अजीत जी का एक आलेख पढ़ा , बहुत बढ़िया लिखा है, बस एक ही बात खटकी
--"चिड़ियाघर"...मन तैयार नहीं ये मानने को की ब्लौगजगत एक चिड़ियाघर है और ब्लॉगर्स उस चिड़ियाघर का हिस्सा।
वाणी जी का तर्क बहुत अच्छा लगा- "अपने दिल की बात सच्ची-सच्ची लिखने का दम होना चाहिए बस "
एक दशक पूर्व तक हिंदी ब्लौगिंग का कोई नामो-निशान नहीं था ! लोग अपने मन की बात न कह पाते थे , ना ही लिख पाते थे! लेकिन अब ये लाचारी नहीं है हमारे सामने। हिंदी ब्लौगिंग ने एक नया आयाम दिया है! आम जनता अपने मन की बात और अपने विचारों को सबके समक्ष रख सकती है।
हर
व्यक्ति अपनी रूचि और ज़रुरत के अनुसार विभिन्न विषयों पर अपनी लेखनी चला
रहा है, और इसी से लेखन में विविधता का भी कोई अभाव नहीं महसूस होता और
पूरा ब्लॉगजगत इन्द्रधनुषी रंगों से सजा हुआ दिखता है।
किसी भी
ब्लौग पर क्लिक करो, लोग अपनी-अपनी मासूम सी भाषा में अपने ह्रदय के भावों
को निचोड़ कर रखे होते हैं। सभी को पढने में अलग ही आनंद आता है।
राजनीति पर पढना और लिखना सबसे ज्यादा अच्छा लगता है---
जो भरा नहीं है भावों से , बहती जिसमें रसधार नहीं,
वो ह्रदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
Zeal











