Saturday, September 24, 2011

नामुराद-दिव्या

मोहन की चुप्पी , मैडम की व्याधि , कला नीला पीला धन , भ्रष्टाचार, व्याभिचार , अनाचार , आतंकवाद, रिश्वतखोरी, सीनाजोरी, भाजापाई और आतातायी , मोदी औ मित्तल , क्रिकेट और हॉकी , लाफ्टर शो और रियलिटी शो , अनशन और आन्दोलन , कहीं परचा लीक तो कहीं विकी लीक । इतने सारे अनगिनत मुद्दे और विषय हैं फिर भी हिंदी ब्लॉगजगत में जिधर जाओ उधर इस 'नामुराद-दिव्या' पर ही पोस्टें लिखी मिलती हैं। हमें तो पता ही नहीं था की हम इतने बड़े आतंकवादी हैं।

बड़ी मुश्किल से समय निकाला की चलो कुछ अच्छी पोस्टें पढ़ी जाएँ । लेकिन यह क्या ?.. क्रम से जितने ही ब्लौग पर गयी तो देखा सभी पोस्ट इस 'नालायक-दिव्या' पर ही लिखी हुयी थीं। हम तो अचंभित हो गए की भैया हम कौनो गुनाह तो नहीं कीन्हा तौ काहे हमरे ऊपर सभय कुर्बान हुए जात हैं।

पोस्ट मेरे ब्लौग की,
जित देखूं तित पोस्ट,
पोस्ट पढ़न को मैं चली ,
मैं ही बन गयी पोस्ट,


ब्लौग लिखते हुए जुम्मे-जुम्मे १५ महीने ही हुए हैं और हम ही मुद्दा बन गए हैं ? लोगों ने भ्रष्टाचार और त्यौहार भुला दिए हैं , मोहन और मोदी को भी बिसरा दिया है , बस मुई-दिव्या ही सबके 'जी का जंजाल' बनी हुयी है।

अब आप ही बताएं मैं उदास रहूँ या खुश रहूँ ? चकित होऊं या मौन रहूँ?


Zeal

Friday, September 23, 2011

चमड़ी मोटी करना विकल्प है या फिर असंवेदनशीलता ?

फेसबुक पर एक लड़की ने दुखी होकर आत्महत्या कर ली और अंजलि गुप्ता जैसी होनहार ऑफिसर ने भी धोखा मिलने पर आत्महत्या कर ली । बहुत जगह इन दो प्रकरणों पर चर्चाएँ पढ़ी । ज्यादातर लोगों का मत है की चमड़ी मोटी कर लेनी चाहिए। हर बात को हलके में उड़ाकर आगे बढ़ जाना चाहिए। दुखी नहीं होना चाहिए।

प्रश्न यह है कि चमड़ी मोटी कर लेना भी कोई विकल्प है ? क्या यह व्यक्ति को असंवेदनशील होने के लिए नहीं कह रहा ? आज हमारी सरकार की चमड़ी मोटी हो गयी है। जनता के मरने का दुःख नहीं। पुलिस की चमड़ी भी मोटी है , बलात्कार आदि की घटनाएं बदें तो बढें , क्या फरक पड़ता है। फेसबुक और सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर लड़कों की चमड़ी वैसे ही काफी मोटी है। दो चार लड़कियां आत्महत्या कर भी लेंगी तो क्या नयी खेप जो आ जाएगी। किसी नयी को फंसा लेंगे।

लेकिन क्या लड़कियां भी अपनी चमड़ी मोटी कर लें ? क्या यही विकल्प है ? एक ने धोखा दिया तो क्या दुसरे पर यकीन कर लें ? एक के बाद एक नए गड्ढे में बिना दुखी हुए छलांग लगाती रहे ? यह तो अनाचार हुआ। संस्कारों का हनन हुआ। यदि लडके और लड़कियां अपनी चमड़ी मोटी कर लेंगे तो शर्म हया सब मर जायेगी और दिशाहीन होता समाज पता नहीं कहाँ पहुँच जाएगा।

ज़रुरत है इस तरह कि घटनाओं को बारीकी से समझने कि । निंदनीय कृत्यों कि भर्त्सना करने कि । दोषी को दण्डित करने कि । अपराधी प्रवित्ति को रोकने कि । माता-पिता द्वारा अपनी संतानों को समझाए जाने कि । लड़के खिलवाड़ न करें और लड़कियां खिलौना न बनें। रिश्तों में पर्याप्त दूरी बना कर रखें । नेटवर्किंग साईट्स पर नकाब में ढके चेहरों पर इतनी जल्दी यकीन न करें।

अन्यथा मोटी चमड़ी कर लेने का मतलब है , आँख बंद कर लो सब तरह कि अनियमितताओं के प्रति और -"सब चलता है " कहकर बह जाओ उसी दिशाहीनता कि ओर। अभी स्त्री लुटती है और आत्महत्या करती है फिर स्त्री पुरुष दोनों के मध्य आत्महत्याओं का अनुपात बराबर हो चलेगा।

Zeal

निर्णय लेने में आपके अनुभव ही काम आयेंगे आपके.

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BLESSINGS








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VN Shrivastav to me
show details 9:27 PM (12 hours ago)


Rani Beti Divya ,

Can't express our pleasure on going through your blog (first thing this morning)
containing your letter to Rachna ji which capsuled your very thoughtful decision
not to desert the Blog family breaking the hearts of the hundreds of your readers.

Rani Beti , we were very distressed at your earlier decision and we did make several
futile attempts to speak to you.specially to apprise you of some noteworthy matters.

An American had commented on my blogs when I had just commenced blogging in 2010
and thereafter he had fully ignored me . However perhaps on going through your blog
commending the "आलीशान व्यक्तित्व " of your this Dads "खंडहर हो रही इमारत " ,this person
was reminded of me . Through a mail he immediately contacted me and later spoke to me
stating that he was frequenting this part of the country and would be happy to meet me .

On being informed of my physical handicaps he insisted to visit me here at my home , which
I could never agree to without getting your green signal specially . because that person is
ANURAG SHARMA the so called self styled Smart Indian (U know how I dislike Egoistic beings).

Rani Beti while I donot know the details of the dispute I know one thing for granted that this
person has hurt the feelings of my very loving child and that we can never excuse him for this
sinful act .Beta I had planned to send another open letter to the H. B..Family to day ,with the
singular aim to convince YOU to continue to enrichen the Hindi Blog treasure with your blogs.

Shall await your response anxiously ,

Your proud & very loving DAD & MOM-
BHOLA & KRISHNA ।

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प्रिय माँ-पिताजी ,
सादर नमस्ते,

आपका पत्र पढ़कर दो बात ही कहनी है--

१- यदि मैं आपकी जगह होती तो बेटी का अपमान करने वाले को कभी माफ़ न करती। इन्हें माफ़ कर दिया जाता है इसीलिए समाज में स्त्रियों की दुर्दशा है।

२- दूसरी बात यह की आप मुझसे बड़े हैं। आपने बहुत दुनिया देख ली है । आप जो भी निर्णय लेंगे उचित ही लेंगे। एक बार मुझसे तो गलती हो सकती है लेकिन आप दोनों गलती नहीं करेंगे ऐसा मेरा विश्वास है। अनुराग शर्मा मुझसे द्वेष रखता है , आप लोगों से नहीं । अतः आप निश्चिन्त होकर इनसे मिलिए। मुझे यकीन है इनसे मिलकर आपको अच्छा ही लगेगा।

आप दोनों के अच्छे स्वास्थ की कामना के साथ,
आपकी बिटिया।

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अनुराग जी ,
आप मेरे अपनों को मुझसे तोड़कर मुझे कमज़ोर करना चाहते हो । सभी को अपने साथ मिला लेना चाहते हो। सबको मेल लिख-लिख कर और फोन करके तथा उनके घर जाकर उन्हें अपना बनाना चाहते हो? कोई बात नहीं। ईश्वर आपको इतनी शक्ति दे की आप सभी से प्रेम कर सको। दिव्या से नफरत निभाने के फेर में आपने कुछ लोगों के साथ मित्रता करने की सोची, यही ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी उपलब्धि समझूंगी।

मुझे तो अकेले ही चलने की आदत है। बस कुछ के साथ आत्माओं का मिलन हो चुका है , वहां फोन आदि की ज़रुरत नहीं पड़ती है। मेरे दुःख में वे रो पड़ते हैं और मुझे खुश देखकर भी उनकी आँखें छलछला पड़तीं हैं।

किसी को फोन कर सकूँ इतना पैसा ही नहीं है मेरे पास। नौकरी नहीं करती हूँ न इसीलिए सरकारी फोन जो मुफ्त में मिलता है बड़े ओहदे वालों को , वह भी सुविधा नहीं है मेरे पास। और फिर सबसे बड़ी मुश्किल तो यह है की मैं 'स्त्री' हूँ । किसी को फोन करुँगी तो वह एक अलग ही समस्या खड़ी कर देगा। लेकिन मेरे पास स्पष्टवादिता और पारदर्शिता है। वही मेरी ताकत है, और वही मेरा गहना।

आपने मुझे 'schizophrenic' और 'paranoid' कहा , फिर भी जाइए आपको माफ़ किया !

Zeal
Justify Full

Thursday, September 22, 2011

रचना जीजी-मोरी ननदिया (बिंदास ब्लॉगर रचना के पत्र का उत्तर)

.

रचना जी ,

आपने मेरे नाम पत्र लिखा और कहा की अपने ब्लॉग पर पत्र का जवाब दें। मुझसे लिखवाने आ आपका यह तरीका बहुत अद्भुत लगा, अच्छा भी लगा। चूँकि आपके पत्र में लेखन न छोड़ने का निवेदन है , इसलिए यहाँ आपको पत्र लिखकर लेखन जारी रखकर आपके पत्र का उत्तर है।

लेकिन रचना जी एक बात कहूँगी , कि स्नेह किसी की मौत हो जाने पर नहीं दिया जाता। जब जाने का निर्णय पढ़ लिया तब बुलाया । कभी-कभी इंसान के टूटने और टूट कर बिखरने से पहले ही उसे सहारा दिया जाता है।

चूँकि आपने मेरी प्रशंसा में भी चंद शब्द कहे हैं। उसके जवाब में यही कहूँगी कि जब मेरे आलेख में कुछ पसंद आये तो प्रशंसा भी कर दिया कीजिये । जरूरी नहीं है कि केवल उन्हीं आलेखों पर आप टिप्पणी करें जहाँ आपका मत-वैभिन्न हो और और आप कडुवाहट के साथ लिखें। टिप्पणियों में असहमति भाषा कि मिठास बरकरार रखते हुए भी जताई जा सकती है।

आपने लिखा कि ब्लॉग ऐसी जगह नहीं है जहाँ रिश्ते बनाए जाएँ। मेरा जवाब है कि रिश्ते बनाए नहीं जाते , स्वमेव बनते हैं। लोग अपने दिलों में मेरे लिए नफरत और द्वेष पाले हुए हैं और मुझे अपने दिल में साथी ब्लॉगर के प्रति प्रेमपूर्ण सहज रिश्ते बनाने का भी हक नहीं ?

मैं आत्माओं के मिलन में यकीन रखती हूँ। कुछ लोग मन में जगह बना लेते हैं , उनसे मन का बहुत जुड़ाव हो जाता है , एक लगाव हो जाता है। उम्र और अवस्था के अनुसार उस रिश्ते का स्वतः ही नामकरण भी हो जाता है। लेकिन इन रिश्तों में किसी पर कोई बोझ नहीं है , किसी से कोई अपेक्षा नहीं है , किसी से कुछ माँगा भी नहीं गया है। सभी कि स्वतंत्रता सुरक्षित है। और मेरे रिश्तों कि बाध्यता नहीं है किसी पर कि कोई मुझे भी अपना सगा माने। प्रेम एक तरफ़ा ही होता है ऐसा मेरा मानना है , किन्तु यदि दोनों तरफ से निभे तो सोने पर सुहागा हो जाता है। न मैं आज तक किसी से मिली हूँ, ना ही मिलूँगी बस जिनसे मेरी आत्मा का मिलन हो चुका ही वे सदा ही मेरे मन में रहते हैं , उसके लिए मिलना जरूरी नहीं। मन से मन का संवाद होता है।

मासूम जी ने एक आलेख लिखा था- "जायज रिश्तों के प्रति वफादार रहिये " ----उनके आलेख पर मेरे विचार कुछ इस प्रकार थे ----

ZEAL said...

प्रिय भाई मासूम ,

एक बेहतरीन आलेख के लिए बधाई। इसमें निहित सुन्दर शिक्षा बहुत सारगर्भित है। ध्यान देने योग्य है एवं अनुकरणीय है। एक बात कहूँगी की रिश्ते कभी जायज और नाजायज नहीं होते। इंसान जब कमज़ोर पड़ जाता है तो अपने ही बनाए रिश्तों की लाज नहीं रख पाता है, और अच्छे भले रिश्ते नाजायज़ की श्रेणी में आ जाते हैं। । चाहे वह अपने कोख से जन्म देने वाली माँ हो अथवा सहोदर भाई हो , जीवनसाथी हो अथवा जिंदगी के विभिन्न पडावों पर मिलने वाले मित्र हों।

यदि व्यक्ति स्वयं में चारित्रिक दृढ़ता लाये तो वह बखूबी हर रिश्ते को पूरी इमानदारी के साथ निभा सकता है। जो व्यक्ति माता-पिता , भाई-बहन, पुत्र-पुत्री के साथ न्याय नहीं कर पाते वे घर-बाहर ,किसी के भी साथ न्याय न्याय नहीं कर पाते।

अतः हर रिश्ते मूल में चारित्रिक दृढ़ता बेहद आवश्यक है। यही हमें हर रिश्ते के प्रति इमानदार रखती है और हम रिश्तों की खुशबू और मिठास को महसूस कर पाते हैं।


मेरे विचार से हम सभी सामाजिक प्राणी हैं और समाज रिश्तों के दायरे में बंधा है । ये रिश्ते हमें प्रेम कि डोर से बांधते भी हैं और हमें मर्यादित भी रखते हैं। रिश्तों का गुटबाजी से कोई सम्बन्ध नहीं होता। गुटबाजी करने वाले वालों के अन्दर एक अलग ही जेनेटिक-कोड होता है जिसके तहत वे न चाहते हुए भी गुट बनाते और छोड़ते रहते हैं।

लेकिन जिनमें चारित्रिक दृढ़ता होती है , उनके अन्दर इमानदारी भी कूट-कूट कर भरी होती है , वे नीर-क्षीर विभेदक बुद्धि भी रखते हैं । वे भावनाओं में बहते नहीं हैं। और ब्लौगजगत भी ऐसे ही निर्भीक , इमानदार और स्पष्टवादी लोगों से भरा हुआ ही। चंद खेमेबाजों और "जी-हुजूरी" करने वालों से कोई थोड़े समय के लिए विचलित तो हो सकता है लेकिन अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं हो सकता ।

आपने मुझे पत्र लिखकर मुझे मेरे कर्तव्य का बोध कराया इसके लिए आप सम्मान और आभार कि हक़दार हैं ।
आपके साथ-साथ मेरे पिछले आलेख पर आये सभी सम्मानित ब्लॉगर जिन्होंने मुझे दिशा दी , उनका आभार।

जिन लोगों ने मुझसे निर्णय न बदलने के लिए कहा और अलविदा कहा , उनसे क्षमा मांगती हूँ, क्यूंकि मैंने अपना निर्णय बदल दिया है। जो लोग मुझे ब्लॉगजगत से रुखसत करना चाहते हैं , उनके अपवित्र उद्देश्यों कि पूर्ती नहीं होने दी जायेगी। जो लोग टंकी आरोहण , नौटंकी और ब्लौगरीय हथकंडा समझते हैं , वे लोग चाहें तो पुनः अपने ब्लॉग पर ऐसे आलेख लगा सकते हैं । अब इस प्रकार के द्वेषपूर्ण आलेखों को तवज्जो नहीं दी जायेगी। न ही उन्हें उनके मंसूबों में सफल होने दिया जाएगा।

लेखन छोड़ने के निर्णय से बहुत उदास थी कि हिंदी-भाषा कि सेवा का अवसर जो ब्लॉग के माध्यम से मिला था वह दुबारा नहीं मिलेगा। लेकिन अब लिखूंगी, फिर लिखूंगी , लिखती रहूंगी । मिटाने वालों कि हस्ती खुद ही मिट जायेगी।

जिन लोगों ने डट कर मेरा समर्थन किया , उनको (कौशलेन्द्र जी , दिवस जी , प्रतुल जी , भोला-कृष्ण जी और अन्य बहुत से मेरे शुभचिंतकों को) अपने खेमे में शामिल करने के लिए अनुराग शर्मा ने मेल और फोन किये तथा उनसे माफ़ी मांग कर उनको मेरे खिलाफ भड़काने की कुचेष्टा में लगा हुआ है. और मेरे खिलाफ विष-वमन उन मेलों और फोन द्वारा किया। धन्य है अनुराग का षड्यंत्र। कोई बात नहीं हम अकेले ही चलते रहेंगे...

हम अकेले ही चले थे जानिबे मंजिल कि ओर
लोग जुड़ते गए , कारवां बनता गया
कुछ चिढ़ते रहे , हम बढ़ते रहे....
कुछ कुढ़ते रहे , हम बढ़ते रहे...

Zeal

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पोस्ट पर कमेन्ट आप्शन बंद है । शुभचिंतकों का आभार एवं द्वेष रखने वालों का भी आभार।

Monday, September 19, 2011

पराजित और अपमानित होना स्त्री की नियति है

कोई लाख कहे हम इक्कीसवीं सदी में आ गए हैं और चाँद पर भी पहुँच गए हैं , लेकिन सच तो ये है की हम शताब्दियों पीछे जा रहे हैं। स्त्री का समाज में स्थान , ग्रंथों में वर्णित उसके स्थान से पूर्णतया विपरीत है।

ज्यादातर लेखकों का कहना है की ब्लॉग लेखन स्वान्तः सुखाय होता है , लेकिन मैंने अपनी ख़ुशी के लिए कभी नहीं लिखा। एक उद्देश्य को लेकर शुरू किया था। कहाँ तक सफल हो सकी हूँ नहीं जानती , लेकिन अब तो विदाई की बेला भी आ गयी। जाना ही होगा। बेटियां तो निर्मोही होती ही हैं। माता-पिता को छोड़कर ससुराल चली जाती हैं , तो फिर कहीं अन्य किसी जगह से मोह भला कैसे हो सकता है।

अनुराग शर्मा उर्फ़ 'स्मार्ट-इंडियन' नामक ब्लॉगर ने मुझे अपमानित करने के लिए जो आलेख लिखा है और उसमें मेरे अधिकाँश आलेखों का जिस प्रकार मखौल बनाया है, उससे तिरस्कृत होकर यहाँ से सदा के लिए चले जाने का निर्णय लिया है।

पाबला जी ने लिखा -- "छील कर रख दिया"......

अनुराग शर्मा जी ने सचमुच छील कर रख दिया और कुछ अपनों ने उस छिले हुए रिसते घावों पर नमक डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेखक और उस आलेख पर आये सभी टिप्पणीकारों का आभार जिन्होंने मुझे हिंदीBulleted List ब्लोगिंग के मोह को ख़तम कर पाने में मदद की।

जाते-जाते कुछ लोगों का उल्लेख जिन्हें अपने दिल में रखकर साथ ले जा रही हूँ...


  • शोभना चौरे जी (मेरी माँ)
  • प्रतिभा सक्सेना जी (मेरी माँ)
  • डॉ कृष्णा जी (मेरी माँ)
  • राजेश कुमारी जी (माँ)
  • डॉ अरुणा कपूर (माँ )
  • रश्मि प्रभा जी
  • साधना वैद्य जी
  • आशा जोगलेकर जी
  • JC जी (मेरे पिता)
  • विश्वनाथ जी (मेरे पिता)
  • मंसूर अली जी (पिता)
  • भूषण जी (मेरे पिता)
  • डॉ कौशलेन्द्र (मेरे पिता)
  • डॉ भोला (मेरे पिता)
  • डॉ एम् एल वर्मा 'क्रांत'(पिता)
  • श्री अशोक सलूजा (पिता)
  • डॉ रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (पिता)
  • चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी (पिता)

कुछ
सखियाँ सहेलियां और बहनें-

  • सीमा जी
  • मुनव्वर सुल्ताना जी
  • रेखा जी
  • रजनी जी
  • प्रेरणा जी
  • मनीषा दीदी
  • निवेदिता दीदी
  • संगीता स्वरुप जी
  • वंदना जी
    मृदुला जी
  • सपना निगम जी
  • क्षमा जी
  • माहेश्वरी कनेरी
  • जेन्नी शबनम जी
  • निशाजी
  • ज्योति मिश्र जी

मेरे
भाई --

  • डॉ रुपेश श्रीवास्तव
  • प्रतुल भैया
  • दिवस दिनेश गौड़
  • विश्वजीत

मेरे शुभचिंतक एवं परम प्रिय मित्र--

  • महेंद्र वर्मा जी
  • कुश्वंश जी
  • Bikram जी
  • भारतीय नागरिक जी
  • aarkay जी
  • आशीष जी
  • मदन शर्मा जी
  • डॉ राजेन्द्र तेला
  • अलबेला खत्री जी
  • राकेश कुमार जी
  • सुरेन्द्र सिंह झंझट जी
  • जयकृष्ण तुषार जी
  • अमित श्रीवास्तव जी
  • अरुण कुमार निगम जी
  • दिलबाग विर्क जी
  • मनोज कुमार जी
  • मनोज भारती
  • अतुल श्रीवास्तव जी
  • अरुण साथी जी
  • अरुण चन्द्र राय जी
  • कुंवर कुसुमेश

बहुत
से अन्य महिला एवं पुरुष ब्लॉगर जिनके सानिध्य में हिंदी-ब्लॉगिंग का मेरा सफ़र अत्यंत सुखकर रहा उन सभी का आभार। मेरी यात्रा यहीं तक थी अब आज्ञा दीजिये। आप सभी को नमस्कार ।

Zeal

Sunday, September 18, 2011

नरेंद्र दामोदर भाई मोदी , हमें आपकी ज़रुरत है

१७ साल की आयु में अपने परिवार को त्यागकर समस्त देशवासियों को अपना परिवार मान लिया और आज की तारीख तक अपने देशवासियों की सेवा में लगे हुए हैं। गुजरात प्रदेश जो दंगों के लिए ही जाना जाता था वहां उनके शासन काल में पूर्ण शान्ति है। कभी कर्फ्यू तक नहीं लगा। उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से गोधरा काण्ड का उन्हें जिम्मेदार बताया गया। लेकिन दुष्टों के मंसूबे सफल नहीं हुए और एक कामयाब मुख्यमंत्री के पाक-साफ़ दामन पर कीचड उछालने वालों ने अपने मुंह की खायी।

आज गुजरात एक सबसे सफल , सबसे धनी , सबसे उन्नत और सबसे शांतिपूर्ण राज्य है। पूरे राज्य को एक पिता का साया मिला हुआ है। यहाँ हिन्दू-मुस्लिम के मध्य भेदभाव पैदा करने वालों की भी दाल नहीं गली। इस राज्य में हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही अपने मुख्य मंत्री में समान आस्था रखते हैं।

जो अपने निस्वार्थ व्यक्तित्व, अपने ओजस्वी कर्मों , अपने निश्छल प्रेम द्वारा करोड़ों का दिल जीतकर ऊँचाइयों को छूने लगता है , उससे अनायास ही ईर्ष्या रखने वाले पैदा हो जाते हैं और उनके खिलाफ एकजुट होकर गन्दगी फैलाते हैं। लेकिन इतने ओजस्वी व्यक्तियों के साथ परमपिता कदम दर कदम उसे अपनी शक्ति से नवाजता है, और हर मुश्किल से लड़ने की ताक़त देता है।

हमारे देश का दुर्भाग्य यही है की यहाँ जो कर्मठ लोग होते हैं उनके योगदानों , उनकी समाज-हित की भावना को और उसके आध्यात्मिक मोह, जो समस्त जनता के लिए है , उसे नकार दिया जाता है। इसीलिए तरक्की की गति बहुत धीमी है हमारे देश में।

यदि लोग दूसरों में कमियां तलाशने के बजाये , उनके योगदानों पर अपना ध्यान केन्द्रित करें तभी उन्हें इस ओजस्वी हस्ती की प्रभुता समझ आएगी अन्यथा हम ऐसे कर्मठ व्यक्तियों को पहचानने में बहुत देर कर देंगे और देश को घोटालेबाज ले डूबेंगे।

नरेंद्र भाई मोदी जी आपकी ज़रुरत केवल गुजरात की जनता को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत को है। हम आपको अपने देश के प्रधानमन्त्री के रूप में देखना चाहते हैं। हम आप जैसे पिता का साया अपने सर पर अनंतकाल तक चाहते हैं। ईश्वर आपको हर क्षेत्र में विजय दिलाये। दुश्मन आपका बाल भी बांका न सकें। आपकी जीत हो, आपकी जीत में हम देशवासियों की जीत हैं।

नरेंद्र दामोदर भाई मोदी की जय हो।

भारत माता की जय हो ।

Zeal

अपोस्ट से कुपोस्टों का सफ़र......

दुःख के साथ कहना पड़ रहा है की कुछ ब्लॉगर्स के पास लिखने को जब कुछ नहीं रह जाता तो वे ब्लॉग पर हो रहे विवादों से मसाला ढूंढकर एक आलेख लिखते हैं और टिप्पणी बटोरते हैं। हिंदी ब्लॉगिंग की गिरते स्तर को परिलक्षित करती है ऐसी मानसिकता। और यही हमारे समारे समाज का गिरता चरित्र भी परिलक्षित करता है।

दूसरों के घर में आग लगी देखकर तमाशा देखने वालों की भीड़ हमेशा ज्यादा होती है। कुछ लोग दूसरों को अपमानित देखकर एक sadistic pleasure पाते हैं। और उसके तहत अपने-अपने ब्लॉग पर और भी ज्यादा अपमानित करने के लिए व्यंगात्मक आलेख लिखकर अपनी भड़ास निकालते हैं। ऐसे आलेखों पर जो लोग शिरकत करते हैं उनकी बुद्धि पर भी खेद उत्पन्न होता है । लेकिन खेमेबाजी का इलाज नहीं है। चली रहेगी ये खेमेबाजी अनंत काल तक ।

किहीं पर विवाद का धुआं उठता देखा नहीं कि, ब्लॉग जगत में अनेकों पोस्टों की भरमार हो जायेगी।

कुछ लोग तटस्थ रहकर प्रवचनकारी आलेख लिखेंगे कि वाद-विवाद नहीं होने चाहिए । और प्रवचन के दरबार में तो दस्तक अक्सर ही ज्यादा होती है। ऐसे लोग किसी के मन कि व्यथा समझना ही नहीं चाहते ,बस मसाला देखा और पोस्ट लिख दी।

दुसरे प्रकार के लोग अपनी TRP बढाने के लिए किसी कि छवि धूमिल करने से गुरेज़ नहीं करते। व्यंगात्मक आलेख लिखकर खेमेबाजों कि टिप्पणियां हासिल करते हैं। ऐसे लोगों में नैतिक मूल्यों कि कमी होती है।

तीसरे प्रकार के लोग किसी के व्यथित होकर लेखन छोड़ने के निर्णय को "टंकी-आरोहण" कहकर नौटंकी बताते हैं और अपमानित करने के लिए आलेख लिखते हैं। वहां भी भड़ासियों की जमघट काफी होती है।

चौथे प्रकार में लोग आते हैं जो भडासी आलेख नहीं लिखते हैं , बल्कि ऐसे आलेखों को ढूंढकर , टिप्पणी के माध्यम से अपने मन की भड़ास निकालते हैं।

किसी की व्यथा और अपमान पर "व्यंगात्मक" आलेख लिखकर टिप्पणी कमाना और सस्ती लोकप्रियता हासिल करना अत्यंत घृणित मानसिकता की दोत्तक है। ऐसे कृत्यों का बहिष्कार किया जाना चाहिए, यदि हिंदी ब्लॉगिंग का स्तर ऊंचा रखना है तो।

Zeal

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पोस्ट पर कमेन्ट आप्शन बंद है। आपने हमें पढ़ा , इसके लिए आपका आभार।

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