Tuesday, February 22, 2011

ब्लॉगजगत में गुंडागर्दी या मात्र एक गीदड़-भभकी ?

Mithilesh dubey has left a new comment on your post "निर्वस्त्र होने से क्रांति नहीं आती , ना ही न्याय ...":

मेरा कमेन्ट क्यूँ प्रकाशित नहीं किया गया ??? उसमे क्या अभद्रता थी , कृपया उसे सार्वजनिक करें अन्यथा अपनीछिछा लेधर के लिए तैयार रहिये , शायद आपने अभद्रता देखी नहीं है अभी तक ????

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Posted by Mithilesh dubey to ZEAL at February 21, 2011 7:21 PM



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उपरोक्त टिपण्णी है मिथिलेश दूबे जी कि , जिन्होंने तिलमिलाकर मेरी छिछा लेदर करने कि धमकी दी है । दूबे जी , आप स्वतंत्र हैं अपने ब्लॉग पर कुछ भी करने के लिए । ब्लॉग भी आपका है और लेखनी भी आपकी । जी भरकर छिछा-लेदर कीजिये ।समझ नहीं आता ये ब्लोगर किसी कि रोजी-रोटी चलाते हैं जो इस अंदाज में धमकाते हैं जैसे सरपरस्त हों ।

न मैं किसी कों जबस्दास्ती अपनी पोस्ट पढने कों कहती हूँ , न ही टिपण्णी करने कों । पाठकों पर किसी प्रकार कि पाबंदी नहीं है । और मुझ पर भी किसी प्रकार का दबाव नहीं है । कोई भी मुझे अपनी टिपण्णी छापने के लिए विवश नहीं कर सकता ।

जो लोग विषय पर सहमत या असहमत हैं , उन दोनों के विचारों का स्वागत है , लेकिन जो लोग द्वेष , ईर्ष्या , पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कमेन्ट लिखते हैं , उनका स्वागत कतई नहीं है । मुझे सबसे बुरे वे लोग लगते हैं जो व्यक्तिगत आक्षेप करते हैं लेखिका पर । ऐसी अभद्र टिप्पणियां सीधे spam में जाती हैं। समय नष्ट करने वाले , धमकी देने वाले और झगडालू लोग दूर ही रहे।

जो समय एक सकारात्मक लेख लिखने में लगना चाहिए वो इन भड़ासियों के कारण बर्बाद हो जाता है । बहुत सोचा इसको avoid कर दूं , लेकिन फिर लगा कि इनका असली चेहरा भी सामने आना चाहिए लोगों के ।

दूबे जी , जाइए अपने ब्लॉग पर दिव्या को जी भरकर गाली दीजिये । बहुत से लोग यही कर चुके हैं , आप भी उसी जमात में शामिल हो जाइए । आपकी छिछा लेदर पर दो चार छछूंदर तो आ ही जायेंगे उचकते हुए , आपको मरहम लगाने और अपनी पुरानी रंजिश निकालने।

याद रखियेगा , शांतिप्रिय एवं समझदार ब्लोगर्स के पास नीर-छीर विभाजन करने का विवेक है । वो अपनी बुद्धि से किसी के बारे में राय बनाते हैं। आप जैसे भड़ासियों कि द्वेषपूर्ण पोस्ट द्वारा नहीं।

जैसे दुनिया अच्छे लोगों पर टिकी हुई है वैसे ही ब्लॉगजगत में भी बेहतरीन लोगों कि कमी नहीं है । बहुत से पाठक और ब्लोगर्स मित्रवत हैं, जिनकी शुभकामनायें ही मेरी ताकत हैं।

Sunday, February 20, 2011

निर्वस्त्र होने से क्रांति नहीं आती , ना ही न्याय मिलता है .

आजकल समाचारों में पढने कों मिलता है कि अमुक स्त्री ने न्याय ना मिलने पर अदालत में निर्वस्त्र होकर विरोध जतायाकहीं कोई स्त्री ससुराल में प्रताड़ित होती है तो दिल्ली , मुंबई की सड़कों पर निर्वस्त्र दौड़ पड़ती हैकहीं पर समाज के ठेकेदार ( राम सेना के चीफ ) जैसे लोग मॉरल-पुलिसिंग करते हैं तो महिलाओं द्वारा 'pink chaddi campaign' चलाया जाता हैकहीं सूखा पड़ा है तो स्त्रियों के निर्वस्त्र होकर खेतों में हल चलाने से , इंद्र देव प्रसन्न होकर बारिश करायेंगे आदि

इस तरह से न्याय नहीं मिलता ना ही कोई क्रांति लायी जा सकती हैये स्त्री की एक अत्यंत ही लाचार और हताश अवस्था कों इंगित करती हैइस तरह के आचरण से लाभ नहीं होगा अपितु स्त्री की गरिमा कों क्षति पहुंचेगीइसलिए यदि अपने अधिकारों के लिए लड़ना है , तो अपनी गरिमा और मर्यादा कों कदापि नहीं भूलना हैजिस सभ्यता को पाने में युगों लग गए , उसे त्यागकर आदि-मानवों की तरह आचरण करने से क्या हासिल होगायह तो खुद के ऊपर अत्याचार करने जैसा हुआ

ऐसे आचरण जिससे, स्त्री और पुरुष सभी असहज हो जाएँ , उसे न्याय पाने का हथियार क्यों बनाना ? न्याय तो मिलेगा नहीं , मानसिक अस्पताल में भर्ती होने का आदेश ज़रूर मिल जाएगा

आज भी समाज में स्त्री एवं पुरुष के बीच दोहरा मापदंड हैस्त्री चाहे गरीब हो अथवा अमीर , गावं की हो अथवा शहर की , पढ़ी-लिखी हो अथवा अनपढ़ , सभी कों पुरुष से कमतर समझने की ही मानसिकता हैइसी मानसिकता का परिणाम है - कन्या भ्रूण हत्या , दहेज़ , सती प्रथा आदि

ऐसी मानसिकता वाले समाज से कुछ मांगो नहीं , क्यूंकि मांगने वाला सिर्फ 'भिक्षु' होता हैवो कभी भी स्वयं पर गर्व नहीं कर सकताअपना हक माँगा नहीं जातासाम , दाम , दंड , भेद से लड़कर हासिल किया जाता है

पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से , मुस्कुराओ तो कोई बात बने
सर झुकाने से कुछ नहीं होता , सर उठाओ तो कोई बात बने
अपना हक संगदिल ज़माने से , छीन पाओ तो कोई बात बने


आप बताइए कैसे लड़ी जाए ये लड़ाई ?

  • सबसे पहले तो अपने तन पर वस्त्रों की गरिमा कों समझियेकिसी भी हालत में स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने वाले इन वस्त्रों का अपमान मत कीजियेलाचारी एवं हताशा की अवस्था में भी मर्यादित रहियेये वस्त्र इतने गरिमामयी होने चाहियें की देखने वालों की नज़र भी श्रद्धा एवं सम्मान से भर जाए । ( अन्यथा स्त्री कों निर्वस्त्र देखने वाले उन्मादी असंख्य हैं )
  • पिंक चड्ढी की जगह , मॉरल पुलिसिंग करने वालों कों ' चप्पलें ' भेजनी चाहियें
  • एकता में बल है , इसलिए किसी भी अभियान कों एकजुट होकर सफल बनाया जा सकता है
    यदि व्यक्ति सही है तो उसे समर्थन करने वाले भी मिल जायेंगेइसलिए खुद कों लाचार समझने की ज़रुरत नहीं हैसंवेदनशील लोगों से सहयोग की अपेक्षा की जा सकती है
  • खुद को इतना मज़बूत बनाइये की अन्याय करने वाला अपने ही बाल नोंच डाले ।

ग्रंथों , पुराणों और उपनिषदों में नारी को 'देवी' कह दिया गया लेकिन विरला ही कोई होगा जो स्त्री को देवी समझता होगाइसलिए गलती से भी स्वयं को देवी की भूल-भुलैय्या में ना रखिये

मनुष्य बने रहकर , निर्भय होकर सबसे पहले खुद में आत्मविश्वास लाइएजब आप स्वयं का सम्मान करना सीख जायेंगी तो जमाना आपके साथ-साथ चलेगा

आभार

Friday, February 18, 2011

महिला स्वाभिमान !

स्त्री एवं पुरुष जीवन में एक दुसरे के पूरक हैं रथ के दोनों पहियों के परस्पर समन्वय से ही जीवन रुपी रथ मंथर गति से , अनेक विघ्न बाधाओं कों पार करते हुए आगे बढ़ता रहता है। एक समझदार स्त्री एवं पुरुष एक दुसरे कों अच्छी प्रकार समझते हैं और एक दुसरे के प्रति सहयोग कि भावना रखते हैं।

बचपन से बड़े होने तक हम अपनी माँ और पिता कि छत्रछाया में बढ़ते हैं। वो भी तो एक स्त्री और एक पुरुष हैं उन दोनों कों परस्पर एक दुसरे का सहयोग और सम्मान करते हुए देखते हैं तभी अपने छोटे से परिवार कि पूर्णता दिखती है माता और पिता कों हम बराबर प्यार और सम्मान देते हैं। दोनों में से कोई भी हमें किसी से कमतर नहीं लगता लेकिन अफ़सोस जब हम बड़े होते हैं तो क्यूँ हम स्त्री और पुरुष एक दुसरे से अलग देखते हैं क्यूँ हम स्त्रियों की समाज में कमज़ोर स्थिति के लिए पुरुषों कों जिम्मेदार ठहराने लगते हैं।

मुझे लगता है स्त्रियाँ अपनी स्थिति के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं माना कि समाज का ढांचा सदियों से कुछ इस प्रकार का रहा है कि स्त्री के हिस्से में घरेलू काम और पुरुष के हिस्से में धनोपार्जन आता है लेकिन यदि कोई महिला कार्यों के इस आबंटन से संतुष्ट नहीं है तो उसे बिना अपने पति कों दोष दिए ही अपनी रूचि के अनुसार नौकरी करनी चाहिए अच्छी नौकरी , जिसमें पैसा और इज्ज़त दोनों ज्यादा हो , उसके लिए स्वयं कों बेहतर शिक्षित भी करना होगा

इसके लिए स्त्री कों स्वयं ही सोचना होगा स्कूलों और विद्यालयों में लड़का लड़की का कोई भेद नहीं है माता पिता भी बेटे और बेटी कों समान शिक्षा का अवसर देते है विवाह के बाद पति भी अपनी पत्नी कों बढ़ते हुए देखना चाहता है अपनी पत्नी कि तरक्की और ख़ुशी में पति भी गौरवान्वित महसूस करता है वो पत्नी के ऊपर घरेलू कार्यों के बोझ कों कम करने के लिए उसका हाथ बंटाने में सहयोग करता है और पत्नी भी पति के जिम्मे कुछ कार्यों कों अपने ऊपर ले लेती है इस प्रकार काम के बोझ और काम कि प्रकृति दोनों कों समान रूप से मिलती जाती है दोनों कों एक दूसरे से कोई शिकायत नहीं रहती मन में कोई अवसाद और क्लेश नहीं रहता और जीवन मधुर और सुखमय होता है

जो महिलाएं आज उच्च पदस्थ हैं , देश का नाम रौशन कर रही हैं , वो भी हमारी तरह स्त्रियाँ हैं। वे तो पुरुष प्रधान सत्ता कों दोष नहीं देतीं क्यूंकि उन्होंने शिकायत करने जैसी महामारी से स्वयं कों बचा कर रखा में और अपनी सकारात्मक ऊर्जा कों अपने ही विकास में लगाया और सक्षम होने के बाद अपना योगदान समाजोपयोगी रूप में कर रहीं हैं। वो कुंठित नहीं हैं। कुंठा मन में तब आती है जब हम स्वयं कों असक्षम पाते हैं तब। हमारी कमतरी के लिए पुरुष जिम्मेदार नहीं हैं। हमें प्रेरणा लेनी चाहिए समाज में जिन स्त्रियों ने अपना स्थान बनाया है , अपनी पहचान बनायी है

जो स्त्रियाँ कुछ करना चाहती हैं , समाज में स्थान चाहती हैं वो स्वयं ही विकट से विकट परिस्थिति में भी बेहतर विकल्प ढूंढ लेती हैं। सर्वप्रथम तो स्वयं कों शिक्षित करती हैं फिर नौकरी करके या फिर बच्चों कों पढ़ाकर या फिर पत्र पत्रिकाओं में लेख लिखकर समाज में एक जागरूकता लाने का सार्थक कार्य कर सकती हैं। सकारात्मक कार्य करने वाली एक स्त्री अनावश्यक रूप से शिकायती नहीं होती प्रसन्नचित्त रहती है

लेकिन कुछ स्त्रियाँ के पास समय प्रचुर मात्रा में होता है पति अच्छा कमा रहा है तो उनके पास नौकर होने कि अवस्था में कुछ ख़ास कार्य शेष नहीं रह जाता खाली दिमाग शैतान का घर दिन भर समय नष्ट करना फालतू टीवी सेरियाल्स देखना , जिसमें कुछ भी सकारात्मक देखने कों नहीं मिलता फिर बचे हुए समय में अनावश्यक करना और समय नहीं कटता इसलिए किटी-पार्टीज़ जैसे विकल्प कों अपनाती हैं। रोजाना कि इसी दिनचर्या से उनके दिमाग कों घुन लग जाता है थोड़ा ऊपर उठकर सोचने कि शक्ति का उनका ह्रास हो जाता है यही बहुमूल्य समय वो अपनी मानसिक गुणवत्ता बढ़ाने में कर सकती हैं शिक्षा के प्रचार प्रसार में सहयोग कर सकती है पत्र -पत्रिकाओं , जर्नल्स , periodicals तथा समाचारों द्वारा खुद कों अपडेट रख सकती है जितनी ज्यादा ज्ञान होगा उतना ज्यादा योगदान होगा उसका समाज और परिवार के लिए , खासकर उसके अपने बच्चों की बेहतर परवरिश में।

यदि हम समाज के गरीब वर्ग कि बात करें तो वो एक मेहनतकश जीवन गुजारती हैं , घर के काम के साथ साथ वो मेहनत मजदूरी कर आर्थिक रूप से अपने पति का सहयोग करती हैं।

मिडिल क्लास कि बात करें तो वो भी यथासंभव अपनी योग्यतानुसार नौकरी करती हैं पति का सहयोग करती हैं और कुंठित नहीं रहतीं

एक वर्ग ऐसा है जहाँ पति ज़रुरत से ज्यादा कमा रहा है पत्नी के पास हर सुविधा और ऐशो आराम है घरेलू कामों के लिए नौकर भी हैं। ये ही महिलाएं अक्सर आराम तलब बन जाती हैं अपनी शैक्षणिक योग्यता कों ताख पर रख , अनावश्यक gossip , आदि में बहुमूल्य समय नष्ट करते हुए अपना जीवन व्यर्थ गुज़ार देती हैं।

स्त्रियों कों प्रेरणा लेने चाहिए समाज कि उन महिलाओं से जो समाज में विभिन्न संस्थानों में कार्यरत हो, पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं हमें प्रेरणा लेनी चाहिए मध्यम वर्ग कि मेहनतकश महिलाओं से जो बिना किसी कुंठा के , सकारात्मक सृजन में अनवरत लगी हुई हैं। प्रेरणा उन मजदूर वर्ग कि महिलाओं से , जिनकी लगन ये सन्देश देती है कि - जीवन एक संघर्ष है , मुस्कुरा कर जियो , शिकायतों का कोई स्थान नहीं है

अधिकाँश पुरुष अपने समय कों व्यर्थ नहीं करते हमें पुरुषों से भी प्रेरणा लेनी चाहिए कि कैसे वो अपने जीवन कों नियंत्रित करते हैं , और प्रसन्नचित्त रहते हैं यदि समाज में उनकी स्थिति ज्यादा सुदृढ़ है तो हम महिलाओं कों उनसे सीखना होगा कि वे हमसे ज्यादा सशक्त क्यूँ और कैसे हैं एक बार यदि हम कोशिश करेंगे तो खुद कों बेहतर बनाकर समाज में अपना स्थान बनाकर कुंठा से दूर रह सकेंगे।

यहाँ मेरे आस पास के परिवेश में जितनी भी महिलाएं हैं वो सभी उच्च शिक्षित हैं समय इफरात है , इसलिए किटी पार्टीज़ जैसे विकल्प से स्वयं कों व्यस्त रखती हैं। मुझसे कहा शामिल होने के लिए , और जब मैंने इनकार किया तो मुझ पर बहुत ही unsocial , असामाजिक होने का टैग लगा दिया मैं खुश हूँ इस टैग से , कम से कम मैं जो करना चाहती हूँ वो कर तो पा रही हूँ।

जब मैं भारत वापस आउंगी तो मेडिकल प्रैक्टिस करुँगी लेकिन जब तक यहाँ हूँ , तब तक ब्लोग्स के माध्यम से स्वास्थ्य एवं सामाजिक विषयों पर लिखकर समाज के लिए योगदान जारी रहेगा हम अपने बच्चों के सामने भगत सिंह , डॉ कलाम , कल्पना चावला और किरण बेदी जैसे व्यक्तित्वों कि मिसाल रखते हैं ताकि वो प्रेरणा ले सकें , इसलिए मुझे लगता है कि अपनी कमतरी पर रोने के बजाय और शिकायत करने से बेहतर है खुद का मानसिक विकास करना और एक मिसाल कायम करना स्त्री हो या पुरुष , स्वाभिमान के साथ जीना उसके अपने हाथ में है

मेरी दिनचर्या -
  • परिवार के लिए पौष्टिक भोजन पकाती हूँ।
  • विभिन्न विषयों पर ब्लॉग लेखन एवं पठन , जिससे मेरे दिमाग कों जंग लगे और अपनों के बीच हूँ , इस बात का भी एहसास होता है
  • IBM के चार बच्चों कों सप्ताह में तीन दिन पढाती हूँ (इससे मेरे मस्तिष्क का अच्छा व्यायाम होता है और धनोपार्जन भी)
आभार

Thursday, February 17, 2011

छुटकी टिप्पणी , बडका ब्लॉगर

ये राधिका भी ! जब देखो तब कहती है - " क्या दिव्या भारी भरकम पोस्ट लगा दी , पका देती हो तुम तो तुम्हारे लेख पढ़कर तो नींद ही नहीं आती , Diazepam की गोली खाकर नींद बुलानी पड़ती है " तो समर्पित है आज की हलकी-फुलकी पोस्ट राधिका के नाम

जैसे जैसे उम्र बढती है , बुढापा घेर लेता है लोग खाना कम कर देते है , सोचते हैं , पचा नहीं पाऊंगा चटक-मटक कपडे कम पहनता है , सोचता है लोग क्या कहेंगे पार्टीज़ में कम जाता है , डरता है कहीं समाज हँसे मुझ पर घर में बूढी कुर्सी पर खुद ही बैठने लगता है , डरता है कहीं कोई टोक दे मुख्य सोफे पर बैठने से

भाई ना! डरिये नहीं जीने के यही चार दिना , जिंदगी चले प्यार बिना धन-दौलत बिना चले मगर , जिंदगी ना चले यार बिना इसलिए खुद कों , खुद ही अकेला मत कीजिये मिल कर रहिये बुज़ुर्ग कम हों तो युवाओं के साथ हाथ मिलाइएफिर देखिये ज़िन्दगी आप पर किस तरह मेहरबान होती हैउनकी ऊर्जा से खुद कों चिर-युवा बनाइयेअपने अहम् कों ताख पर रखकर युवाओं और बच्चों की मस्ती भरी अटखेलियों का आनंद उठाइए और निरंतर ऊर्जान्वित रहिये

अरे हम तो भटक गए , बात हो रही ब्लॉगर्स की हाँ तो जनाब जैसे जैसे एक ब्लॉगर बड़ा होता जाता है , उसकी टिप्पणियां छोटी हो जाती हैं ऐसा क्यों ? अरे भाई वो डरने लगता है -

  • कहीं कुछ कम ज्यादा लिख दे
  • कहीं कोई विवाद हो जाए
  • कहीं कोई छुटके ब्लॉगर का मान बढ़ जाए
  • कहीं छुटंकू का TRP बढ़ जाए
  • कहीं छुटकू ज्यादा भाव खाने लगे
  • कहीं मेरी महिमा घटने लगे .
  • सबको पता चल जाएगा की मैं इसे पढता हूँ
  • मैं दूसरों कों तो टिप्पणी करने से नहीं रोक सकता , लेकिन अपनी एक टिप्पणी से तो इसको वंचित कर ही डालूँ
  • बडके बिलागर की चार पोस्ट पर टिपण्णी करो , तब आयेंगे गरीबों की एक पोस्ट पर । ४: १ का रेशिओ । और छुटकू उसी में हो जायेंगे मगन कि तारनहार आये हमरे द्वार । लगेंगे गाने , आभार , आभार , आभार ।
  • कभी कभी तो राधिका जैसे बडके ब्लॉगर दांत भींचे लौट जाते हैं , और छुटकी टिप्पणी भी नहीं देते धत तेरे की , ऐसा भी क्या गुमान
  • कभी-कभी तो बडके ब्लॉगर इतनी microscopic टिप्पणी देते हैं की हम उतने micro ( सूक्ष्म) स्तर तक सोच ही नहीं पाते और उनके monosyllable ( इकलौते शब्द) में व्यक्त अनेकार्थों कों समझ ही नहीं पाते
  • कभी-कभी वो invisible ink में लिखते हैं , जो कमेन्ट बॉक्स में नज़र ही नहीं आती वो आते हैं , पढ़ते हैं, होठों ही होठों में बुदबुदाते हैं और बिना चाय-पानी , दुआ-सलाम के चले जाते हैं।
  • कभी-कभी बड़का ब्लॉगर घबराते हैं की कहीं उनकी टिप्पणी भीड-भाड़ में खुवाय जाए , इसलिए भी खुदकों अलग थलग ही रखते हैं।
  • जाने कौन कौन से डर पाले हैं , मन में डरिये मत ! लिख डालिए ! दर्दे दिल। हाले मन। मन की हलचल ! याँ फिर भड़ास टिप्पणी तो आखिर टिप्पणी है लेखक का मनोबल ही बढ़ाएगी , घटाएगी नहीं और यकीन मानिए टिप्पणी लिखकर आप बडके से छुटके ब्लॉगर कदापि नहीं बनेंगे बल्कि आपकी शान में एक और feather बढ़ जाएगा
थोडा सा प्रवचन झेलेंगे क्या ?

Food chain का नाम तो सुना ही होगा एक सीधा खड़ा हुआ शंकु ( upright pyramid)होता है , जिसमें ढेरों टिड्डे एक साथ दल बनाकर जीवन का मज़ा लेते हैं , लेकिन शिखर पर बैठा शेर अकेला होता है वो राजा है , उसकी जी-हुजूरी करने वाले असंख्य होते हैं , लेकिन दोस्त कोई नहीं होता

corporate world की बात करें तो शीर्ष पर बैठा CEO , नितांत अकेला पड़ जाता है जीवन की हलकी-फुलकी बात किससे करे ? अरे बड़ा होने का खामियाजा तो बड़े लोग ही जानते है

तनहा-तनहा हम रो लेंगे , महफ़िल-महफ़िल गायेंगे ..

मुई राधिका मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी पूछती है - " दिव्या तुम छुटकी हो या बडकी बिलागर ?

हमने कहा -"अरी मूरख , इतनी बड़ी-बड़ी टिपण्णी लिखती हूँ की पढने वाला भी पक जाए " दिल से लिखती हूँ दिल से। "एक हाथ से लेती हूँ दोनों हाथ से देती हूँ" ( सौजन्य IDBI Bank ) इसलिए छुटकी बिलागर हूँ छुटकी ! और हमेशा छोटे ही बने रहना चाहती हूँ।

"कल और आयेंगे नगमों की , खिलती कलियाँ चुनने वाले ,
मुझसे बेहतर लिखने वाले , तुमसे बेहतर पढने वाले ....

इसलिए जी भर के लिखो , लेख भी और टिपण्णी भी आपके शब्द ही आपकी पहचान हैं।

वैसे कोशिश करती हूँ - "कम खर्च बालानशीं " की तर्ज पर संक्षेप में लिखकर काम चलाया करूँ पर क्या करूँ ये निगोड़ी उंगलियाँ मानती ही नहीं कहती हैं - "ये दिल मांगे मोर "

आभार

Tuesday, February 15, 2011

क्या भारतीय बहसी होते हैं ? -- The argumentative Indian

नोबेल पुरस्कार विजेता 'अमर्त्य सेन ' ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक है - " The argumentative Indian " इस पुस्तक में लेखक ने भारत के इतिहास का विस्तार से उल्लेख किया है अपने निबंधों में उन्होंने भारत में लोकतंत्र , धर्मनिरपेक्षता की वकालत की है उन्होंने धर्म , जाति , लिंग तथा समुदाय के आधार पर भेद-भाव का विरोध किया है तथा उपमहाद्वीपीय शान्ति का आह्वान किया है

इस पुस्तक में श्री सेन ने भारत के बेहतरीन पहलुओं कों उजाकर किया है अपने तर्कों द्वारा इन पक्षों कों पूरे विश्व के सामने सही परिपेक्ष्य में रखा James Mills जैसे लेखकों , जिन्होंने " History of British India " लिखा तथा उसमें भारत के उजले पक्षों कों तोड़-मरोड़कर विकृत करके प्रस्तुत किया , उनके द्वारा प्रस्तुत पक्षों का भी श्री अमर्त्य सेन ने अपने तर्कों द्वारा ख़ूबसूरती से खंडन किया अपनी इसी तार्किक शक्ति के लिए ही वो देश विदेश में एक बुद्धिजीवी की तरह जाने गए

मुझे आपत्ति है , पुस्तक के टैग " argumentative Indian " से क्यूंकि देश विदेश में चर्चित ये पुस्तक एक आम भारतीय की पहचान बन गयी एक छोटे वर्ग कों यदि छोड़ दिया जाये जो किसी के तर्क एवं बुद्धि का सम्मान करते हैं , तो शेष बड़ा समुदाय तार्किक , rational और logical लोगों कों बहसी ( argumentative ) कह देता है और यह एक नकारात्मक कमेन्ट है किसी के लिए भी इसलिए इस पुस्तक का शीर्षक यदि " argumentative Indian की जगह " Logical Indian " होता , तो हम भारतीयों पर बहसी होने का टैग नहीं लगता

आजकल जिसने ये पुस्तक पढ़ी भी नहीं है और जो अमर्त्य सेन जैसे तार्किक एवं logical बुद्धिजीवी कों भली प्रकार जानता भी नहीं है , वो भी किसी के तर्कों के आगे जब हारने लगता है तो उसे " argumentative Indian " की उपाधि देकर अपनी भड़ास निकालता है पुस्तक के इस शीर्षक के कारण आज एक आम भारतीय की पहचान " argumentative Indian " की हो गयी है

मेरे विचार से लोगों कों इस शीर्षक कों एक सही परिपेक्ष्य में लेने की ज़रुरत है बहस करने के लिए तर्कों की ज़रुरत होती है और तर्कों कों सामने रखने के लिए वृहत ज्ञान की ज़रुरत होती है। विभिन्न भाषाओं , संस्कृतियों एवं विषयों की जानकारी रखने वाला ही अपनी बात कों तर्क-सम्मत तरीके से प्रस्तुत कर सकता है इसलिए किसी logical व्यक्ति के तर्कों से विचलित होकर उसे 'argumentative' की उपाधि दे देना अनुचित प्रतीत होता है कोशिश करनी चाहिए की हम तार्किक लोगों के सानिध्य से ज्यादा से ज्यादा लाभान्वित हो सके

आज कितने ही देश हैं , जहाँ के निवासियों में धैर्य है , ही धीरजवो तो बन्दूक की गोलियों से बात करना पसंद करते हैंवो तो समझते हैं , ही समझा सकने की काबिलियत रखते हैंलेकिन भारतीय संवेदनशील हैं , धैर्यवान हैं , अपनी बात कों तर्कों द्वारा तथा संवाद द्वारा कहते और प्रस्तुत करते हैंआज हमारे समाज में भ्रष्टाचार , बलात्कार , आतंकवाद , गरीबी , असंवेदनशीलता जैसे मुद्दों पर एक भारतीय व्यथित होता है , इस पर चर्चा करना चाहता है , इपने वक्तव्यों कों कहकर और लिखकर तर्कों द्वारा प्रस्तुत करता है . क्या इसे बहसी होना कहा जाएगा या फिर समाज और परिवेश से सरोकार रखने वाला एक संवेदनशील भारतीय ?


भारतीय तार्किक है , क्यूंकि उनके पास ज्ञान है और ज्ञान ही तर्कों का सहयोगी है भारतीयों का व्यक्तित्व अनुकरणीय है । अपने इसी व्यक्तित्व के कारण ही भारतीय देश-विदेश में अपना परचम लहरा रहे हैं इसलिए गर्व के साथ कहिये की आप ' logical Indian ' हैं , 'argumentative Indian ' नहीं

आभार

Monday, February 14, 2011

जो डर गया , वो मर गया !

बात - वर्ष पूर्व की हैमैं रेल से सफ़र कर रही थीलखनऊ से ग्वालियर छपरा एक्सप्रेस मेंमेरे साथ मेरा १२ वर्ष का भतीजा भी थाछुट्टियों में कुछ दिन मौसी के घर रहना चाहता थासामने वाली बर्थ पर खिड़की के पास चुप चाप बैठा कॉमिक्स पढने में व्यस्त था

एक सज्जन RAC वाली बर्थ पर पूरे लेटे हुए थे , किसी कों स्थान नहीं देना चाहते थेदेखने में वो सेव की तरह लाल तथा भयानक रूप से मोटे थेकिसी अमीर व्यापारी की तरह लग रहे थेउनके साथ करीब दस साल की एक दीन हीन , अकिंचन सी बच्ची साथ थी , जो शकल सूरत से शायद उनकी नौकरानी लग रही रही थीसच नहीं जानती पर संदिग्ध लग रहे थे फिरहाल वो

वो बच्ची बैठे रहकर खिड़की से बाहर देखना चाहती थी लेकिन वो सज्जन बार बार उसे लेटने का आदेश दे रहे थेसहमी सी लड़की आदेश का पालन करते हुए थोड़ी देर पैर सिकोड़कर लेट जाती , लेकिन फिर उठकर चुप-चाप खिड़की से बाहर देखने लगतीउसी बर्थ पर मेरा भांजा बैठा थालड़की इस बात का पूरा ध्यान रख रही थी की लेटने पर उसका पाँव , भांजे कों स्पर्श करे

यही क्रम चलता रहा , उन सज्जन कों किसी हालत में चैन नहीं पड़ रहा था , वो चाहते थे , वो भी लेटे रहे और वो लड़की भी लेटकर ही सफ़र तय करे , ताकि उनका पैसा वसूल हो जाए , चाहे उसके लिए सहयात्रियों कों कष्ट हो , अथवा विवाद हो , अथवा मासूम बच्चे अपने तरीके से यात्रा का आनंद ना ले सकें

सभी लोग उन सज्जन का तमाशा देख रहे थे , लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा थाउनकी ढीठता और लड़की की मजबूरी सबको दिख रही थी , लेकिन शिष्टता किसी कों भी बोलने से रोक रही थी

जब उन सज्जन कों खुजली ज्यादा होने लगी तो उन्होंने उस लड़की के लिए जबरदस्ती बीच वाली बर्थ खोल दी और उससे उस पर लेट जाने कों कहालड़की बेचारी मन मारकर ऊपर चढ़ गयीअब लेटे रहना उसकी मजबूरी थी और खिड़की से दिखते दृश्यों से भी वो वंचित हो गयी थी

और उन सज्जन का जो उद्देश्य था की वो मेरे भांजे कों उस बर्थ पर बैठे नहीं देखना चाहते थे वो भी पूरा हो गयाबीच की बर्थ खुलने के कारण निचली बर्थ पर कोई भी व्यक्ति नोर्मल तरीके से नहीं बैठ सकता थाभांजा अपना सर झुकाकर तकलीफ से बैठ गया और उसने कॉमिक की किताब भी बंद कर दीहर किसी कों तकलीफ देकर वो सज्जन बहुत विजयी महसूस कर रहे थेसभी सहयात्री ख़ामोशी से ये नज़ारा देख रहे थेभांजे ने मेरी तरफ मजबूरी वाली निगाहों से देखा फिर चुप चाप खिड़की के बाहर देखने लगा , वो झुककर बैठ नहीं पा रहा था

मुझसे ये नहीं देखा गया , मैंने धीरे से उन सज्जन से कहा , आपने बिना वजह यह बीच की बर्थ खोल दी , नीच कोई बैठ नहीं सकता है अबबच्चे कों भी तकलीफ हो रही है

इतना सुनना था की वो सज्जन जो अब तक भड़ास में भरे बैठे थे , बिदक कर मुझे खरी खोटी सुनाने लगेकहने लगे ये हमारी बर्थ है , और आपका भांजा जबरदस्ती इस पर बैठा हैएक स्त्री कों अकेली सफ़र करते देख उन्होंने सोचा इसको कुछ भी बोल दो , क्या कर लेगीउनका लहजा बहुत अपमानजनक थाकाफी झगडालू लग रहे थे और ऊंची स्वर में उनके बोलने से मैं डर गयी और बेईज्ज़ती ज्यादा हो जाए , उनका कोई जवाब नहीं दिया और चुप चाप बैठी रही

जिंदगी में ऐसा पहला अनुभव थापांच मिनट गुज़र गएमन में बेचैनी थी , गुस्सा था , अपनी लाचारी पर तरस भी था और कायरों की तरह बैठे तमाशबीन सह-यात्रियों पर खेद भीएक स्त्री होने का अब समाज में कोई स्थान तो है नहीं , लोग rival समझते हैं और जहाँ मौक़ा पाया , वहीँ कर दो इसका अपमान , क्या कर लेगी ? ऐसा सोचते हैं

मैं दस मिनट तक अपने मन में घुटती रही , फिर अचानक एक विचार आया , इस गुंडे कों ऐसा सबक सिखाउंगी की जिंदगी भर किसी का अपमान नहीं करेगा

अचनाक मैं उससे मुखातिब हुई , कड़क आवाज़ में कहा - " उठ कर बैठिये " । वो आज्ञाकारी बालक की तरह बैठ गयामैंने कहा - " टिकट निकालिए " । वो तीखी आवाज़ में बोला - " पहले आप दिखाइये"

मेरे अन्दर उस समय जाने कहाँ का साहस गया था ।-- " मैंने कहा , टिकट निकालिए , ज़रा देखूं किस बात पर आप इतना अकड़ रहे है । " उसने अपना टिकट दिखाया , उसके पास केवल एक सीट थी जिस प़र वो पूरा विराजमान थाफिर मैंने अपना टिकट निकालकर बगल बैठे सहयात्री कों दिखाया जिस पर दो सीटों का आरक्षण थाएक मेरा और एक मेरे १२ वर्षीय भांजे का । " ३४ नंबर" की बर्थ जिस पर वो उस लड़की कों जबरदस्ती लिटाना चाहता था वो सीट भांजे की ही थी , जिस पर उन सज्जन ने उसे सर झुकाकर बैठने कों मजबूर कर दिया था

अब चुप बैठी जनता भी मेरे साथ थीउन सज्जन की अकड़ ढीली पड़ चुकी थीऊंट पहाड़ के नीचे चुका था

मैंने कहा - " एक स्त्री कों अकेली देखकर उसका अपमान मत कीजियेगा अब कभीयदि कोई शराफत से चुप बैठा आपको बर्दाश्त कर रहा है तो उसे मूर्ख भी मत समझिएगारेल यातायात के नियमों कों समझिये और प्रातः आठ से लेकर रात्री आठ तक बैठने की व्यवस्था और उसके बाद सोने का नियम , इसलिए गुंडई दिखाकर जबरदस्ती सहयात्रियों कों कष्ट मत दीजियेगाऔर ये जो छोटी बच्ची कों आप एक नौकरानी की तरह ले जा रहे हैं और जबरदस्ती लेटने कों कह रहे हैं वो भी अनुचित है " । मेरा भांजा आपका तो कुछ नहीं लगता , इसलिए आप इतनी निर्दयता से पेश आये उसके साथवो चुप चाप कॉमिक पढ़ रहा था तो आपसे उसकी ख़ुशी भी बर्दाश्त नहीं हुईऔर मैं , जो आपकी सहयात्री हूँ, उससे आपने तमीज के साथ बात करना भी उचित नहीं समझा , क्यूंकि मैं स्त्री हूँ , आपकी गुंडागर्दी से डर जाउंगी ? "

इसके बाद तो उन सज्जन कों अन्य यात्रियों के भी ढेरों प्रवचन सुनने पड़े , और झांसी आते ही वो झोला लेकर उस बच्ची के साथ भाग खड़े हुएझाँसी से ग्वालियर घंटे का सफ़र हमारा सुखमय रहा

मैं भांजे के बगल में बैठ गयी , वो डरा हुआ था , मुझे देखकर पहली बार मुस्कुराया , बोला -- " मौसी मज़ा गया , आज इनको अच्छा lesson मिला होगा "

मैंने कहा - " बेटा मज़ा तो आज पहली बार मुझे आया है , एक स्त्री लाचार नहीं है , इस बात का सुखद अनुभव किया है मैंने "

डरने वाले कों लोग और डराते हैं , दबाते हैं और धमकाते हैंगलत प्रवित्ति बढती जाती है और सीधे सच्चे लोगों के बीच खामोशी बढती जाती हैसत्य में जो ताकत है वो किसी और चीज़ में नहींजब हम सही होते हैं तो ये सच ही हमारी ताकत बनता है और हर परिस्थिति में हमें हिम्मत देता हैहमारे पास टिकट था ( जो हमारा सच था ) , और इसी सच ने हमें आवाज़ उठाने की शक्ति दीइसी सच ने वहां उपस्थित समाज कों हमारे समर्थन में भी खड़ा कर दिया

"God helps those who help themselves "

आभार