बात ३-४ वर्ष पूर्व की है । मैं रेल से सफ़र कर रही थी । लखनऊ से ग्वालियर छपरा एक्सप्रेस में । मेरे साथ मेरा १२ वर्ष का भतीजा भी था । छुट्टियों में कुछ दिन मौसी के घर रहना चाहता था। सामने वाली बर्थ पर खिड़की के पास चुप चाप बैठा कॉमिक्स पढने में व्यस्त था।
एक सज्जन RAC वाली बर्थ पर पूरे लेटे हुए थे , किसी कों स्थान नहीं देना चाहते थे । देखने में वो सेव की तरह लाल तथा भयानक रूप से मोटे थे । किसी अमीर व्यापारी की तरह लग रहे थे । उनके साथ करीब दस साल की एक दीन हीन , अकिंचन सी बच्ची साथ थी , जो शकल सूरत से शायद उनकी नौकरानी लग रही रही थी । सच नहीं जानती पर संदिग्ध लग रहे थे फिरहाल वो ।
वो बच्ची बैठे रहकर खिड़की से बाहर देखना चाहती थी लेकिन वो सज्जन बार बार उसे लेटने का आदेश दे रहे थे । सहमी सी लड़की आदेश का पालन करते हुए थोड़ी देर पैर सिकोड़कर लेट जाती , लेकिन फिर उठकर चुप-चाप खिड़की से बाहर देखने लगती । उसी बर्थ पर मेरा भांजा बैठा था । लड़की इस बात का पूरा ध्यान रख रही थी की लेटने पर उसका पाँव , भांजे कों स्पर्श न करे ।
यही क्रम चलता रहा , उन सज्जन कों किसी हालत में चैन नहीं पड़ रहा था , वो चाहते थे , वो भी लेटे रहे और वो लड़की भी लेटकर ही सफ़र तय करे , ताकि उनका पैसा वसूल हो जाए , चाहे उसके लिए सहयात्रियों कों कष्ट हो , अथवा विवाद हो , अथवा मासूम बच्चे अपने तरीके से यात्रा का आनंद ना ले सकें ।
सभी लोग उन सज्जन का तमाशा देख रहे थे , लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा था । उनकी ढीठता और लड़की की मजबूरी सबको दिख रही थी , लेकिन शिष्टता किसी कों भी बोलने से रोक रही थी ।
जब उन सज्जन कों खुजली ज्यादा होने लगी तो उन्होंने उस लड़की के लिए जबरदस्ती बीच वाली बर्थ खोल दी और उससे उस पर लेट जाने कों कहा । लड़की बेचारी मन मारकर ऊपर चढ़ गयी । अब लेटे रहना उसकी मजबूरी थी और खिड़की से दिखते दृश्यों से भी वो वंचित हो गयी थी।
और उन सज्जन का जो उद्देश्य था की वो मेरे भांजे कों उस बर्थ पर बैठे नहीं देखना चाहते थे वो भी पूरा हो गया। बीच की बर्थ खुलने के कारण निचली बर्थ पर कोई भी व्यक्ति नोर्मल तरीके से नहीं बैठ सकता था । भांजा अपना सर झुकाकर तकलीफ से बैठ गया और उसने कॉमिक की किताब भी बंद कर दी । हर किसी कों तकलीफ देकर वो सज्जन बहुत विजयी महसूस कर रहे थे । सभी सहयात्री ख़ामोशी से ये नज़ारा देख रहे थे । भांजे ने मेरी तरफ मजबूरी वाली निगाहों से देखा फिर चुप चाप खिड़की के बाहर देखने लगा , वो झुककर बैठ नहीं पा रहा था ।
मुझसे ये नहीं देखा गया , मैंने धीरे से उन सज्जन से कहा , आपने बिना वजह यह बीच की बर्थ खोल दी , नीच कोई बैठ नहीं सकता है अब । बच्चे कों भी तकलीफ हो रही है ।
इतना सुनना था की वो सज्जन जो अब तक भड़ास में भरे बैठे थे , बिदक कर मुझे खरी खोटी सुनाने लगे । कहने लगे ये हमारी बर्थ है , और आपका भांजा जबरदस्ती इस पर बैठा है । एक स्त्री कों अकेली सफ़र करते देख उन्होंने सोचा इसको कुछ भी बोल दो , क्या कर लेगी । उनका लहजा बहुत अपमानजनक था। काफी झगडालू लग रहे थे और ऊंची स्वर में उनके बोलने से मैं डर गयी और बेईज्ज़ती ज्यादा न हो जाए , उनका कोई जवाब नहीं दिया और चुप चाप बैठी रही ।
जिंदगी में ऐसा पहला अनुभव था । पांच मिनट गुज़र गए । मन में बेचैनी थी , गुस्सा था , अपनी लाचारी पर तरस भी था और कायरों की तरह बैठे तमाशबीन सह-यात्रियों पर खेद भी । एक स्त्री होने का अब समाज में कोई स्थान तो है नहीं , लोग rival समझते हैं और जहाँ मौक़ा पाया , वहीँ कर दो इसका अपमान , क्या कर लेगी ? ऐसा सोचते हैं।
मैं दस मिनट तक अपने मन में घुटती रही , फिर अचानक एक विचार आया , इस गुंडे कों ऐसा सबक सिखाउंगी की जिंदगी भर किसी का अपमान नहीं करेगा ।
अचनाक मैं उससे मुखातिब हुई , कड़क आवाज़ में कहा - " उठ कर बैठिये " । वो आज्ञाकारी बालक की तरह बैठ गया । मैंने कहा - " टिकट निकालिए " । वो तीखी आवाज़ में बोला - " पहले आप दिखाइये"
मेरे अन्दर उस समय जाने कहाँ का साहस आ गया था ।-- " मैंने कहा , टिकट निकालिए , ज़रा देखूं किस बात पर आप इतना अकड़ रहे है । " उसने अपना टिकट दिखाया , उसके पास केवल एक सीट थी जिस प़र वो पूरा विराजमान था । फिर मैंने अपना टिकट निकालकर बगल बैठे सहयात्री कों दिखाया जिस पर दो सीटों का आरक्षण था । एक मेरा और एक मेरे १२ वर्षीय भांजे का । " ३४ नंबर" की बर्थ जिस पर वो उस लड़की कों जबरदस्ती लिटाना चाहता था वो सीट भांजे की ही थी , जिस पर उन सज्जन ने उसे सर झुकाकर बैठने कों मजबूर कर दिया था ।
अब चुप बैठी जनता भी मेरे साथ थी । उन सज्जन की अकड़ ढीली पड़ चुकी थी । ऊंट पहाड़ के नीचे आ चुका था ।
मैंने कहा - " एक स्त्री कों अकेली देखकर उसका अपमान मत कीजियेगा अब कभी । यदि कोई शराफत से चुप बैठा आपको बर्दाश्त कर रहा है तो उसे मूर्ख भी मत समझिएगा । रेल यातायात के नियमों कों समझिये और प्रातः आठ से लेकर रात्री आठ तक बैठने की व्यवस्था और उसके बाद सोने का नियम , इसलिए गुंडई दिखाकर जबरदस्ती सहयात्रियों कों कष्ट मत दीजियेगा। और ये जो छोटी बच्ची कों आप एक नौकरानी की तरह ले जा रहे हैं और जबरदस्ती लेटने कों कह रहे हैं वो भी अनुचित है " । मेरा भांजा आपका तो कुछ नहीं लगता , इसलिए आप इतनी निर्दयता से पेश आये उसके साथ। वो चुप चाप कॉमिक पढ़ रहा था तो आपसे उसकी ख़ुशी भी बर्दाश्त नहीं हुई । और मैं , जो आपकी सहयात्री हूँ, उससे आपने तमीज के साथ बात करना भी उचित नहीं समझा , क्यूंकि मैं स्त्री हूँ , आपकी गुंडागर्दी से डर जाउंगी ? "
इसके बाद तो उन सज्जन कों अन्य यात्रियों के भी ढेरों प्रवचन सुनने पड़े , और झांसी आते ही वो झोला लेकर उस बच्ची के साथ भाग खड़े हुए । झाँसी से ग्वालियर २ घंटे का सफ़र हमारा सुखमय रहा ।
मैं भांजे के बगल में बैठ गयी , वो डरा हुआ था , मुझे देखकर पहली बार मुस्कुराया , बोला -- " मौसी मज़ा आ गया , आज इनको अच्छा lesson मिला होगा "
मैंने कहा - " बेटा मज़ा तो आज पहली बार मुझे आया है , एक स्त्री लाचार नहीं है , इस बात का सुखद अनुभव किया है मैंने "
डरने वाले कों लोग और डराते हैं , दबाते हैं और धमकाते हैं । गलत प्रवित्ति बढती जाती है और सीधे सच्चे लोगों के बीच खामोशी बढती जाती है । सत्य में जो ताकत है वो किसी और चीज़ में नहीं। जब हम सही होते हैं तो ये सच ही हमारी ताकत बनता है और हर परिस्थिति में हमें हिम्मत देता है । हमारे पास टिकट था ( जो हमारा सच था ) , और इसी सच ने हमें आवाज़ उठाने की शक्ति दी । इसी सच ने वहां उपस्थित समाज कों हमारे समर्थन में भी खड़ा कर दिया ।
"God helps those who help themselves "
आभार ।