'थैंक्स' कह पा रही थी , काश कोई और शब्द भी होता जो इस प्यार के बदले में कहा जा सकता" । आजकल अदिति जो अपने स्कूल में 'एडीटी' के नाम से जानी जाती हैं , उन्हें लोग 'The wicked Sheriff ' के नाम से पुकारने लगे हैं।

२५ फ़रवरी को यहाँ के लीडिंग न्यूज़ पेपर - 'पटाया-मेल' में अदिति की outstanding performance विस्तार से छपी । मन की प्रसन्नता अपने ब्लोगर मित्रों के साथ बांटकर अपनी ख़ुशी को दोगुनी कर रही हूँ ।

आज जन्मदिन की पार्टी में शुद्ध शाकाहारी , भारतीय व्यंजन हैं । यदि आपकी कोई विशेष पसंद हो तो सूचित कीजिये , उसे मेनू में शामिल करने की ख़ुशी होगी । वैसे थाईलैंड की विशेष डिश "सोमताम' का आनंद भी मिलेगा आपको ।

तस्वीरों में आप अदिति को उसके शैतान , छोटे भाई 'सुयश' के साथ देख सकते हैं ।

आभार ।