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Sunday, November 4, 2012

ब्लोगिंग और फेसबुक को बदनाम करते लोग


कुछ लोग अंतरजाल पर हुयी तरक्की को नकारात्मक मानते हैं !  विज्ञान की इतनी बड़ी देन को वरदान न मानकर उसका अपमान करते हैं !  लोगों का कहना है की अंतरजाल और फेसबुक का उपयोग करने वाले संवादहीनता रखने लगते हैं ! इसे बड़ी भ्रान्ति और क्या हो सकती है भला?

  • टेक्नोलोजी और इंटरनेट के उपयोग से पिछले एक दशक में समाज में हर क्षेत्र में क्रान्ति की लहर दौड़ गयी है
  • कविता कहानी लिखने वालों को एक मंच मिल गया है
  • लोगों का संपर्क संसाधन बढ़ा है , अपने स्वभाव और रूचि के अनुरूप मित्र एवं संपर्क बनते हैं
  • एक नयी और इमानदार मीडिया का इजाद हुआ है !
  • आम आदमी की आवाज़ बुलंद हुयी है !
  • फेसबुक ने तो लडखडाते लोकतंत्र को ही थाम रखा है !
  • कहीं भी कोई अनियमितता हुयी नहीं कि जंगल में आग की तरह फेसबुक पर जनता की आवाज़ बुलंद हो जाती है !
  • सत्ताधारी तानाशाह भी डर-डर कर थोडा अनुशासन में रहने को बाध्य हुए हैं !
  • गृहणियों की भी आवाज़ मुखर हुयी है , व्यर्थ प्रपंच से बेहतर उन्होंने लिखना समझा
  • लेखकों में ज्ञान और विश्वास बढ़ा !
  • जानकारियों से ओत-प्रोत इस  अंतरजाल ने लोगों का बौद्धिक स्तर ऊपर किया है !
  • लोगों के व्यक्तित्व का विकास हुआ है !
  • हमारा सामान्य ज्ञान समृद्ध हुआ है !

अतः निवेदन है व्यर्थ ही अंतरजाल के उपयोग , ब्लौगिंग और फेसबुक अपडेट्स को बदनाम मत कीजिये !
मैं तो टेक्नोलोजी के इस अद्भुत वरदान के लिए स्वयं को बहुत भाग्यशाली समझती हूँ ! शुक्रगुजार हूँ कि मैं इस  सुविधा का उपयोग कर रही हूँ!

Zeal

Thursday, September 6, 2012

दशक का ब्लॉगर सम्मान--एक समीक्षा

नज़ाकत और नफासत की नगरी लखनऊ में हुए ब्लॉगर सम्मान पर असंख्य पोस्टें आ चुकी हैं अब तक ! मैंने तटस्थ रहने की बहुत कोशिश की लेकिन डॉ शास्त्री की पोस्ट आज पढने के बाद बेहद दुःख हुआ इसलिए तटस्थ रहना एक गुनाह समझा और अपने मन में आये विचारों को शब्द देना ज़रूरी समझा !

कहते हैं कि -"मुस्कुराईये की आप लखनऊ में हैं "--लेकिन ये क्या , नवाबों के शहर से लौटे अधिकाँश ब्लॉगर्स के चेहरे से मुस्कान मानो उड़नछू हो गयी हो !

आखिर ऐसा क्यों हुआ ?

सबसे पहले तो आयोजकों के अथक प्रयास के लिए अनेकों बधाईयाँ ! उसके बाद सभी सम्मानित लेखक और लेखिकाओं को ढेरों बधाई एवं शुभकामनाएं !

मेरे विचार से किसी भी प्रकार का ब्लॉगर सम्मलेन हो , ब्लॉगर्स को सबसे ज्यादा उत्सुकता एक दुसरे से मिलने और परिचय प्राप्त करने कि होती है , लेकिन जैसा कि मैंने जाना और पढ़ा , दूर-दराज़ से आये ज्यादातर ब्लॉगर बिना किसी परिचय के ही लौट गए , जिससे उनमें काफी निराशा देखने को मिली !

अतिथि देवो भव-- सबसे पहला कार्य तो आने वाले प्रत्येक ब्लॉगर को यथोचित सम्मान के साथ वार्म-वेलकम दिया जाना चाहिए था ताकि लौटने के बाद ब्लॉगर कि स्मृति में वो सुखद यादगार हमेशा बनी रहे !

डॉ रूपचन्द्र शास्त्री जी के आलेख पर जो पढ़ा वह अत्यंत खेदजनक है ! एक वरिष्ठ ब्लॉगर अपमानित और ठगा सा महसूस करे यह हम सभी कनिष्ठ ब्लॉगर्स के लिए दुर्भाग्य कि बात है ! डॉ शास्त्री को समुचित सम्मान मिलना चाहिए था !

डॉ पवन मिश्र, कानपुर जी ने कुछ प्रश्न पूछे जो बेहद विनम्रता से पूछे गए थे , उसका उत्तर भी विनम्रता से दिया जाना चाहिए था , लेकिन अफ़सोस कि ऐसा नहीं हुआ ! आपस में ही एक दुसरे पर कानूनी कार्यवाई किये जाने कि धमकी कुछ अशोभनीय एवं खेदजनक लगी !

मंगलायतन पर मनोज जी ने , पवन जी को जो उत्तर दिए वे बहुत कटुता से भरे हुए थे ! यही वही उत्तर थोड़ी मिठास लिए हुए होते तो ब्लॉगर्स कि गरिमा बढती !

वो कहते हैं न कि -"फल आने पर डालियाँ विनम्रता से झुक जाती हैं "

महेंद्र श्रीवास्तव जी के आलेख से शत प्रतिशत सहमत हूँ ! उस पर आई टिपण्णी और प्रति टिप्पणियां भी सार्थक लगीं, बस एक ही बात खेद जनक लगी कि ज्यादातर टिप्पणीकारों ने महेंद्र जी के शिखा का नाम लिखने पर आपत्ति जताई , जो अनुचित लगी मुझे !

महेंद्र जी कि आपत्ति जायज़ है ! मंच पर आसीन शिखा हो अथवा वहां आसीन कोई अन्य कनिष्ठ ब्लॉगर, उसे शिष्टाचारवश अपने से वरिष्ठ ब्लॉगर को सम्मान देना चाहिए था ! मंच पर अपनी कुर्सी छोड़कर अपने से बड़े को आदर देने से कोई छोटा नहीं हो जाता ! यदि आयोजक से कोई भूल-चूक हो भी रही थी तो वह उपस्थित अन्य सम्मानित समूह अपने बडप्पन का परिचय दे सकता था !

आयोजक ने भले ही ब्लॉगर्स का सम्मान किया हो , लेकिन आयोजक समूह का सम्मान तो वहां शिरकत करने वाले सभी अतिथि ब्लॉगर्स के आगमन से ही हुआ ! अतः कोई भी आयोजन हो आयोजक को सम्मलेन में आने वाले प्रत्येक अतिथि का पूरे मनोयोग से स्वागत-सत्कार करना चाहिए , ताकि वे मधुर-स्मृतियाँ संजो सकें !

किसी भी आयोजन में सबसे अहम् होता है -- आयोजन का खर्चा ! इसके लिए यदि आयोजक इसका पूरा खर्चा नहीं वहन कर सकता तो उसे एक छोटी धन-राशि सभी आमंत्रित सदस्यों से लेनी चाहिए थी, ताकि किसी को भी खाने-पीने और ठहरने कि असुविधा नहीं होती ! सभी एक दुसरे से मिल-बैठकर परिचय प्राप्त कर सकते थे और नए सम्बन्ध बनते , जिससे आपसी मृदुता बढती ! और आयोजन कि सार्थकता द्विगुणित हो जाती !

कुछ आलेखों पर रश्मि प्रभा जी की अति निंदा की गयी है , जो अनुचित लगी ! अनावश्यक रूप से किसी को बदनाम करना बहुत गलत है ! यदि वे कार्यक्रम में उपस्थित न हो सकीं तो उसके बहुत से कारण हो सकते हैं ! हो सकता है वे अस्वस्थ रही हों !  किसी की उपस्थिति पर प्रश्न-चिन्ह  लगाना अशिष्ट  लगा !

अन्य कई आलेखों में चित्रों द्वारा इस आयोजन कि झलकियाँ अत्यंत मोहक लगीं !

पुनः आयोजक समूह, सम्मानित लेखक , लेखिकाओं एवं वहां उपस्थित सभी मित्र ब्लॉगर्स को ढेरो बधाई एवं शुभकामनाएं !

बस ध्यान रहे -- "भूल से भी कोई भूल हो ना"

Zeal

Wednesday, June 27, 2012

ब्लॉगर्स की दो कैटेगरी -- भैया के लाल जियें

ब्लॉगर को दो सरल समुदायों में वर्गीकृत किया गया है--एक दुखी रहने वाला, एक सदा सर्वदा मुस्कुराते रहने वाला।

अब ये आपके ऊपर है की आप खुश रहना चाहते हैं या फिर दुखित। जब इंटरनेट नहीं था तो भी दुखी थे ये लोग और जब तकनीक इतनी उन्नत हो गयी है तो भी दुखी हैं जनाब।

ब्लौगिंग तो एक वरदान की तरह है और ब्लॉगर्स हैं सबसे भाग्यशाली जो इस माध्यम से लिख, पढ़ और अभिव्यक्त कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस इस बात का है की कुछ ब्लॉगर्स , अन्य ब्लॉगर्स से अति दुखित रहते हैं। कभी उनके लम्बा लिखने पर उदास हो जाते हैं तो कभी उनके संक्षिप्त लिखने पर । कभी ज्यादा लिखने पर तो कभी न-लिखने पर। कभी टिप्पणियां अधिक होने पर तो कभी टिप्पणियों का विकल्प बंद होने पर। कभी मेल ज्यादा आने पर तो कभी मेल के ना-आने पर।

अब क्या किया जाए , इन्हें तो बस उदास होने का बहाना चाहिए। बारिश नहीं आई, तो भी उदास। आ गयी तो कहेंगे 'ओसारे' में क्यूँ बरसी। सर्दी आई तो बोले- "हांड कंपा रही है"। गर्मी आई तो बोले- "हवा नहीं चल रही"। आम दिया तो बोले- "गला है ज्यादा" । लीची दी तो बोले--"खट्टी है"।

इसके विपरीत ब्लॉगर्स के दुसरे समूह में मस्त रहने वाले खुशमिजाज ब्लॉगर्स आते हैं, जो हर-हाल में खुश ही रहते हैं, मस्त रहते हैं, जीते हैं और जीने देते हैं।

चाहे कोई सताए, चाहे गालियाँ दे, चाहे अपमानित करे, चाहे निंदा करे , चाहे सर चढ़ाये, चाहे टंकी चढ़ाये , वे तो बस- "मस्त राम मस्ती में , आग लगे बस्ती में" ।

नमन है ब्लॉगर्स की इस दूसरी कटागरी में आने वाले ब्लॉगर्स (लेखक/लेखिकाओं) को।

कुछ को तकलीफ है की वे लिखते ज्यादा हैं--

अरे यार, लिखे जाओ,
टाइम बचे तो पढ़े जाओ,
मन करे तो टिपिया दो ,
न करे तो आगे बढा दो।

दुखी और उदास रहने वाले ब्लॉगर्स के लिए मनभावन गीत समर्पित है---


न मुंह छुपा के जियो, न सर झुका के जियो, ग़मों का दौर भी आये तो मुस्कुरा के जियो.....

भैया के लाल जियें , हम तो सदा प्रसन्न रहने वाले ब्लॉगर हैं। आप किस समूह में आते हैं ?
Zeal

Saturday, May 5, 2012

बदलते मुद्दे-- अनवरत झगडे -- " ब्लॉगिंग बनाम फेसबुक"

२०१० में जब ब्लौगिंग में पदार्पण किया तो एक अहम् मुद्दे पर विवाद चल रहा था- " ब्लॉगिंग बनाम साहित्य" । आज एक नया विवाद छिड़ा है - " ब्लॉगिंग बनाम फेसबुक" ।

मेरे विचार से एक कलमकार की कलम बहुत से उद्देश्यों की पूर्ती करती है-

  • कभी अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है,
  • कभी मन का दर्द पिघलकर लेखनी से बाहर आ जाता है,
  • कभी सीने में उठता आक्रोश लावा बन कर फूटता है,
  • कभी नयी-नयी जानकारियाँ उपलब्ध कराता है,
  • कभी समाज में जागृति का साधन बनता है,
  • शोधार्थियों को विषय और विश्लेषण उपलब्ध कराता है।

साहित्य, ब्लौगिंग और फेसबुक सभी पर कलमकार ही योगदान कर रहे हैं। तीनों ही स्थल अपनी-अपनी जगह पर महत्वपूर्ण हैं। बड़े-बड़े साहित्य को रचने में वक़्त भी लगता है और लोगों तक उसकी पहुँच भी मंथर गति से होती है। उसकी जगह ब्लॉगिंग ज्यादा सहज और त्वरित विकल्प है। लेकिन समय की कमी के चलते , अत्यंत तीव्र गति संवाद और अभिव्यक्ति का माध्यम बना 'फेसबुक' । त्वरित अभिव्यक्ति और शीघ्र मिलने वाले समाधानों ने फेसबुक को अति लोकप्रिय बना दिया।
आज फेसबुक ने जिस गति से सामाजिक चेतना पैदा की है , वह अद्भुत है। त्वरित प्रतिक्रियाओं ने समाज में पारदर्शिता लायी है। राजनीतिज्ञों के मन में भय भी पैदा कर दिया है।

ब्लौगिंग के लाभ--
  • विषय को विस्तार से लिखा जा सकता है।
  • पुराने आलेखों को सुगमता से ढूंढा जा सकता है।
  • लेखक और पाठकों के विचार लम्बे समय तक सुरक्षित रहते हैं, जिसका पुनर-पठन संभव है।
  • उच्च कोटि का साहित्य पढने और संग्रहण करने को मिलता है।

ब्लौगिंग के दोष-
  • यहाँ मठाधीशी ज्यादा है जो फेसबुक पर नहीं है।
  • यहाँ रैगिंग और गुटबाजी भी ज्यादा दर्शनीय है।
  • विषयों के अतिरिक्त व्यक्तिगत भी लिखा जाता है।
  • अनावश्यक विवादों में समय और ऊर्जा का अनावश्यक व्यय होता है।
  • सामाजिक सरोकार पर लिखने वाले कम हैं,

फेसबुक के लाभ--
  • तीव्र गति से अपनी बात को लाखों की संख्या में लोगों तक पहुँचाया जा सकता है।
  • एक ही विषय पर लिखने वाले बहुत हैं जिससे सामाजिक सरोकार के विषयों की महत्ता बढ़ जाती है और तत्काल सकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलता है।
  • चिकने घड़े जैसे राजनीतिज्ञों को जो भयभीत कर दे , वो दम केवल फेसबुक में है।
  • लेखकों और पाठकों दोनों की संख्या ज्यादा होने से विविध विषय उपलब्ध हो जाते हैं, जिससे रोचकता बनी रहती है।
  • सामाजिकता चेतना और जागरूकता का निर्विवाद , एक सशक्त माध्यम है।

फेसबुक के दोष-
  • विषय को ज्यादा विस्तार नहीं मिल पाता।
  • लाखों की संख्या में , तेजी के पोस्टों के आते रहने से पूर्व में रखे गए विचार उसी भीड़ में कहीं खो जाते हैं।

अतः यह कहना ही ब्लौगिंग और फेसबुक में क्या बेहतर है तो वही बात हो गयी की " बेटी और बेटे" में कौन ज्यादा बेहतर है। बहुत से लेखक तो ब्लॉग और फेसबुक दोनों का इस्तेमाल कर रहे हैं , फिर वे कैसे कहें की उनकी बायीं आँख ज्यादा अच्छी है या फिर दायीं आँख।


जय माँ सरस्वती
जय ब्लॉगिंग
जय फेसबुक।

Sunday, March 18, 2012

काजल कुमार और खुशदीप सहगल की रसीली बातें

ब्लौगरीय निराशा दूर करने के लिए कुछ रसीली बातें अति उपयोगी हैं...

काजल कुमार Kajal Kumar
Mar 17, 2012 04:41 AM
भगवतीचरण वर्मा जी की पंक्तियां हैं न...
हम दीवानों की क्या हस्ती,
आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले...

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नेकी कर...कुएं में डाल...​
​पोस्ट लिख...ब्लाग पर डाल...​
​​
​ये फंडा अपनाओगे तो रहोगे हमेशा ब्लागर खुशहाल...​

घन्यवाद इन उपयोगी फंडों का...Smiles...

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अविनाश जी पूछते हैं , मठाधीश हैं तो मठरानियाँ क्यों नहीं ? -- गजब का प्रश्न है , आनंद आ गया।

महिलाएं भला कब पीछे रही हैं किसी क्षेत्र में । एक से एक माफिया भी हैं और मठरानियाँ भी।

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वैसे यदि अपेक्षाओं को ख़त्म करके कोई व्यक्ति अपने तन मन धन से किसी कार्य में डूब जाए तो शेष सब कुछ गौड़ हो जाता है। कुछ भी नहीं इस पृथ्वी पर जो मन को विचलित कर सके। अपने मन के वैराग्य को बढ़ाते जाना और लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना ही सबसे सुन्दर विकल्प है।

जय श्री राम
जय महिषासुर मर्दिनी

जय हिंद
जय भारत
वन्दे मातरम्

Zeal

Thursday, December 15, 2011

ब्लॉगिंग निठल्लों का काम है क्या ?

ब्लॉग भ्रमण के दौरान कुछ नन्हे-मुन्ने बालकों को चिंतित देखा! वे कह रहे थे की वे व्यर्थ ही हिंदी ब्लॉगिंग में सेवारत हैं! न तो उन्हें कोई पढता है, न ही टिपण्णी करता है! फिर क्यूँ इस अवयस्क पाठकों के लिए अपना कीमती वक़्त जाया किया जाया ?

हे श्रेष्ठ नर-नारियों एवं मनु की संतानों , श्री कृष्ण ने कहा है, कर्म किये जाओ, फल की इच्छा मत रखो! अतः ब्लौग-लेखन अनवरत जारी रखो !

ब्लौग लेखन निठल्लों का काम नहीं है ! मुझे तो चिराग लेकर ढूँढने पर भी कोई निठल्ला न मिला! सभी लगे हुए है अपने-अपने कर्मों में यथासंभव ! यदि कोई केवल चिकित्सा करे अथवा अभियांत्रिकी अथवा वकालत अथवा टीचिंग अथवा बाल-बच्चे देखे तो वह सार्थक कहा जाएगा ? लेकिन यदि इन्हीं कामों के साथ-साथ कोई अपने विचारों द्वारा समाज को एक सकारात्मक योगदान और अपने अनुभवों द्वारा एक समाधान दे रहा है तो वह निट्ठल्ला कहलायेगा ?

ब्लॉगर्स अपने कर्तव्यों को निष्ठां से निभाने के बाद , अपना कीमती वक़्त लेखन में लगा रहे हैं , अपने खून पसीने से अपने विचारों को लोगों तक पहुंचा रहे हैं और आप हैं की ब्लॉगिंग को निठल्लों का काम कह रहे हैं ?

पशु से भिन्न है इंसान क्यूंकि वह चिंतन करता है ! ये चिंतन यदि मस्तिष्क में ही रह जाए तो व्यर्थ है अतः लेखन के माध्यम से इसे बहुत से लोगों तक पहुंचना ही चाहिए !

हर व्यक्ति अपनी रूचि और ज्ञान के अनुसार लिख रहा है! पाठक भी अपनी रूचि के अनुसार विषय ढूंढ लेते हैं ! यही विविधता ही तो ब्लॉगिंग की रोचकता बनाए रखती है ! लोग एक-क्लिक में ही देश विदेश , राजनीति और कुटिल नीति से रूबरू हो जाते हैं ! अन्य लोगों के विचार पढ़कर हमारे विचारों को भी आयाम मिलता है !

अतः ब्लॉगिंग निठल्लों का काम है ऐसा लिखकर ब्लॉगर भाई-बहनों को अपमानित न करें !

जिन्हें लगता है की ब्लॉगिंग व्यर्थ है वे शायद अपने लिखे आलेखों से ही बोर हो गए होंगे! जब स्वयं का लिखा व्यर्थ लगने लगे तो निसंदेह ब्लॉगिंग बंद कर देनी चाहिए , लेकिन साथी ब्लौगर जो एक ऊर्जा के साथ ब्लॉगिंग कर रहे हैं उन्हें निठल्ला कहकर उनका अपमान न करें ! अपितु उनके योगदान को सराहें!

हिंदी ब्लॉगिंग तो हमारे देश में एक ज़ोरदार क्रान्ति की तरह है , जिसके माध्यम से आज सरकार गिराई जा सकती है और नेताओं की नाक में नकेल डाली जा सकती है! इस ब्लॉगिंग के माध्यम से , फेसबुक आदि से , ट्विटर से सिब्बल महोदय तक घबरा गए हैं तो आप खुद ही समझिये इसकी महिमा !

मेरे विचार से ब्लॉगिंग बुद्धिजीवियों का काम है! इंसानों का काम है जो चिंतन करता है! पशु एवं निठल्ले इस महती कार्य को अंजाम नहीं दे सकते!

अपने विचारों को एक बड़े समुदाय को प्रेषित करने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ हैं ब्लॉगिंग का माध्यम ! अब हम अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के मोहताज नहीं हैं अपने विचारों को संप्रेषित करने के लिए!

बड़े-बड़े विमर्श के लिए यह एक सस्ता एवं सुलभ माध्यम बन गया है! इसके फायदे अनेक हैं ! और फिर यदि फायदों को परे रख कर निस्वार्थ ब्लॉगिंग की जाए तो हम कर्मशील भी रहेंगे और फल न लगने की अवस्था में निराश भी नहीं होंगे !

अतः निराश ब्लॉगर्स को हताश न होने की सलाह दी जाती है तथा ऊर्जावान ब्लॉगर्स के लिए "Hats off "

जय ब्लॉगर्स !
जय हिंदी-ब्लॉगिंग !

Sunday, March 27, 2011

साहित्य लेखन बनाम ब्लौगिंग -- स्त्री-पुरुष चर्चा भाग-११

विषय दो प्रकार के होते हैं -

  • पहला- विज्ञान , आविष्कार , संस्कृति , भाषा , प्रेम , जनसंख्या , बीमारियाँ , भूकंप , प्रलय , ज्योतिष , आस्था , प्रकृति , इतिहास , भूगोल , गणित , आंकड़े , तरक्की और विकास , मंदिर , सभ्यताएं , वेद-पुराण , धर्म , भ्रष्टाचार इत्यादि ।

  • दूसरा - मन के विचार , मन का कोलाहल , मन में उत्पन्न असंख्य प्रश्न , खट्टे मीठे अनुभव , विमर्श , गोष्ठी , प्रतिक्रियाएं , उपलब्धियों की अभिव्यक्ति , मन का आक्रोश , ह्रदय की चिंता या व्यथा की अभिव्यक्ति , थोडा सा खट्टा , थोडा चरपरा , अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर ,आत्मा , पुनर्जन्म , छोटी-छोटी खुशियाँ और बहुत कुछ..
    ,

साहित्य में पहले प्रकार के विषय आते हैं। साहित्यकार इसपर अपनी लेखनी चलाते हैं और साहिय को समृद्ध करते हैं । लेकिन इसका उपयोग शिक्षा एवं शोध के दौरान ज्यादा है , जहाँ विद्यार्थी अपनी रूचि के अनुसार विषय का चयन करते हैं।

ब्लॉगिंग में उपरोक्त वर्णित , दुसरे प्रकार के विषय आते हैं , अर्थात जो ह्रदय में है उसे बिना लाग-लपेट के कहना और पूछ लेना । अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर देना और पा लेना । बिना भाषा और साहित्य की कसौटी पर चढ़े खुद को अभिव्यक्त करना । बिना किसी तमगे अथवा प्रमाण पत्र की चाह में , मन-मस्तिष्क में आये विचारों को सरलतम भाषा में 'जस का तस' रख देना ।

ब्लोगिंग एक बेहतरीन माध्यम है विमर्श का जो एक बहुत बड़े वर्ग को आपस में जोड़ने में सक्षम है । जुड़ना ही मानव-स्वभाव है । इसलिए ब्लोगिंग लोकप्रिय भी हो रही है ।

'साहित्य'
का स्थान समाज में स्त्री की तरह है। क्यूंकि स्त्री , अपने स्थान और सम्मान के लिए संघर्षरत है। वो चाहती है की उसके योगदान और अहमियत को समझा जाए । इसके विपरीत 'ब्लॉगिंग' की स्थिति समाज में पुरुषों की स्थिति के समान है --अपने आप में मस्त और बिंदास ।

जैसे स्त्री और पुरुष एक दुसरे के पूरक हैं , वैसे ही साहित्य और ब्लॉगिंग एक दुसरे के पूरक हैं। दोनों की अपनी अलग-अलग अहमियत है। मेरे विचार से वो दिन दूर नहीं जब दोनों के बीच की विभेदक रेखा मिट जायेगी । अंततः Globalization का दौर है ।

आभार

.

Tuesday, February 8, 2011

हम ब्लोगिंग क्यूँ करते हैं ?

मेरी मित्र राधिका , जो वर्षों जो मुझे जानती है , ने कहा - " दिव्या तुम बहुत complicated हो "

मैंने सादगी से कहा - " हाँ हूँ , तुम्हारे लिए " क्यूंकि जब प्रश्न हल नहीं हो पाता , तो 'कठिन' कहलाता है , जब अंगूर अप्राप्य हो जाता है तो 'खट्टा' कहलाता है और जब कोई किसी की सादगी कों समझ पाने में असफल रहता है , तो उसे complicated' कहता है।

राधिका कौन है ? -
राधिका कोई एक चरित्र नहीं बल्कि एक symbolic पात्र है । मेरा किसी से भी जो संवाद होता है , वो राधिका के नाम से लिखती हूँ। और एक ही लेख में बहुत से भिन्न-भिन्न व्यक्तियों से हुआ संवाद राधिका के नाम से ही कहा गया है , इसलिए कोई भी स्वयं कों राधिका न समझे , हाँ इसे पढने के बाद आपको अपनी झलक कहीं कहीं राधिका में अवश्य मिलेगी।

दिव्या कौन है ? -
दिव्या एक स्त्री है जो स्वयं कों सुधारना चाहती है और अपने साथ साथ , पूरे समाज कों सुधारना चाहती है । वो एक ऐसी दुनिया की कल्पना करती हो जहाँ स्त्री पुरुष समान अधिकार और सम्मान के साथ जिए, एक समाज जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो , एक परिवेश जिसमें सभी संवेदनशील हो , द्वेषमुक्त हों तथा अपनापन हो।

वो एक मुखर , स्वीकारात्मक व्यक्तित्व की है जो अपने सामने आई समस्याओं कों no-nonsense तरीके से सुलझाने का प्रयास करती है। वो एक सामान्य व्यक्ति की तरह कुछ कमजोरियों और कुछ अच्छाइयों का मिश्रण है जो अपने मन के द्वन्द कों स्वयं तक ही सीमित रखती है और उनके हल ढूँढने के बाद समाजोपयोगी रूप में प्रस्तुत करती है । उस सहानुभूति पसंद नहीं है क्यूंकि वो उसे कमज़ोर करती है , और कमज़ोर व्यक्तित्व समाजोपयोगी नहीं रह जाते । वो अपने चारों तरफ एक कठोर आवरण बुन कर रखती है , जो अभेद्य कवच की तरह उसकी रक्षा करते हैं। वो अपने मित्रों के साथ कठोरता से ( straight forward) तरीके से पेश आती है , क्यूंकि वो उन्हें भी कमज़ोर नहीं पड़ने देना चाहती , उन्हें strong देखना चाहती है। मित्रों की strength दिव्या की भी ताकत है ।

दिव्या अन्दर से एक कोमल और भावुक व्यक्तित्व की धनी है , लेकिन अपनी भावनाओं का प्रदर्शन नहीं करती क्यूंकि उसे लगता है की इस विनाश शील सृष्टि में भावनाओं का कद्र करने वाले विरले ही हैं। कोई चार दिन आपको समझेगा लेकिन फिर मानवीय दुर्गुण जैसे - पूर्वाग्रह , ईर्ष्या, अहंकार , द्वेष आदि उस पर हावी हो जायेंगे जो परस्पर सम्बन्धों में दूरी लाते हैं। इसलिए बेहतर है की हर किसी के साथ एक निश्चित दूरी पर ही रहा जाए।

आप अच्छे थे पहले अजनबी की तरह ।
मुझसे मिलते तो थे अपनों की तरह ।
अपना बनकर तो आप बहुत दूर हो गए
अब कुशल क्षेम भी होती है गैरों की तरह ।


एक बार राधिका ने मुझसे कहा - " मैंने मित्रों से शर्त लगाई है , तुम्हारी ब्लोगिंग छह महीने से ज्यादा नहीं चलेगी। मैंने कहा- " हर चीज़ का अंत तयशुदा है । मैं हारूंगी तो तुम्हारी जीत का जश्न मनाऊँगी । "

कल राधिका ने मुझसे पूछा - " तुम ब्लॉगिंग क्यूँ करती हो , पैसा भी नहीं मिलता और समय की बर्बादी करती हो , तुम जो कर रही हो उसे समझने वाले भी बहुत कम हैं "

मैंने कहा -
  • आज तक समाज ने मुझे बहुत कुछ दिया है , अब मेरी बारी है लौटाने की । मेरा भी छोटा सा योगदान होना चाहिए उस समाज कों जिसमें मैं रहती हूँ। ( social service )
  • मेरा समय किसी सकारात्मक जगह उपयोग हो इसलिए लिखती हूँ।
  • लिखने के बहाने पढ़ती भी हूँ , जिससे मेरा खुद का ज्ञानार्जन होता है ।
  • किसी विषय पर दूसरों से सीखती हूँ और कुछ विषयों पर लगता है मैं योगदान कर सकती हूँ। कोई भी अपने आप में सम्पूर्ण नहीं है।
  • संसार में हमारा जन्म किसी विशेष प्रयोजन से होता है । उसे पहचानना है और उसे अंजाम देना है । हर कार्य का पुरस्कार " धन " नहीं होता। कुछ कार्य अपने आत्मिक संतोष के लिए निस्वार्थ भाव से भी किया जाता है ।
  • ब्लोगिंग से बहुत कुछ सीखा है । इसके कारण मेरे मस्तिष्क के अन्दर नया वसंत आ गया है । रंग बिरंगे फूलों की तरह अनेक सतरंगी विचार आते हैं और उस पर पाठकों के विचार पूरे उपवन की सुन्दरता कों द्विगुणित कर देते हैं।
  • लोगों का व्यक्तित्व पढना मेरा शौक भी है , जिसके लिए ब्लोगिंग एक सार्थक माध्यम है ।
  • जीवन एक सफ़र है , जिसमें मुसाफिर मिलते हैं और एक मकाम आने पर बिछड़ जाते हैं। कारवां बनता और बिखरता है । इसी प्रक्रिया में मोह-माया से गुज़रते हुए एक दिन ये प्राण उस अनंत यात्रा पर निकल जायेंगे।

एक बार मैंने राधिका से पूछा - " तुम मुझे पत्र लिखती हो , मेरे लेखों का इंतज़ार करती हो , शिद्दत से पढ़ती हो , मुझसे कहती हो - मेरा सम्मान भी करती हो और प्यार भी करती हो । फिर क्यूँ कतराती हो अपने विचार रखने से मेरे लेखों पर ? ".......राधिका ने जवाब नहीं दिया।

मैंने राधिका से कहा - " Beauty lies in the eyes of beholder "
एक बार प्यार से तो देखो , सादगी भी दिखेगी ।