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Monday, March 4, 2013

अपना-अपना झरोखा ..

अजीत जी का एक आलेख पढ़ा , बहुत बढ़िया लिखा है, बस एक ही बात खटकी --"चिड़ियाघर"...मन तैयार नहीं ये मानने को की ब्लौगजगत एक चिड़ियाघर है और ब्लॉगर्स उस चिड़ियाघर का हिस्सा।

वाणी जी का तर्क बहुत अच्छा लगा- "अपने दिल की बात सच्ची-सच्ची लिखने का दम होना चाहिए बस "

एक दशक पूर्व तक हिंदी ब्लौगिंग का कोई नामो-निशान नहीं था ! लोग अपने मन की बात न कह पाते थे , ना ही लिख पाते थे!  लेकिन अब ये लाचारी नहीं है हमारे सामने। हिंदी ब्लौगिंग ने एक नया आयाम दिया है! आम जनता अपने मन की बात और अपने विचारों को सबके समक्ष रख सकती है।

हर व्यक्ति अपनी रूचि और ज़रुरत के अनुसार विभिन्न विषयों पर अपनी लेखनी चला रहा है, और इसी से लेखन में विविधता का भी कोई अभाव नहीं महसूस होता और पूरा ब्लॉगजगत इन्द्रधनुषी रंगों से सजा हुआ दिखता है।

किसी भी ब्लौग पर क्लिक करो, लोग अपनी-अपनी मासूम सी भाषा में अपने ह्रदय के भावों को निचोड़ कर रखे होते हैं। सभी को पढने में अलग ही आनंद आता है।

राजनीति पर पढना और लिखना सबसे ज्यादा अच्छा लगता है---

जो भरा नहीं है भावों से , बहती जिसमें रसधार नहीं,
वो ह्रदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

Zeal

Tuesday, February 26, 2013

अब चाह नहीं है जीने की ..

अब चाह नहीं है जीने की ..
हर , तरफ है फटेहाल , अब नहीं ऊर्जा सीने की।

'यत्र पूज्यते नार्यस्तु'  के देश में अस्मिता लूटी जा रही पल-पल
बिलख रही हर बच्ची-बच्ची , भारत-माता सिसक रही
अब चाह नहीं है जीने की ...

कृष्ण-राम की भूमि पर , हिन्दू का कत्लेआम मचा
जीने का हक छीना उनसे, चहुँओर हो रहा नरसंहार
अब चाह नहीं है जीने की ...

सदियों से दिल में बसी आस्था के प्रतीक मंदिरों को नष्ट किया
छीन भरोसा जनता का अपनों का ही प्रतिकार किया
अब चाह नहीं है जीने की ...

दैत्य दानवों के मुख के जैसा, आतंकवाद मुख फाड़ रहा,
किया बसेरा डर ने, उर में --अंतर्मन भयभीत किया,
अब चाह नहीं है जीने की ..

अकूत सम्पदा के धनी नगर में, चोर-बाज़ार गरम हुआ
 कोयले से कौप्टर तक का,  मक्कारों ने व्यापार किया
अब चाह नहीं है जीने कि…

 रामसेतु को एडम्स-ब्रिज कह, गद्दारों ने लूट लिया,
लम्पट,  अधम, हिंसक-मानुष ने,  गो-माता का खून पीया,
अब चाह नहीं है जीने की ..

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टूट-टूट कर प्यार किया, हर बात तुम्हीं से कह डाली ,
उसपर से तुमने इल्जाम लगा , सब छीन लिया, सब छीन लिया.
अब चाह नहीं है जीने की ...

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Zeal








Monday, November 12, 2012

हर रात दिवाली भारत में..


हर दिन होगी होली और हर रात दिवाली भारत में
हर घर में घंटे गूंजेंगे , हर मंदिर रौशन भारत में !
स्वस्तिक से चिन्हित होकर, ॐ ॐ अब गूंजेगा
घंटो की टंकारों से , हर मंदिर गूंजे भारत में !
बजे नगाड़े सड़कों पर और शंखनाद अब घर-घर में
हर दिन होगी होली
और हर रात दिवाली भारत में !

जय माँ लक्ष्मी , श्री गणेशाय नमः
वन्दे मातरम् !

सभी मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !
दिव्या 
Zeal  

Sunday, November 4, 2012

भारत और इण्डिया का भेद कम कीजिये !

दिवाली पर मिटटी का दिया ज़रूर खरीदें...कम से कम २५....मोल-तोल न किया करें गरीबों के साथ......उन्हें मनचाही कीमत देकर उन्हें मुस्कराहट दीजिये!.....गरीबों को रोज़गार मिलता है..... भारत और इण्डिया का भेद कम कीजिये !

Zeal

Thursday, October 11, 2012

एक इकलौते वोट से बना गया प्रधानमन्त्री

बढती महत्वाकांक्षाओं ने हर किसी को प्रधानमन्त्री बनने के सपने दिखा दिए हैं ! हर कोई खुद को पोटेंशियल कैंडिडेट समझता है इस पद के लिए !  अब लद गए वो दिन जब जद्दोजहद होती थी अपनी पार्टी को जिताने की ! उम्र बीत जाती थी लेकिन अपनों के लिए कुछ करने का जज्बा समाप्त नहीं होता था !  लेकिन अब तो हर कोई खुद को ही हीरो समझता है और दूसरों को आईना दिखने में ही सबसे बड़ी काबिलियत समझता है !

आज कुकुरमुत्ते की तरह गली-गली में एक  स्कूल है और एक टूटपुंजिया सी राजनीतिक पार्टी खड़ी दिखाई देगी, लेकिन अफ़सोस तो ये है की अशिक्षित लाखों है और लोकतंत्र नदारद है ! 

एक ही पार्टी का प्रत्येक सदस्य खुद को प्रधानमन्त्री पद का दावेदार समझता है।  एक दुसरे का वोट काटकर खुद को चतुर समझता है।  वो दिन दूर नहीं जब ये सारे के सारे मौकापरस्त केवल अपने एक इकलौते वोट से ही जीतकर खुद को प्रधानमन्त्री बना हुआ समझेंगे ! 

मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं सभी ! 

  • नितीश को लगता है वो सबसे काबिल है  
  • राज ठाकरे तो खुद को खुदा सामझता है 
  • बाल ठाकरे को सुषमा सुहाती है 
  • अर्थशास्त्री तो अनर्थशास्त्री बनकर भी जमा हुआ है सत्ता में  
  • माँ का लाडला अमूल बेबी तो प्रधानमन्त्री  की कुर्सी को बपौती समझता है 
  • राउडी  राबर्ट के तो कहने ही क्या है , पूछता है अपनी सास से - " अमूल बेबी में ऐसा क्या है जो मुझमें नहीं है ? अगर वो बलात्कारी है तो मैं भी तो भ्रष्टाचारी हूँ, फिर मैं क्यों नहीं बन सकता प्रधानमन्त्री ? 
  • फिर प्रियंका गुस्से से तमतमाई, बोली- " नेहरू खानदान रीत है न्यारी, पत्नियाँ  होती हैं पतियों पर भारी , अतः प्रधानमंत्री तो सिर्फ मैं ही बनूंगी"
  • कजरारी अखियों वाले केजरीवाल का तो कहना ही क्या -अन्ना को गन्ने की तरह चूसकर किया किनारे , अब खुद को प्रधानमंत्री समझ रहा है और मुसलमानों को फंसाने के लिए उन्हें 11% आरक्षण का लालच दे रहा है ! क्योकि मुसल्मानों को खरीदना सबसे आसान जो है !
  • माया , मुलायम राबड़ी टाइप दलित तो दलितों के नाम पर आरक्षण लेकर गुडागर्दी करते हैं ! रहेंगे सब FIVE STAR  जैसे सुसज्जित बंगलों में और लूटेंगे देश को दलित बनकर ! 

 अब जिम्मेदारी उस समझदार वर्ग की है कि किसके इकलौते वोट से अपना वोट जोड़कर एक और एक दो कर दे। 

Zeal 

Sunday, May 27, 2012

रोम जल रहा है और नीरो बांसुरी बजा रहा है...

पेट्रोल में लगी आग ने उपभोक्ताओं की नीदें उड़ा दी हैं। एक और जहाँ आम आदमी इस उछाल से परेशान हुआ है , वहीँ कार कंपनियों से सर पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा है। डीज़ल कारें पहले ही डिमांड में थीं , अब उनकी डिमांड चौगुनी हो गयी है। पेट्रोल कारों के दाम काफी गिर गए हैं। उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए कार कंपनियों पेट्रोल कारों के दाम २५ हज़ार से लेकर ५० हज़ार तक कम कर दिए हैं। इसके विपरीत डीज़ल कारों की वेटिंग लिस्ट और भी लम्बी हो गयी है और दाम आसमान छू रहे हैं।

रूपए के अवमूल्यन से विदेशों से आने वाले पार्ट्स भी मंहगे हो गए हैं , लेकिन कंपनी मालिक अपना दुखड़ा नहीं कह सकते किसी से । अन्यथा उपभोक्ता और दूर भाग जाएगा।

रुपये का इस तरह तेज़ी से गिरना और पेट्रोल के धधकने से आग लगी है देश में लेकिन हमारा नीरो ( डॉ मन मोहन सिंह) बांसुरी बजा रहे हैं चैन से।

और प्रणब दा ? ....वो तो भावी राष्ट्रपति होने जा रहे हैं। फिर आग लगे बस्ती में, मस्तराम मस्ती में...इन्हें क्या ?

Zeal

Monday, March 5, 2012

चिर युवा - भारतमाता

१-अजानभा - अजा (ऋषभदेव) और नाभी (ऋषभदेव के पिता) , के नाम पर भारतवर्ष का नाम "अजानभा' था।

२-ऋषभदेव और जयंती के सौ पुत्रों में से सबसे बड़े पुत्र 'भारत' के नाम ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा। उन्होंने अनेक वर्षों तक अखंड भारत पर राज किया।

३-हिंदुस्तान-हिन्दुओं का घर।

४-आर्यावर्त- विद्वानों की भूमि।

५-कुमारिका खंड- वह भारत भूमि जो चिर-युवा है।

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गत वर्ष की प्रतिज्ञा में, क्यों न फिर बघार दूं ,


ग्यारह की प्रतिज्ञा को , बारह में विस्तार दूं ,



पुष्प सारे विश्व के , मैं इन चरण पे वार दूं,


माँ तेरे इस रूप को , मैं फिर ज़रा संवार दूं,




हर ख़ुशी को आज इस धरा पे मैं उतार दूं ,


माँ तेरी पुकार पे मैं जान भी निसार दूं !




माँ भारती की आरती में , देर न हो , कल न हो !


बलिदान मेरे पूर्वजों का, अब कभी विफल न हो !



मिटटी के इस क़र्ज़ को मैं फ़र्ज़ से उतार दूं,


माँ तुझे मैं प्यार से, दुलार दूं, संवार दूं !



जय हिंद !


जय भारत !


वन्देमातरम !



Zeal

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Wednesday, November 10, 2010

वन्ध्यत्व -एक अंतिम उपाय -- Surrogacy

Surrogacy एक वैकल्पिक उपाय हैं उन दम्पतियों के लिए , जो किन्हीं कारणोंवश माता-पिता नहीं बन सकते। एक स्त्री जो surrogate मदर बनती है , वो गर्भाधान से लेकर पूरे गर्भकाल तथा प्रसव होने तक की स्वीकृति देती है। प्रसव के बाद शिशु अपने biological parents अथवा intended parents [ जिनके लिए गर्भ धारण किया हो है ] , को मिल जाता है।

उपयोगिता -
  • वन्ध्यत्व के केस में या [female infertility]
  • यदि कुछ चिकित्सकीय कारनों से स्त्री को गर्भधारण में खतरा हो तब
  • single parent [ स्त्री अथवा पुरुष ] , जो अपना स्वयं का बच्चा चाहते हों।
  • Homosexual couple


Surrogacy के प्रकार - इसके दो प्रकार हैं ।

१-Traditional Surrogacy -
२-Gestational Surrogacy -

Traditional Surrogacy- इसमें स्त्री अपने स्वयं के गर्भ को धारण करती है। इसमें तीन प्राकर से गर्भ धारण हो सकता है -

१- Sexual intercourse [Natural insemination ]-
२-Artificial insemination - ये प्रक्रिया डाक्टर द्वारा हेल्थ क्लिनिक में ही हो सकती है ।

[अ]- Intrauterine insemination- [IUI]
[ब]-Intracervical insemination - [ICI]

इसमें intended पिता उस स्त्री का पति ही होता है, अतः पति के ही स्पर्म इस्तेमाल होते हैं। लेकिन यदि कोई समलैंगिक दम्पति है , अथवा सिंगिल परेंट है , तो डोनर स्पर्म का भी इस्तेमाल होता है।

Gestational Surrogacy -

इसमें surrogate mother के गर्भाशय में एम्ब्रियो [भ्रूण]को धारण कराया जाता है । जिसमें egg तथा sperm , intended parents के होते हैं अथवा donated भ्रूण भी हो सकता है। इसमें surrogate mother , गर्भ धारण से लेकर प्रसव तक के खर्चे को ले लेती है , अतः इसे commercial Surrogacy भी कहते हैं।

यदि Gestational carrier , कोई खर्चा न ले, केवल निस्वार्थ तथा सेवा भाव से गर्भ धारण करे तो इसे 'Altruistic Surrogacy ' कहते हैं। ये अक्सर दोस्त/सहेली द्वारा intended parents के लिए किया जाता है।

इस प्रक्रिया में शामिल लोग -

१-Biological or intended parents- वो दम्पति जो बच्चा चाहता है।
२-surrogate mother- जो दूसरी स्त्री के हित के लिए गर्भ धारण करती है।
३-चिकित्सक ।
४-वकील .
५- Surrogacy agency .

कानूनी प्रक्रिया -

Surrogacy प्रक्रिया में कानून व्यवस्था काफी complex तथा अनिश्चित है । इसमें surrogate माँ भी legal होने का दावा कर सकती है। कालान्तर में कोई परेशानी ना आये इसके लिए intended parents , प्रारम्भ से ही , कोर्ट द्वारा , माता-पिता का नाम certificate पर लिखवा लेते हैं ।

बहुत से देशों में [आस्ट्रलिया, जापान, सौदी अरेबिया , कनाडा, फ़्रांस इटली, हंगरी , होन्ग-कोंग ] आदि में commercial Surrogacy प्रतिबंधित है। जबकि बेल्जियम , नीदरलैंड, युक्रेन तथा UK आदि में यह लीगल है।
भारत में यह legal है। विदेशों से हजारों की संख्या में Surrogacy के लिए लोग भारत आते हैं।


Ethical issues -

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार , इस प्रक्रिया में surrogate माँ तथा बच्चे में भावनात्मक जुड़ाव कम ही होता है। अतः कोई परेशानी नहीं होती है कालांतर में।

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Saturday, October 30, 2010

काश्मीर को आज़ाद होना चाहिए -- भूखे नंगे हिंदुस्तान से -- अरुंधती रॉय

१९९७ में बुकर सम्मान विजेता , अरुंधती रॉय ने दिल्ली में एक सेमीनार में कहा की -- " काश्मीर को आज़ादी मिलनी चाहिए , भूखे-नंगे हिंदुस्तान से "।

एक साहित्यकार और सामजिक कार्यकर्ता के इस प्रकार के गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य अति विचारणीय एवं चिंताजनक हैं। एक लेखिका को अपने शब्दों के प्रति बेहद जिम्मेदार होना चाहिए। क्या वजह है जिसके कारण उन्होंने ऐसा बयान दिया। क्या हुर्रियत नेता गिलानी की संगत का असर है उन पर ।

हिंदुस्तान को उन्होंने भूखा-नंगा कहा । हमें शर्म आ रही उनके हिन्दुस्तानी होने पर। उनके वक्तव्य के अनुसार काश्मीर को आज़ादी मिलनी चाहिए। लेकिन क्या अरुंधती को स्वयं पहले आज़ाद नहीं हो जाना चाहिए इस देश से ।
क्या वजह है की अरुंधती जैसी कार्यकर्ता ने ऐसे देशद्रोही वक्तव्य दिया । क्या उनकी मानसिक अस्वस्थता है इसका कारण या फिर वो वास्तव में शान्ति पसंद महिला हैं । क्या वो तंग आ चुकी हैं , काश्मीर मुद्दे से और भारत शान्ति बहाली का एक अनूठा तरीका अपनाना चाहती हैं ।

या फिर वो दानवीर कर्ण बनकर इसिहास के पन्नो पर स्वर्णाक्षरों में उल्लिखित होना चाहती हैं । क्या काश्मीर दान देने से शान्ति बहाली हो जायेगी । क्या चीन , जो अरुणांचल प्रदेश पर आँख जमाये हैं वो भी दान कर दें । क्या मुंबई राज ठाकरे को दे दें ? तो फिर हिंदुस्तान कहेंगे किसको । इसकी सीमा रेखा कहाँ तक है । हमारे देश का भूगोल भी बदलने की आवश्यकता है अब। कितने राज्य हमारे देश में हैं इसका पुनर्निर्धारण करने की जरूरत है ।

इससे भी बड़ी चिंता का विषय है की की असली हिन्दुस्तानी कौन से हैं । क्या अलगाववादी हुर्रियत नेता गिलानी जैसे लोग हिन्दुस्तानी हैं ? क्या अरुंधती रॉय जैसी लेखिका जो हिंदुस्तान को " भूखा-नंगा" कहती हैं वो हिन्दुस्तानी कहलाने की हक़दार हैं ।

क्या भूख -प्यास से तड़पकर , एक लेखिका ने ऐसा शर्मनाक वक्तव्य दिया है या फिर शान्ति बहाली ही अरुंधती का उद्देश्य है ?

क्या बुकर के बाद इनका नामांकन , शांति बहाली के सद्प्रयासों के लिए नोबेल प्राइज़ के लिए होना चाहिए ?

Tuesday, June 29, 2010

जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं ?


यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ?

The moment I landed here in Thailand, the greenery, the cleanliness ,the beautifully decorated houses and malls and the smooth roads caught my eyes. The land of smiles, the land of elephants and of course the most amazing land is Thailand.

People of this alien land are cool, peace loving, and polite. They quite often giggle for no reason, may be to prove that they are from the land of smiles. Whenever i look at the beautifully trimmed shrubs and neatly mowed lawns with Palm trees, I always become nostalgic thinking of my beautiful Kerala.

The smooth roads reminds me our former prime minister A B Bajpai, who used to say that beautiful roads are a sign of prospering country. I found the land a perfect blend of European and Asian culture .

Gradually i started mingling with my own Indian folk residing here. I was too happy to find too many well educated women here as friends. Architects, doctors, engineers, CA, MBA s and professors friends. Unfortunately they all had to compromise with their career and opt for being here for the sake of husband's job and family. Anyways i started enjoying their company with long conversations in evenings.

The euphoria didn't last for long. It was my turn to discover the bitter realities associated with expats here. Men were busy with their jobs and minting money. Women were forced to pick up something of choice that can keep them busy and engaged. Unfortunately there were not many options to engage with , so a bigger lot of educated women got busy with kitty parties or gossiping in the beautiful parks in the evenings. What a waste of education !

Anyways, i couldn't adopt the social norm prevalent here among Indians, so i preferred to stay back at home in my solitude and with my only companion, my laptop and internet. Neighbors and acquaintances here started labeling me as unsocial and a loner, but i was comfortable with this adjustment.

On and off, sparingly first and later frequently i get to hear by my fellow Indians that India is bad. Not a place worth living, too much of population, corruption, filth, crime, lack of discipline, sense of responsibility , no respect for time and sincerity and so on.

Once ,a friend said, " See, how quick the service here is. Just in 5 minutes of phone call, they deliver a gas cylinder. I advocated- Can't you appreciate that in a poor country like India, with huge population, every person is availing the facility of having two LPG cylinders?. But they ignored my point.

When i purchase drinking water [45 baht per bottle of Neptune ] and spend roughly 3000 baht per month on water only, i think of our India where we get gallons of water free of cost.

When a Thai person talks politely with Indians here, they get mesmerized by their modest behavior. But i start missing my country people there ,who in majority are still polite, modest, humble and smiling against all odds.

To my utter surprise i found every second Indian here criticizing India and Indians. I was kind of tired and disappointed over such reactions of my own people about their own motherland. How one can stop loving one's own Mother?. And do we have the right to criticize India when we , ourselves are not giving our services to our own country ?

'You can take an Indian out of India, but you cannot take out Indian-ness out of Indians "

The spell is broken now.

Being nostalgic and sad somewhere, i am humming the following lines....

ओ देस से आने वाले बता, ओ देस से आने वाले बता
किस हाल मे है यारां-ए-वतन, वो बाग-ए-वतन, फिरदौस वतन
ओ देस से आने वाले बता, ओ देस से आने वाले बता

क्या अब भी वहाँ के बागों में मस्ताना हवाएं आती हैं
क्या अब भी वहाँ के पर्बतपर घनघोर घटाएं छाती हैं
क्या अब भी वहाँ की बरखायें वैसे ही दिलों को भाती है
ओ देस से आने वाले बता, ओ देस से आने वाले बता

क्या अब भी मेहकते मंदिर से नाकूस की आवाज आती है
क्या अब भी मुकदस मस्जिद पर मस्ताना अज़ान थर्राती है
क्या अब भी वहाँ के पनघट पर पनहारियां पानी भरती है
अंगडाई का नक्शा बन बन कर, सब माथे पे गागर धरती है
और अपने घरों को जाते हुएं हसती हुयीं चुहलें करती है
करती है?
ओ देस से आने वाले बता, ओ देस से आने वाले बता..